बुद्ध हैं अंतिम सत्य
भगवान बुद्ध दुनिया का एक रहस्य हैं। भगवान तो बहुत हुए, लेकिन बुद्ध ने चेतना के जिस शिखर को छुआ है वैसा किसी और ने नहीं। बुद्ध का पूरा जीवन सत्य की खोज और निर्वाण को पा लेने में ही लग गया। उन्होंने मानव मनोविज्ञान और दुख के हर पहलू पर कहा और उसके समाधान बताए।
यह रिकॉर्ड है कि बुद्ध ने जितना कहा और जितना समझाया उतना किसी और ने नहीं। धरती पर अभी तक ऐसा कोई नहीं हुआ जो बुद्ध के बराबर कह गया। सैंकड़ों ग्रंथ है जो उनके प्रवचनों से भरे पड़े हैं और आश्चर्य कि उनमें कहीं भी दोहराव नहीं है। जिसने बुद्ध को पड़ा और समझा वह भीक्षु हुए बगैर बच नहीं सकता।
बुध का रास्ता दुख से निजात पाकर निर्वाण अर्थात शाश्वत आनंद में स्थित हो जाने का रास्ता है। बुद्ध का जन्म किसी राष्ट्र, धर्म या प्रांत की क्रांति नहीं है बल्कि की बुद्ध के जन्म से व्यवस्थित धर्म के मार्ग पर पहली बार कोई वैश्विक क्रांति हुई है। बु्द्ध से पहले धर्म, योग और ध्यान सिर्फ दार्शनिकों का विरोधाभाषिक विज्ञान ही था। काशी या कांची में बैठकर लोग माथाफोड़ी करते रहते थे।
पश्चिम के बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक बुद्ध और योग को पिछले कुछ वर्षों से बहुत ही गंभीरता से ले रहे हैं। चीन, जापान, श्रीलंका और भारत सहित दुनिया के अनेकों बौद्ध राष्ट्रों के बौद्ध मठों में पश्चिमी जगत की तादाद बड़ी है। सभी अब यह जानने लगे हैं कि पश्चिमी धर्मों में जो बाते हैं वे बौद्ध धर्म से ही ली गई है, क्योंकि बौद्ध धर्म ईसा मसीह से 500 साल पूर्व पूरे विश्व में फैल चुका था।
दुनिया का ऐसा कोई हिस्सा नहीं बचा था जहाँ बौद्ध भिक्षुओं के कदम न पड़े हों। दुनिया भर के हर इलाके से खुदाई में भगवान बुद्ध की प्रतिमा निकलती है। दुनिया की सर्वाधिक प्रतिमाओं का रिकॉर्ड भी बुद्ध के नाम दर्ज है।
उन मुल्कों के मस्तिष्क में शांति, बुद्धि और जागरूकता नहीं है जिन्होंने बुद्ध को अपने मुल्क से खदेड़ दिया है, भविष्य में भी कभी नहीं रहेगी। शांति, बुद्धि और जागरूकता के बगैर विश्व का कोई भविष्य नहीं है, इसीलिए विद्वानों द्वारा कहा जाता रहा है कि बुद्ध ही है दुनिया का भविष्य। वही है अंतिम दार्शनिक सत्य।
''बौद्ध धर्म को सिर्फ दो शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है- अभ्यास और जागरूकता।''- दलाई लामा
एस धम्मो सनंतनो अर्थात यही है सनातन धर्म। बुद्ध का मार्ग ही सच्चे अर्थों में धर्म का मार्ग है। दोनों तरह की अतियों से अलग एकदम स्पष्ट और साफ। जिन्होंने इसे नहीं जाना उन्होंने कुछ नहीं जाना। बुद्ध को महात्मा या स्वामी कहने वाले उन्हें कतई नहीं जानते। बुद्ध सिर्फ बुद्ध जैसे हैं।
हिंदू और बौद्ध दोनों ही धर्मों के लिए बुद्ध का होना अर्थात धर्म का होना है। बुद्ध इस भारत की आत्मा हैं। बुद्ध को जानने से भारत भी जाना हुआ माना जाएगा। बुद्ध को जानना अर्थात धर्म को जानना है।
यह संयोग ही है कि वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी में ईसा पूर्व 563 को हुआ। इसी दिन 528 ईसा पूर्व उन्होंने बोधगया में एक वृक्ष के नीचे जाना कि सत्य क्या है और इसी दिन वे 483 ईसा पूर्व को 80 वर्ष की उम्र में दुनिया को कुशीनगर में अलविदा कह गए।
गौतम बुद्ध का जन्म ईसा से 563 साल पहले नेपाल के लुम्बिनी वन में हुआ। उनकी माता कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी जब अपने नैहर देवदह जा रही थीं, तो उन्होंने रास्ते में लुम्बिनी वन में बुद्ध को जन्म दिया। कपिलवस्तु और देवदह के बीच नौतनवा स्टेशन से 8 मील दूर पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान के पास उस काल में लुम्बिनी वन हुआ करता था।
उनका जन्म नाम सिद्धार्थ रखा गया। सिद्धार्थ के पिता शुद्धोदन कपिलवस्तु के राजा थे और उनका सम्मान नेपाल ही नहीं समूचे भारत में था। सिद्धार्थ की मौसी गौतमी ने उनका लालन-पालन किया क्योंकि सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद ही उनकी माँ का देहांत हो गया था।
मैत्रेय बुद्ध : ओशो की एक किताब अनुसार
भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं के आग्रह पर उन्हें वचन
दिया था कि मैं 'मैत्रेय' से पुन: जन्म लूँगा। तब से अब
तक 2500
साल बीत गए। कहा जाता है कि बुद्ध ने इस बीच कई बार जन्म लेने का प्रयास किया, लेकिन कुछ कारण ऐसे बने कि वे
जन्म नहीं ले पाए। अंतत: थियोसॉफिकल सोसाइटी ने जे. कृष्णमूर्ति के भीतर उन्हें
अवतरित होने के लिए सारे इंतजाम किए थे,
लेकिन वह प्रयास भी असफल सिद्ध हुआ। अंतत: ओशो
रजनीश ने उन्हें अपने शरीर में अवतरित होने की अनुमति दे दी थी।
बुद्ध दर्शन के मुख्य तत्व : चार आर्य सत्य, आष्टांगिक मार्ग, प्रतीत्यसमुत्पाद, अव्याकृत प्रश्नों पर बुद्ध का मौन, बुद्ध कथाएँ, अनात्मवाद और निर्वाण। बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए, जो त्रिपिटकों में संकलित हैं। त्रिपिटकों का एक भाग है धम्मपद। प्रत्येक व्यक्ति को तथागत बुद्ध के बारे में जानना चाहिए।
बुद्ध दर्शन के मुख्य तत्व : चार आर्य सत्य, आष्टांगिक मार्ग, प्रतीत्यसमुत्पाद, अव्याकृत प्रश्नों पर बुद्ध का मौन, बुद्ध कथाएँ, अनात्मवाद और निर्वाण। बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए, जो त्रिपिटकों में संकलित हैं। त्रिपिटकों का एक भाग है धम्मपद। प्रत्येक व्यक्ति को तथागत बुद्ध के बारे में जानना चाहिए।
बुद्ध के सिद्धांत से रुकेगा भ्रष्टाचार
भारत
का इतिहास इस बात का साक्षी है कि इस देश में जब-जब बौद्ध
धर्म कमजोर पड़ा है, तब-तब भारत में भ्रष्टाचार में
वृद्धि हुई है। यथार्थ में बौद्ध धर्म के सर्वोच्च नैतिक मूल्य प्रज्ञा, शील, मैत्री और करूणा मनुष्य को
भ्रष्टाचार करने से रोकते हैं, उसका
सबसे बड़ा कारण यह है कि इन मूल्यों और सदाचरण में उच्चकोटि का सकारात्मक सह-संबंध
है।
आज भारत में बौद्ध धर्म शनै-शनै विकासोन्मुख है, लेकिन यह वर्तमान में इतनी व्यापक एवं सशक्त अवस्था में नहीं है, जो भ्रष्टाचार के विरूद्ध प्रभावकारी भूमिका का निर्वाह कर सके। उसका मुख्य कारण यह है कि वर्तमान भारत में बुद्ध विरोधियों और भ्रष्टाचार पर विश्वास करने वालों की संख्या अत्यधिक है। इसलिए भारत भ्रष्टाचार के विकास के लिए उपयुक्त उपजाऊ भूमि है।
संकुचित अर्थ में भ्रष्टाचार का अर्थ अनैतिक एवं गैरकानूनी माध्यम से चल-अचल संपत्ति एकत्रित करना होता है। व्यापक दृष्टि से त्रिपिटक के महत्वपूर्ण ग्रंथ सुत्त निपात के पराभव सुत्त में मनुष्य के पतन के जो अमंगल, अनैतिक एवं अशुभ कर्म बताए हैं, वे सभी कर्म भ्रष्टाचार में वृद्धि करते हैं, उदाहरण के लिए व्यभिचार करना, शराब पीना, जुआ-सट्टा खेलना, झूठ बोलना, गैर कानूनी माध्यम से धन संचय करना आदि भ्रष्टाचार की परिधि में आते हैं।
आज भारत में बौद्ध धर्म शनै-शनै विकासोन्मुख है, लेकिन यह वर्तमान में इतनी व्यापक एवं सशक्त अवस्था में नहीं है, जो भ्रष्टाचार के विरूद्ध प्रभावकारी भूमिका का निर्वाह कर सके। उसका मुख्य कारण यह है कि वर्तमान भारत में बुद्ध विरोधियों और भ्रष्टाचार पर विश्वास करने वालों की संख्या अत्यधिक है। इसलिए भारत भ्रष्टाचार के विकास के लिए उपयुक्त उपजाऊ भूमि है।
संकुचित अर्थ में भ्रष्टाचार का अर्थ अनैतिक एवं गैरकानूनी माध्यम से चल-अचल संपत्ति एकत्रित करना होता है। व्यापक दृष्टि से त्रिपिटक के महत्वपूर्ण ग्रंथ सुत्त निपात के पराभव सुत्त में मनुष्य के पतन के जो अमंगल, अनैतिक एवं अशुभ कर्म बताए हैं, वे सभी कर्म भ्रष्टाचार में वृद्धि करते हैं, उदाहरण के लिए व्यभिचार करना, शराब पीना, जुआ-सट्टा खेलना, झूठ बोलना, गैर कानूनी माध्यम से धन संचय करना आदि भ्रष्टाचार की परिधि में आते हैं।

ND
इतना ही नहीं,
बल्कि धार्मिक क्षेत्र में प्रज्ञाहीन अंधविश्वास
और पाखंडी कर्मकांडों की आड़ में भ्रष्टाचार दस्तक दे चुका है। इसके विपरीत भगवान
बुद्ध ने सुत्त निपात में ही महामंगल सुत्त के अंतर्गत उन कर्मों को बताया है, जिनके अनुशीलन से भ्रष्टाचार
समाप्त हो सकता है।
अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सर्वेक्षणों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि विश्व में बढ़ते हुए भ्रष्टाचार के मामले में भारत का स्थान अत्यधिक ऊंचा और चिंताजनक है। 30 मार्च, 2011 के समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार 'भ्रष्ट देशों की लिस्ट में भारत नंबर चार पर' पढ़ा था, जो बहुत ही शर्मनाक बात है।
पॉलिटीकल एंड इकोनोमिक रिस्क कंसलटैंसी लिमिटेड (पीईआरसी) ने भारत को भ्रष्टाचार के मामले में शून्य से दस अंक के पैमाने पर 8.67 अंक प्रदान किए हैं। जिसे पतन की दृष्टि से भारत के लिए खतरे की घंटी कहा जा सकता है।
इस स्थिति को देखकर यह स्पष्ट एवं निरपेक्ष रूप से कहा जा सकता है कि आज भारत में भ्रष्टाचार बड़ी तीव्र गति से फैल रहा है। यही नहीं बल्कि इसके अतिरिक्त हत्याएं, बलात्कार, चोरी-डकैती, नशाखोरी और अपहरण जैसे अपराध जंगल में आग की तरह फैल रहे हैं, जिससे समाज व राष्ट्र का पल पल में नैतिक पतन हो रहा है। और विश्व में भारत अपनी साख खोता जा रहा है।
अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सर्वेक्षणों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि विश्व में बढ़ते हुए भ्रष्टाचार के मामले में भारत का स्थान अत्यधिक ऊंचा और चिंताजनक है। 30 मार्च, 2011 के समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार 'भ्रष्ट देशों की लिस्ट में भारत नंबर चार पर' पढ़ा था, जो बहुत ही शर्मनाक बात है।
पॉलिटीकल एंड इकोनोमिक रिस्क कंसलटैंसी लिमिटेड (पीईआरसी) ने भारत को भ्रष्टाचार के मामले में शून्य से दस अंक के पैमाने पर 8.67 अंक प्रदान किए हैं। जिसे पतन की दृष्टि से भारत के लिए खतरे की घंटी कहा जा सकता है।
इस स्थिति को देखकर यह स्पष्ट एवं निरपेक्ष रूप से कहा जा सकता है कि आज भारत में भ्रष्टाचार बड़ी तीव्र गति से फैल रहा है। यही नहीं बल्कि इसके अतिरिक्त हत्याएं, बलात्कार, चोरी-डकैती, नशाखोरी और अपहरण जैसे अपराध जंगल में आग की तरह फैल रहे हैं, जिससे समाज व राष्ट्र का पल पल में नैतिक पतन हो रहा है। और विश्व में भारत अपनी साख खोता जा रहा है।
भगवान बुद्घ : अहिंसा के पुजारी
क्या है बौद्घ
धर्म!

ND
बौद्घ धर्म को हम मानवीय धर्म कह सकते हैं, क्योंकि बुद्घ धर्म ईश्वर को नहीं, मनुष्य को महत्व देता है। भगवान बुद्घ ने अहिंसा की शिक्षा के साथ ही अपने धर्म के अंग के तौर पर सामाजिक, बौद्घिक, आर्थिक, राजनैतिक स्वतंत्रता एवं समानता की शिक्षा दी है। उनका मुख्य ध्येय इंसान को इसी धरती पर इसी जीवन में विमुक्ति दिलाना था, न कि मृत्यु के बाद स्वर्ग प्राप्ति का काल्पनिक वादा करना।
बुद्घ ने साफ कहा था कि उनका उपदेश स्वयं उनके विचार पर आधारित है, उसे दूसरे तब स्वीकार करें, जब वे उसे अपने विचार और अनुभव से सही पाएं। जिस प्रकार एक सुनार सोने की परीक्षा करता है, उसी प्रकार मेरे उपदेशों की परीक्षा करनी चाहिए। दूसरे किसी भी धर्म संस्थापक ने कभी यह बात नहीं की।
यही कारण है कि डॉ. अम्बेडकर ने दूसरे किसी धर्म को न अपना कर बौद्घ धर्म का ही चुनाव किया। डॉ. अम्बेडकर के अनुसार बौद्घ धर्म नैतिकता पर आधारित, विज्ञान से संबंध रखने वाला धर्म है। फिर भी हम यदि बौद्घ ग्रंथों में कोई विवरण आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान के विरुद्घ पाते हैं तो बौद्घ होने के नाते हम उसे अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र हैं। ऐसी स्वतंत्रता अन्य किसी भी धर्म में नहीं है।
डॉ. अम्बेडकर के अनुसार धर्म प्रत्येक समाज के लिए नैतिकता का निर्धारक तत्व होता है और उस समाज में अनुशासन बनाए रखने के लिए धम्म की कुछ शर्तें पूरी करनी होती है, जिसे विज्ञान सम्मत या बुद्घिसंगत होना चाहिए, साथ ही उसे स्वतंत्रता समता और बंधुत्व के मूलभूत तत्वों को मान्य करना चाहिए और उसे गरीबी का समर्थन नहीं करना चाहिए।

ND
डॉ. आम्बेडकर के अनुसार बौद्घ धर्म उक्त सभी
कसौटियों पर खरा उतरता है। यद्यपि बौद्घ धर्म बहुत ही प्राचीन धर्म है और अपने ढाई
हजार वर्षों की अवधि में अनेक उतार-चढ़ाव से वह गुजरा है,
जिसका कुछ समय के लिए तेजी से अवनति हुई, किंतु बाबा साहेब
द्वारा सामुदायिक धम्म स्वीकार आंदोलन के बाद भारत में यह तेजी से प्रसारित हुआ
है। इस आंदोलन ने हम दलितों को मनुष्य का दर्जा दिलाया है,
जिससे हम कई तरह से स्वतंत्रता का अनुभव कर रहे हैं।
इस धम्मक्रांति के कई वर्षों बाद भी जो समस्याएं हैं, उसका कारण है कि हम ये समझ ही नहीं पाए हैं कि डॉ. अम्बेडकर ने बौद्घ धर्म ही क्यों चुना? इसी तरह सामूहिक धर्म परिवर्तन के आंदोलन के महत्व को समझने में हमारी असफलता रही है, साथ ही इस आंदोलन को हम उस विशाल दृष्टिकोण से देख ही नहीं पाते, समझ ही नहीं पाते और यही कारण है कि हम अपने दायरे से ऊपर किसी महान कार्य करने की भावना से प्रेरित नहीं हो पाते इसलिए धर्म क्रांति के कार्य करने के बारे में विचार नहीं करते, उल्टे हम बहुत ही संकीर्ण विचार से व्यक्तिगत मामलों में ही उलझे रहते हैं।
एक प्रश्न है, जिसका उत्तर प्रत्येक धर्म को अवश्य देना चाहिए कि शोषितों को पैरों तले कुचले लोगों के लिए वह किस तरह की मानसिक और नैतिक राहत पहुंचाता है? क्या हिन्दू धर्म पिछड़े वर्गों और अछूत जातियों, जनजातियों के करोड़ों लोगों को कोई मानसिक और नैतिक राहत पहुंचाता है? तय है ऐसा नहीं है।
वर्तमान का समय बौद्घ धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए बिल्कुल अनुकूल दिखाई देता है। एक समय था, जब धर्म के गुण और अवगुणों की परख करने का सवाल ही नहीं उठता था, इसलिए धर्म आदमी के उत्तराधिकार का अंग हुआ करता था, जो पैतृक संपत्ति प्राप्त करने योग्य भी है कि नहीं का प्रश्न तो उठाया करते थे, लेकिन ऐसा कोई उत्तराधिकारी नहीं था जो यह प्रश्न करता कि क्या उसके माता-पिता का धर्म अपनाने योग्य है?
लगता है अब समय बदल चुका है। संसार भर में अब बहुत से लोगों में उत्तराधिकार में पाए जाने वाले धर्म के बारे में प्रश्न करने का अद्भुत साहस दिखाया है, जिसके लिए कारण चाहे जो भी हो, यह सत्य है कि धर्म के बारे में लोगों के मन में जांच-पड़ताल करने की भावना पैदा हो चुकी है, इसलिए कौन सा धर्म अपनाने योग्य है, इस पर साहसपूर्वक प्रश्न किया जाने लगा है।
ऐसी स्थिति में बौद्घों या बौद्घ राष्ट्रों को चाहिए कि बुद्घ धर्म का प्रचार-प्रसार करना अपना कर्तव्य मानते हुए यह मानना ही होगा कि नैतिकता का धर्म बौद्घ धर्म का प्रसार करना ही वास्तविक मानवता की सेवा करना है।
इस धम्मक्रांति के कई वर्षों बाद भी जो समस्याएं हैं, उसका कारण है कि हम ये समझ ही नहीं पाए हैं कि डॉ. अम्बेडकर ने बौद्घ धर्म ही क्यों चुना? इसी तरह सामूहिक धर्म परिवर्तन के आंदोलन के महत्व को समझने में हमारी असफलता रही है, साथ ही इस आंदोलन को हम उस विशाल दृष्टिकोण से देख ही नहीं पाते, समझ ही नहीं पाते और यही कारण है कि हम अपने दायरे से ऊपर किसी महान कार्य करने की भावना से प्रेरित नहीं हो पाते इसलिए धर्म क्रांति के कार्य करने के बारे में विचार नहीं करते, उल्टे हम बहुत ही संकीर्ण विचार से व्यक्तिगत मामलों में ही उलझे रहते हैं।
एक प्रश्न है, जिसका उत्तर प्रत्येक धर्म को अवश्य देना चाहिए कि शोषितों को पैरों तले कुचले लोगों के लिए वह किस तरह की मानसिक और नैतिक राहत पहुंचाता है? क्या हिन्दू धर्म पिछड़े वर्गों और अछूत जातियों, जनजातियों के करोड़ों लोगों को कोई मानसिक और नैतिक राहत पहुंचाता है? तय है ऐसा नहीं है।
वर्तमान का समय बौद्घ धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए बिल्कुल अनुकूल दिखाई देता है। एक समय था, जब धर्म के गुण और अवगुणों की परख करने का सवाल ही नहीं उठता था, इसलिए धर्म आदमी के उत्तराधिकार का अंग हुआ करता था, जो पैतृक संपत्ति प्राप्त करने योग्य भी है कि नहीं का प्रश्न तो उठाया करते थे, लेकिन ऐसा कोई उत्तराधिकारी नहीं था जो यह प्रश्न करता कि क्या उसके माता-पिता का धर्म अपनाने योग्य है?
लगता है अब समय बदल चुका है। संसार भर में अब बहुत से लोगों में उत्तराधिकार में पाए जाने वाले धर्म के बारे में प्रश्न करने का अद्भुत साहस दिखाया है, जिसके लिए कारण चाहे जो भी हो, यह सत्य है कि धर्म के बारे में लोगों के मन में जांच-पड़ताल करने की भावना पैदा हो चुकी है, इसलिए कौन सा धर्म अपनाने योग्य है, इस पर साहसपूर्वक प्रश्न किया जाने लगा है।
ऐसी स्थिति में बौद्घों या बौद्घ राष्ट्रों को चाहिए कि बुद्घ धर्म का प्रचार-प्रसार करना अपना कर्तव्य मानते हुए यह मानना ही होगा कि नैतिकता का धर्म बौद्घ धर्म का प्रसार करना ही वास्तविक मानवता की सेवा करना है।
बौद्ध भिक्षुणी आम्रपाली
उपेक्षित
है आम्रपाली की कला चेतना

·
विश्व को अहिंसा का मंत्र बताने वाले भगवान बुद्ध को अपने मानवीय तत्व से आकर्षित और प्रभावित करने वाली वैशाली गणतंत्र की राजनर्तकी 'आम्रपाली' की कला चेतना अध्ययन तथा शोध के अभाव में आज भी उपेक्षित है।
विश्व को अहिंसा का मंत्र बताने वाले भगवान बुद्ध को अपने मानवीय तत्व से आकर्षित और प्रभावित करने वाली वैशाली गणतंत्र की राजनर्तकी 'आम्रपाली' की कला चेतना अध्ययन तथा शोध के अभाव में आज भी उपेक्षित है।
इतिहासकारों
के अनुसार अपने सौंदर्य की ताकत से कई साम्राज्य को मिटा देने वाली आम्रपाली का
जन्म आज से करीब 25 सौ वर्ष
पूर्व वैशाली के आम्रकुंज में हुआ था। वह वैशाली गणतंत्र के महनामन नामक एक सामंत
को मिली थी और बाद में वह सामंत राजसेवा से त्याग पत्र देकर आम्रपाली को
पुरातात्विक वैशाली के निकट आज के अंबारा गाँव चला आया। जब आम्रपाली की उम्र करीब 11 वर्ष हुई तो सामंत उसे लेकर फिर
वैशाली लौट आया।
इतिहासकारों का मानना है कि 11 वर्ष की छोटी-सी उम्र में ही आम्रपाली को सर्वश्रेष्ठ सुंदरी घोषित कर नगरवधु या वैशाली जनपद 'कल्याणी' बना दिया गया था। इसके बाद गणतंत्र वैशाली के कानून के तहत आम्रपाली को राजनर्तकी बनना पड़ा।
प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग के यात्रा वृतांतों में भी वैशाली गणतंत्र और आम्रपाली पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। दोनों ने लगभग एकमत से आम्रपाली को सौंदर्य की मूर्ति बताया। वैशाली गणतंत्र के कानून के अनुसार हजारों सुंदरियों में आम्रपाली का चुनाव कर उसे सर्वश्रेष्ठ सुंदरी घोषित कर जनपद कल्याणी की पदवी दी गई थी।
इतिहासकारों का मानना है कि 11 वर्ष की छोटी-सी उम्र में ही आम्रपाली को सर्वश्रेष्ठ सुंदरी घोषित कर नगरवधु या वैशाली जनपद 'कल्याणी' बना दिया गया था। इसके बाद गणतंत्र वैशाली के कानून के तहत आम्रपाली को राजनर्तकी बनना पड़ा।
प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग के यात्रा वृतांतों में भी वैशाली गणतंत्र और आम्रपाली पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। दोनों ने लगभग एकमत से आम्रपाली को सौंदर्य की मूर्ति बताया। वैशाली गणतंत्र के कानून के अनुसार हजारों सुंदरियों में आम्रपाली का चुनाव कर उसे सर्वश्रेष्ठ सुंदरी घोषित कर जनपद कल्याणी की पदवी दी गई थी।

ND
आम्रपाली के रूप की चर्चा जगत
प्रसिद्ध थी और उस समय उसकी एक झलक पाने के लिए सुदूर देशों के अनेक राजकुमार उसके
महल के चारों ओर अपनी छावनी डाले रहते थे। वैशाली में गौतम बुद्ध के प्रथम पदार्पण
पर उनकी कीर्ति सुनकर उनके स्वागत के लिए सोलह श्रृंगार कर अपनी परिचारिकाओं सहित
गंडक नदी की तीर पर पहुँची।
आम्रपाली को देखकर बुद्ध को अपने शिष्यों से कहना पड़ा कि तुम लोग अपनी आँखें बंद कर लो..., क्योंकि भगवान बुद्ध जानते थे कि आम्रपाली के सौंदर्य को देखकर उनके शिष्यों के लिए संतुलन रखना कठिन हो जाएगा।
माना जाता है कि आम्रपाली के मानवीय तत्व से ही प्रभावित होकर भगवान बुद्ध ने भिक्षुणी संघ की स्थापना की थी। इस संघ के जरिए भिक्षुणी आम्रपाली ने नारियों की महत्ता को जो प्रतिष्ठा दी वह उस समय में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी।
आम्रपाली को देखकर बुद्ध को अपने शिष्यों से कहना पड़ा कि तुम लोग अपनी आँखें बंद कर लो..., क्योंकि भगवान बुद्ध जानते थे कि आम्रपाली के सौंदर्य को देखकर उनके शिष्यों के लिए संतुलन रखना कठिन हो जाएगा।
माना जाता है कि आम्रपाली के मानवीय तत्व से ही प्रभावित होकर भगवान बुद्ध ने भिक्षुणी संघ की स्थापना की थी। इस संघ के जरिए भिक्षुणी आम्रपाली ने नारियों की महत्ता को जो प्रतिष्ठा दी वह उस समय में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी।

ND
मगध
सम्राट बिंबसार ने आम्रपाली को पाने के लिए वैशाली पर जब आक्रमण किया तब
संयोगवश उसकी पहली मुलाकात आम्रपाली से ही हुई। आम्रपाली के रूप-सौंदर्य पर मुग्ध
होकर बिंबसार पहली ही नजर में अपना दिल दे बैठा। माना जाता है कि आम्रपाली से
प्रेरित होकर बिंबसार ने अपने राजदरबार में राजनर्तकी के प्रथा की शुरुआत की थी।
बिंबसार को आम्रपाली से एक पुत्र भी हुआ जो बाद में बौद्ध भिक्षु बना।
बौद्ध धर्म के इतिहास में आम्रपाली द्वारा अपने आम्रकानन में भगवान बुद्ध और उनके शिष्यों को निमंत्रित कर भोजन कराने के बाद दक्षिणा के रूप में वह आम्रकानन भेंट देने की बड़ी ख्याति है। इस घटना के बाद ही बुद्ध ने स्त्रियों को बौद्ध संघ में प्रवेश की अनुमति दी थी। आम्रपाली इसके बाद सामान्य बौद्ध भिक्षुणी बन गई और वैशाली के हित के लिए उसने अनेक कार्य किए। उसने केश कटा कर भिक्षा पात्र लेकर सामान्य भिक्षुणी का जीवन व्यतीत किया।
विदेशी पर्यटकों के यात्रा वृतांतों में वैशाली और वैशाली की नगर वधु अप्रतिम सुंदरी आम्रपाली का जो वर्णन किया गया है न केवल काफी महत्वपूर्ण है बल्कि इससे वैशाली गणराज्य के वैभव-संपन्नता और स्वर्णिम इतिहास की झलक भी मिलती है।
करीब डेढ़ दशक पूर्व वैशाली महोत्सव समिति ने अंबारा गाँव में आम्रपाली की संगमरमर की एक आदमकद प्रतिमा स्थापित करने और आकर्षक आम्रकानन के निर्माण की योजना तैयार की थी। इसके साथ ही वहाँ स्थित प्राकृत जैन शोध संस्थान में उसकी कला चेतना के अध्ययन तथा शोध की व्यवस्था होनी थी, लेकिन अभी तक इस योजना को मूर्त रूप देने मे प्रशासन विफल रहा है जिससे आम्रपाली आज भी उपेक्षित है। (वार्ता)
बौद्ध धर्म के इतिहास में आम्रपाली द्वारा अपने आम्रकानन में भगवान बुद्ध और उनके शिष्यों को निमंत्रित कर भोजन कराने के बाद दक्षिणा के रूप में वह आम्रकानन भेंट देने की बड़ी ख्याति है। इस घटना के बाद ही बुद्ध ने स्त्रियों को बौद्ध संघ में प्रवेश की अनुमति दी थी। आम्रपाली इसके बाद सामान्य बौद्ध भिक्षुणी बन गई और वैशाली के हित के लिए उसने अनेक कार्य किए। उसने केश कटा कर भिक्षा पात्र लेकर सामान्य भिक्षुणी का जीवन व्यतीत किया।
विदेशी पर्यटकों के यात्रा वृतांतों में वैशाली और वैशाली की नगर वधु अप्रतिम सुंदरी आम्रपाली का जो वर्णन किया गया है न केवल काफी महत्वपूर्ण है बल्कि इससे वैशाली गणराज्य के वैभव-संपन्नता और स्वर्णिम इतिहास की झलक भी मिलती है।
करीब डेढ़ दशक पूर्व वैशाली महोत्सव समिति ने अंबारा गाँव में आम्रपाली की संगमरमर की एक आदमकद प्रतिमा स्थापित करने और आकर्षक आम्रकानन के निर्माण की योजना तैयार की थी। इसके साथ ही वहाँ स्थित प्राकृत जैन शोध संस्थान में उसकी कला चेतना के अध्ययन तथा शोध की व्यवस्था होनी थी, लेकिन अभी तक इस योजना को मूर्त रूप देने मे प्रशासन विफल रहा है जिससे आम्रपाली आज भी उपेक्षित है। (वार्ता)
बुद्ध के उपदेश –
Teachings of Buddha
बुद्ध ने बहुत ही सरल और उस समय बोली जाने
वाली भाषा पाली में अपना उपदेश दिया था. यदि आपको परीक्षा
में सवाल आये कि बुद्ध ने उपदेश किस भाषा में दिया था तो उसका उत्तर पाली होगा, नाकि
संस्कृत या हिंदी. चूँकि पाली भाषा उस समय की आम भाषा थी तो इसके चलते बुद्ध के
उपदेश का प्रसार दूर-दूर तक हुआ. बुद्ध ने कहा कि मनुष्य को सभी प्रकार के दुःखों
से दूर रहना चाहिए. उन्होंने जीवन के ऐसे चार सत्यों का वर्णन किया जिन्हें
उन्होंने हमेशा याद रखने की सलाह दी. वे चार सत्य हैं –
बुद्ध
के उपदेश
1. जन्म,
मृत्यु, रोग, इच्छा
आदि सभी दुःख देते हैं.
2.
किसी प्रकार की इच्छा
सभी दुःखों का कारण है.
3.
तृष्णाओं पर नियंत्रण
करना चाहिए ताकि हम दुःख से बच सकें.
4.
सांसारिक दुःखों को
दूर करने के आठ मार्ग हैं. इन्हें आष्टांगिक
मार्ग या मध्यम मार्ग कहा गया है. मध्यम
मार्ग को अपनाकर मनुष्य निर्वाण प्राप्त करने में सक्षम है.
आष्टांगिक
मार्ग
1. सम्यक्
(शुद्ध) दृष्टि – सत्य, असत्य,
पाप-पुण्य आदि के भेड़ों को समझना
2.
सम्यक् संकल्प –
इच्छा और हिंसा के विचारों का त्याग करना
3.
सम्यक् वाणी –
सत्य और विनम्र वाणी बोलना
4.
सम्यक् कर्म –
सदा सही और अच्छे कार्य करना
5.
सम्यक् आजीव –
जीविका के उपार्जन हेतु सही तरीके से धन कमाना
6.
सम्यक् व्यायाम –
बुरी भावनाओं से दूर रहना
7.
सम्यक् स्मृति –
अच्छी बातों तथा अच्छे आचरण का प्रयोग करना
8.
सम्यक् समाधि –
किसी विषय पर एकाग्रचित होकर विचार करना
बुद्ध ने अनेक बौद्ध संघ की स्थापना की.
इन्हें विहार कहा जाता था. संघ में सभी जाति के लोगों को प्रवेश करने की अनुमति
थी. ये अत्यंत सादा जीवन जीते थे. भिक्षा माँगकर अपनी आवश्यकताओं को पूरा करते थे.
इसलिए ये भिक्षु या भिक्षुणी कहलाते थे.
सरल और प्रभावी
उपदेश के चलते बौद्ध धर्म देश-विदेश में अत्यंत लोकप्रिय हुआ. बौद्ध धर्म का पहला
सम्मलेन (संगीति) मगध की राजधानी राजगृह (राजगीर) में हुआ. इसमें त्रिपिटक नामक बौद्धग्रन्थ का
संग्रह किया गया. इस धर्म ने महान अशोक को बहुत प्रभावित किया. राजा अशोक ने इसी
धर्म के प्रभाव से अपनी साम्राज्यवादी नीति का त्याग कर दिया और अपना शेष जीवन
प्रजा की भलाई और बौद्ध धर्म का देश-विदेश में प्रचार-प्रसार में लगाया.
बौद्ध धर्म ने
बहुत हद तक ब्राह्मणवाद और प्रचलित धार्मिक कर्मकांड जैसे यज्ञ, बलि आदि की निंदा की.
बौद्ध विहारों के चलते नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का विकास हुआ, जहाँ दूर-दूर से देश
विदेश से लोग अध्ययन हेतु आते थे.
आर्याष्टांगमार्ग महात्मा बुद्ध की प्रमुख
शिक्षाओं में से एक है जो दुखों से मुक्ति पाने एवं आत्म-ज्ञान के साधन के रूप में
बताया गया है। अष्टांग मार्ग के सभी 'मार्ग'
, 'सम्यक' शब्द से आरम्भ होते हैं (सम्यक = अच्छी या सही)।
बौद्ध प्रतीकों में प्रायः अष्टांग मार्गों को धर्मचक्र के आठ ताड़ियों (spokes)
द्वारा निरूपित किया जाता है।
बौद्ध धर्म के अनुसार, चौथे आर्य सत्य
का आर्य अष्टांग मार्ग है - दुःख निरोध पाने का रास्ता। गौतम बुद्ध कहते थे कि चार
आर्य सत्य की सत्यता का निश्चय करने के लिए इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए :
१.
सम्यक दृष्टि : चार आर्य सत्य में
विश्वास करना
२.
सम्यक संकल्प : मानसिक और नैतिक
विकास की प्रतिज्ञा करना
३.
सम्यक वाक : हानिकारक बातें और
झूठ न बोलना
४.
सम्यक कर्म : हानिकारक कर्म न
करना
५.
सम्यक जीविका : कोई भी स्पष्टतः या
अस्पष्टतः हानिकारक व्यापार न करना
६.
सम्यक प्रयास : अपने आप सुधरने की
कोशिश करना
७.
सम्यक स्मृति : स्पष्ट ज्ञान से
देखने की मानसिक योग्यता पाने की कोशिश करना
८.
सम्यक समाधि : निर्वाण पाना और
स्वयं का गायब होना
भगवान बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग :
भगवान बुद्ध ने अष्टांगिक
मार्ग का उपदेश दिया था। बौद्ध धर्म अनुयायी इन्हीं मार्गों पर चलकर मोक्ष प्राप्त
करते हैं। बुद्ध द्वारा बताए गए इन 8 मार्गों का अपना अलग मतलब है।
आइए जानते हैं।
1. सम्यक दृष्टि :
चार आर्य सत्यों को मानना, जीव हिंसा नहीं करना, चोरी नहीं करना, व्यभिचार( पर-स्त्रीगमन) नहीं
करना, ये
शारीरिक सदाचरण हैं। इसके अलावा बुद्ध ने वाणी के सदाचरण का पाठ भी पढ़ाया। जिसमें
मनुष्यों को झूठ न बोलना, चुगली
नहीं करना, कठोर वचन
नहीं बोलने की शिक्षा दी गई। लालच नहीं करना, द्वेष नहीं करना, सम्यक दृष्टि रखना ये मन के
सदाचरण है।
2. सम्यक संकल्प :
चित्त से राग-द्वेष नहीं करना, ये जानना की राग-द्वेष रहित मन
ही एकाग्र हो सकता है, करुणा, मैत्री, मुदिता, समता रखना, दुराचरण (सदाचरण के विपरीत
कार्य) ना करने का संकल्प लेना, सदाचरण करने का संकल्प लेना, धम्म पर चलने का संकल्प लेना।
3. सम्यक वाणी :
सम्यक वाणी में आता है, सत्य बोलने का अभ्यास करना, मधुर बोलने का अभ्यास करना, धम्म चर्चा करने का अभ्यास करना।
बौद्ध धर्म इंसान को मुधर वाणी सिखाता है।
5.
सम्यक कर्मांत :
6.
सम्यक कर्मांत में आता है, प्राणियों के जीवन की रक्षा का
अभ्यास करना, चोरी ना
करना, पर-स्त्रीगमन
नहीं करना। बुद्ध ने सत्य और न्याय के लिए हिंसा को, यदि आवश्यक हो तो जायज ठहराया।
5. सम्यक आजीविका :
मेहनत से आजीविका अर्जन करना, पाँच प्रकार के व्यापार नहीं
करना, जिनमे
आते हैं, शस्त्रों
का व्यापार, जानवरों
का व्यापार, मांस का
व्यापार, मद्य का
व्यापार, विष का
व्यापार, इनके
व्यापार से आप दूसरों की हानि का कारण बनते हो।
6. सम्यक व्यायाम :
आष्टांगिक मार्ग का पालन करने
का अभ्यास करना, शुभ
विचार पैदा करने वाली चीजों/बातों को मन मे रखना, पापमय विचारो के दुष्परिणाम को
सोचना, उन
वितर्कों को मन मे जगह ना देना, उन वितर्कों को संस्कार स्वरूप मानना, गलत वितर्क मन मे आए तो निग्रह
करना, दबाना, संताप करना।
7. सम्यक स्मृति :
कायानुपस्सना, वेदनानुपस्सना, चित्तानुपस्सना, धम्मानुपस्सना, ये सब मिलकर विपस्सना साधना
कहलाता है, जिसका
अर्थ है, स्वयं को
ठीक प्रकार से देखना। ये जानना की राग-द्वेष रहित मन ही एकाग्र हो सकता है। किसी
भी मनुष्य को, जिसे
स्वयं को जानने की इच्छा हो, को विपस्सना जरूर करनी चाहिए, इसी से दुख-निवारण के पथ की
शुरुआत होगी।
8. सम्यक समाधि :
अनुत्पन्न पाप धर्मो को ना
उत्पन्न होने देना, उत्पन्न
पाप धर्मो के विनाश मे रुचि लेना, अनुत्पन्न कुशल धर्मो के उत्पत्ति मे रुचि, उत्पन्न कुशल धर्मो के वृद्धि
मे रुचि। इन सबको शब्दशः पालन करने से जीवन सुखमय होगा, निर्वाण (सास्वत खुशी, परमानंद एवं विश्राम की स्थिति)
की प्राप्ति होगी।
कुछ लोग आर्य अष्टांग मार्ग को पथ की तरह समझते है,
जिसमें आगे बढ़ने के लिए, पिछले के स्तर को
पाना आवश्यक है। और लोगों को लगता है कि इस मार्ग के स्तर सब साथ-साथ पाए जाते है।
मार्ग को तीन हिस्सों में वर्गीकृत किया जाता है : प्रज्ञा,
शील और समाधि।
भगवान् बुद्ध ने बताया कि
तृष्णा ही सभी दु:खों का मूल कारण है। तृष्णा के कारण संसार की विभिन्न वस्तुओं की
ओर मनुष्य प्रवृत्त होता है; और जब वह उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता अथवा जब वे
प्राप्त होकर भी नष्ट हो जाती हैं तब उसे दु:ख होता है। तृष्णा के साथ मृत्यु
प्राप्त करनेवाला प्राणी उसकी प्रेरणा से फिर भी जन्म ग्रहण करता है और संसार के
दु:खचक्र में पिसता रहता है। अत: तृष्णा का सर्वथा प्रहाण करने का जो मार्ग है वही
मुक्ति का मार्ग है। इसे दु:ख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा कहते हैं। भगवान् बुद्ध ने
इस मार्ग के आठ अंग बताए हैं :
सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वचन,
सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम,
सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि।
इस मार्ग के प्रथम दो अंग प्रज्ञा के और अंतिम दो समाधि के हैं। बीच के चार
शील के हैं। इस तरह शील, समाधि और प्रज्ञा इन्हीं तीन में आठों अंगों का
सन्निवेश हो जाता है। शील शुद्ध होने पर ही आध्यात्मिक जीवन में कोई प्रवेश पा
सकता है। शुद्ध शील के आधार पर मुमुक्षु ध्यानाभ्यास कर समाधि का लाभ करता है और
समाधिस्थ अवस्था में ही उसे सत्य का साक्षात्कार होता है। इसे प्रज्ञा कहते हैं,
जिसके उद्बुद्ध होते ही साधक को सत्ता मात्र के अनित्य,
अनाम और दु:खस्वरूप का साक्षात्कार हो जाता है। प्रज्ञा के आलोक में इसका
अज्ञानांधकार नष्ट हो जाता है। इससे संसार की सारी तृष्णाएं चली जाती हैं।
वीततृष्ण हो वह कहीं भी अहंकार ममकार नहीं करता और सुख दु:ख के बंधन से ऊपर उठ
जाता है। इस जीवन के अनंतर, तृष्णा के न होने के कारण,
उसके फिर जन्म ग्रहण करने का कोई हेतु नहीं रहता। इस प्रकार,
शील-समाधि-प्रज्ञावाला मार्ग आठ अंगों में विभक्त हो आर्य आष्टांगिक मार्ग
कहा जाता है।
जो
आठ, बुद्ध
ने आर्य — अष्टांगिक
मार्ग कहा है, उस
संबंध में थोड़ी सी बात समझ लेनी चाहिए।
पहला सूत्र है:
आठ अंगों में—सम्यक दृष्टि।
जो है, वही देखना। जैसा है वैसा ही देखना। अन्यथा न करना।
कोई धारणा बीच में न लानी। कामना, वासना धारणा को बीच में न लाना।
जो है, जैसा है, वैसा ही देखना। अब यह अग्निदत्त बुद्ध के सामने खड़ा है, लेकिन जो है, जैसा है, वैसा नहीं देख रहा है। सोचता है यह क्षत्रिय है, सोचता है यह वेद—विरोधी है, ये धारणाएं हैं। नागराज पहचान सके मौद्गलायन को और अग्निदत्त चूक गया! कैसे चूका होगा? धारणाओं के कारण।
काश, धारणाओं को हटाकर, धारणाओं के मेघों को हटाकर देखता, तो जो था वह उसे भी दिखायी पड़ जाता। इसको कहते हैं—सम्यक दृष्टि।
पहला सूत्र है:
आठ अंगों में—सम्यक दृष्टि।
जो है, वही देखना। जैसा है वैसा ही देखना। अन्यथा न करना।
कोई धारणा बीच में न लानी। कामना, वासना धारणा को बीच में न लाना।
जो है, जैसा है, वैसा ही देखना। अब यह अग्निदत्त बुद्ध के सामने खड़ा है, लेकिन जो है, जैसा है, वैसा नहीं देख रहा है। सोचता है यह क्षत्रिय है, सोचता है यह वेद—विरोधी है, ये धारणाएं हैं। नागराज पहचान सके मौद्गलायन को और अग्निदत्त चूक गया! कैसे चूका होगा? धारणाओं के कारण।
काश, धारणाओं को हटाकर, धारणाओं के मेघों को हटाकर देखता, तो जो था वह उसे भी दिखायी पड़ जाता। इसको कहते हैं—सम्यक दृष्टि।
दूसरा
है—सम्यक
संकल्प।
हठ मत करना।
अक्सर लोग हठ को संकल्प मान लेते हैं और हठी आदमी को कहते हैं, यह संकल्पवान है। जिद्दी को संकल्पवान कहते हैं। जिद्द को, हठ को संकल्प मत मान लेना। जिद्द तो अहंकार है। संकल्प में कोई अहंकार नहीं होता।
हठ और संकल्प में यही फर्क है। हठ में असली मुद्दा अहंकार का है।
आदमी कहता है, ऐसा करके दिखाऊंगा, ऐसा करके रहूंगा।
क्या कर रहा है, इसकी बहुत फिकर नहीं है, लेकिन यह अहंकार का दावा है कि यह करके रहूंगा, नहीं कर पाया तो बड़ी ग्लानि हो जाएगी।
धन में रस नहीं है, लेकिन धनी होकर दिखाना है।
पद में रस नहीं है, लेकिन पदवान होकर दिखाना है। कुछ करके दिखाना है। यह जो बात है, यह असम्यक संकल्प है।
बुद्ध कहते हैं, सम्यक संकल्प का अर्थ होता है जो करने योग्य है, वह करना है। और जो करने योग्य है, उस पर पूरा जीवन दाव पर लगा देना है। लेकिन किसी अहंकार के कारण नहीं, वह करने योग्य है, इसलिए।
हठ मत करना।
अक्सर लोग हठ को संकल्प मान लेते हैं और हठी आदमी को कहते हैं, यह संकल्पवान है। जिद्दी को संकल्पवान कहते हैं। जिद्द को, हठ को संकल्प मत मान लेना। जिद्द तो अहंकार है। संकल्प में कोई अहंकार नहीं होता।
हठ और संकल्प में यही फर्क है। हठ में असली मुद्दा अहंकार का है।
आदमी कहता है, ऐसा करके दिखाऊंगा, ऐसा करके रहूंगा।
क्या कर रहा है, इसकी बहुत फिकर नहीं है, लेकिन यह अहंकार का दावा है कि यह करके रहूंगा, नहीं कर पाया तो बड़ी ग्लानि हो जाएगी।
धन में रस नहीं है, लेकिन धनी होकर दिखाना है।
पद में रस नहीं है, लेकिन पदवान होकर दिखाना है। कुछ करके दिखाना है। यह जो बात है, यह असम्यक संकल्प है।
बुद्ध कहते हैं, सम्यक संकल्प का अर्थ होता है जो करने योग्य है, वह करना है। और जो करने योग्य है, उस पर पूरा जीवन दाव पर लगा देना है। लेकिन किसी अहंकार के कारण नहीं, वह करने योग्य है, इसलिए।
तीसरा
है—सम्यक
वाणी।
जो है वही कहना। जैसा है, वैसा ही कहना।
अन्यथा नहीं, बदलकर नहीं, ऊपर कुछ, भीतर कुछ, ऐसा नहीं।
क्योंकि अगर तुम सत्य की खोज में चले हो,
तो पहली तो शर्त पूरी करनी पडेगी कि तुम सच्चे हो जाओ।
जो सच्चा हो गया है, सत्य का उसी से संबंध जुड़ेगा।
जो झूठा है, उससे सत्य का संबंध न जुड़ सकेगा।
मैंने सुना है, एक छोटा बच्चा घर में आए मेहमानों से बोला, आप सब यहां मरने के लिए आए हैं क्या अंकल? चार वर्षीय राजू की यह बात सुनकर सब मेहमान हैरान रह गए। दादी ने तो बहुत डाटा राजू को और कहा कि यह क्या बोल रहा है? राजू ने कहा, मुझे क्या मालूम, मां ही कह रही थीं मुझे सुबह कि अगर मुझे पता होता कि ये सब यहां आकर मरेंगे तो मैं छुट्टियों में कहीं और चली जाती।
मेहमान घर में आता है, तो भाव कुछ, कहते कुछ, बताते कुछ। सुबह किसी को मिल जाते हो तो मन तो यह होता है—कहां से इस दुष्ट की शकल दिखायी पड़ गयी, मगर ऊपर से कहते हो कि दर्शन हुए बड़े दुर्लभ, बड़े दिनों में दिखायी पड़े, बड़ी कृपा हुई! और भीतर यह कि यह दुष्ट न दिखायी पड़ता तो अच्छा, पता नहीं मुकदमा जीतेंगे कि हारेंगे, यह सुबह से कहां दर्शन हो गए!
सम्यक वाणी का अर्थ होता है, जैसा है—चाहे जो भी कीमत चुकानी पड़े—पाखंड नहीं।
अगर कोई बात पसंद नहीं पड़ती तो निवेदन कर देना कि पसंद नहीं पड़ती। अगर कोई बात पसंद पड़ती है तो निवेदन कर देना कि पसंद पड़ती है। झुठलाना मत। झूठे पाखंड अपने आसपास खड़े मत करना।
मुल्ला नसरुद्दीन का एक बहुत पुराना मित्र उसके घर आया।
तपाक से मुल्ला उठा, पहले हाथ से हाथ मिलाया और फिर गले से गले मिला, फिर प्रसन्नता के अतिरेक में उसे गोद में उठाकर ड्राइंगरूम तक लाया।
अंदर आया तो पत्नी ने कुढूकर पूछा कि मुल्ला, जब मेरी कोई सहेली आती तो तुम्हें जैसे सांप सूंघ जाता है। तब भी कभी प्रसन्न हुए हो इतना? मुल्ला ने कहा, भाग्यवान, कुछ मत पूछ! प्रसन्न तो इससे भी ज्यादा होता हूं, मगर प्रगट नहीं कर सकता। अगर तू कह दे कि प्रगट करने की छूट है, तो अगली दफा देखना। तेरी सहेली को जो पकडूगा, गोद में बिठाऊंगा तो छोडूंगा ही नहीं। मन तो यही होता है कि खूब प्रसन्न होए, लेकिन तेरे डर के कारण नहीं हो पाते।
तुम अपने जीवन में थोड़ा देखना, तुम कुछ हो भीतर, बाहर कुछ बताए चले जाते हो। धीरे— धीरे यह बाहर की पर्त इतनी मजबूत हो जाती है कि तुम भूल ही जाते हो कि तुम भीतर क्या हो। सम्यक वाणी का अर्थ होता है, धीरे — धीरे सभी अर्थों में, दृष्टि में, संकल्प में, वाणी में हृदय की अंतरतम अवस्था को झलकने देना।
जो है वही कहना। जैसा है, वैसा ही कहना।
अन्यथा नहीं, बदलकर नहीं, ऊपर कुछ, भीतर कुछ, ऐसा नहीं।
क्योंकि अगर तुम सत्य की खोज में चले हो,
तो पहली तो शर्त पूरी करनी पडेगी कि तुम सच्चे हो जाओ।
जो सच्चा हो गया है, सत्य का उसी से संबंध जुड़ेगा।
जो झूठा है, उससे सत्य का संबंध न जुड़ सकेगा।
मैंने सुना है, एक छोटा बच्चा घर में आए मेहमानों से बोला, आप सब यहां मरने के लिए आए हैं क्या अंकल? चार वर्षीय राजू की यह बात सुनकर सब मेहमान हैरान रह गए। दादी ने तो बहुत डाटा राजू को और कहा कि यह क्या बोल रहा है? राजू ने कहा, मुझे क्या मालूम, मां ही कह रही थीं मुझे सुबह कि अगर मुझे पता होता कि ये सब यहां आकर मरेंगे तो मैं छुट्टियों में कहीं और चली जाती।
मेहमान घर में आता है, तो भाव कुछ, कहते कुछ, बताते कुछ। सुबह किसी को मिल जाते हो तो मन तो यह होता है—कहां से इस दुष्ट की शकल दिखायी पड़ गयी, मगर ऊपर से कहते हो कि दर्शन हुए बड़े दुर्लभ, बड़े दिनों में दिखायी पड़े, बड़ी कृपा हुई! और भीतर यह कि यह दुष्ट न दिखायी पड़ता तो अच्छा, पता नहीं मुकदमा जीतेंगे कि हारेंगे, यह सुबह से कहां दर्शन हो गए!
सम्यक वाणी का अर्थ होता है, जैसा है—चाहे जो भी कीमत चुकानी पड़े—पाखंड नहीं।
अगर कोई बात पसंद नहीं पड़ती तो निवेदन कर देना कि पसंद नहीं पड़ती। अगर कोई बात पसंद पड़ती है तो निवेदन कर देना कि पसंद पड़ती है। झुठलाना मत। झूठे पाखंड अपने आसपास खड़े मत करना।
मुल्ला नसरुद्दीन का एक बहुत पुराना मित्र उसके घर आया।
तपाक से मुल्ला उठा, पहले हाथ से हाथ मिलाया और फिर गले से गले मिला, फिर प्रसन्नता के अतिरेक में उसे गोद में उठाकर ड्राइंगरूम तक लाया।
अंदर आया तो पत्नी ने कुढूकर पूछा कि मुल्ला, जब मेरी कोई सहेली आती तो तुम्हें जैसे सांप सूंघ जाता है। तब भी कभी प्रसन्न हुए हो इतना? मुल्ला ने कहा, भाग्यवान, कुछ मत पूछ! प्रसन्न तो इससे भी ज्यादा होता हूं, मगर प्रगट नहीं कर सकता। अगर तू कह दे कि प्रगट करने की छूट है, तो अगली दफा देखना। तेरी सहेली को जो पकडूगा, गोद में बिठाऊंगा तो छोडूंगा ही नहीं। मन तो यही होता है कि खूब प्रसन्न होए, लेकिन तेरे डर के कारण नहीं हो पाते।
तुम अपने जीवन में थोड़ा देखना, तुम कुछ हो भीतर, बाहर कुछ बताए चले जाते हो। धीरे— धीरे यह बाहर की पर्त इतनी मजबूत हो जाती है कि तुम भूल ही जाते हो कि तुम भीतर क्या हो। सम्यक वाणी का अर्थ होता है, धीरे — धीरे सभी अर्थों में, दृष्टि में, संकल्प में, वाणी में हृदय की अंतरतम अवस्था को झलकने देना।
चौथा
है—सम्यक
कर्मांत।
वही करना जो वस्तुत: तुम्हारा हृदय करने को कहता है।
व्यर्थ की बातें मत किए चले जाना।
किसी ने कह दिया, तो कर लिया। अक्सर तुम करते हो ऐसा।
पड़ोसी एक मोटर खरीद लाया, कार खरीद लाया, अब तुमको भी खरीदनी है। तुम्हें एक दिन पहले तक कोई कार नहीं खरीदनी थी, तुम बिलकुल मजे में जी रहे थे। अब एक झंझट आ गयी। पड़ोसी का अनुकरण करना है।
अधिक लोग अनुकरण में ही मारे जाते हैं।
सम्यक कर्मांत का अर्थ होता है, वही करना है जो तुम्हें करने योग्य लगता है। ऐसे हर किसी की बात में मत पड़ जाना, नहीं तो तुम्हारी छीछालेदर हो जाएगी। हजारों लोग हजारों ढंग के काम कर रहे हैं, अगर तुम हर दिशा में दौड़ने लगे, तो तुम्हारा कर्म धीरे — धीरे बिखर जाएगा। तुम्हारी धारा हजार खंडों में टूट जाएगी, तुम सागर तक न पहुंच पाओगे।
सम्यक कर्मांत का अर्थ है, एक दिशा पर नजर रखना, जो तुम्हें करना है, वही करना। और— और दिशाओं में अपने जीवन— श्रम को मत बंट जाने देना। तब तुम्हारे भीतर एक समंजन, एक समरसता पैदा होगी।
अभी तो ऐसा है कि बहुत खंड हैं, कुछ कहते, कुछ सोचते, कुछ करते। आज कुछ करते, कल कुछ करते, परसों कुछ करने लगते। इधर एक मकान उठाना शुरू किया, फिर आधा छोड़ दिया, फिर दूसरा मकान बनाने लगे। इधर एक कुआ खोदा दो हाथ, फिर छोड़ दिया, फिर दूसरा कुआ खोदने लगे। ऐसे करते तो तुम बहुत हो, लेकिन फल हाथ नहीं आता। फल आने के लिए सातत्य चाहिए। मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, ध्यान करना कई दफे शुरू करते हैं, फिर बंद हो जाता है। एक दिन करते, दो दिन करते, फिर टूट जाता है। फिर लौटते, फिर करते, फिर टूट जाता। तो फिर नहीं होगा। जीवन में एक सातत्य, एक संकल्प, जो चुना है करने के लिए उसे करते रहने का धीरज, प्रतीक्षा, सहिष्णुता। आज ही फल तो नहीं आ जाएगा। बीज बोए हैं तो वक्त लगेगा, प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, मौसम आएगा ठीक, अनुकूल, तब बीज अंकुरित होंगे, फिर वृक्ष बड़े होंगे, वर्षों लगेंगे तब कहीं फल होंगे—प्रतीक्षा करनी होगी।
वही करना जो वस्तुत: तुम्हारा हृदय करने को कहता है।
व्यर्थ की बातें मत किए चले जाना।
किसी ने कह दिया, तो कर लिया। अक्सर तुम करते हो ऐसा।
पड़ोसी एक मोटर खरीद लाया, कार खरीद लाया, अब तुमको भी खरीदनी है। तुम्हें एक दिन पहले तक कोई कार नहीं खरीदनी थी, तुम बिलकुल मजे में जी रहे थे। अब एक झंझट आ गयी। पड़ोसी का अनुकरण करना है।
अधिक लोग अनुकरण में ही मारे जाते हैं।
सम्यक कर्मांत का अर्थ होता है, वही करना है जो तुम्हें करने योग्य लगता है। ऐसे हर किसी की बात में मत पड़ जाना, नहीं तो तुम्हारी छीछालेदर हो जाएगी। हजारों लोग हजारों ढंग के काम कर रहे हैं, अगर तुम हर दिशा में दौड़ने लगे, तो तुम्हारा कर्म धीरे — धीरे बिखर जाएगा। तुम्हारी धारा हजार खंडों में टूट जाएगी, तुम सागर तक न पहुंच पाओगे।
सम्यक कर्मांत का अर्थ है, एक दिशा पर नजर रखना, जो तुम्हें करना है, वही करना। और— और दिशाओं में अपने जीवन— श्रम को मत बंट जाने देना। तब तुम्हारे भीतर एक समंजन, एक समरसता पैदा होगी।
अभी तो ऐसा है कि बहुत खंड हैं, कुछ कहते, कुछ सोचते, कुछ करते। आज कुछ करते, कल कुछ करते, परसों कुछ करने लगते। इधर एक मकान उठाना शुरू किया, फिर आधा छोड़ दिया, फिर दूसरा मकान बनाने लगे। इधर एक कुआ खोदा दो हाथ, फिर छोड़ दिया, फिर दूसरा कुआ खोदने लगे। ऐसे करते तो तुम बहुत हो, लेकिन फल हाथ नहीं आता। फल आने के लिए सातत्य चाहिए। मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, ध्यान करना कई दफे शुरू करते हैं, फिर बंद हो जाता है। एक दिन करते, दो दिन करते, फिर टूट जाता है। फिर लौटते, फिर करते, फिर टूट जाता। तो फिर नहीं होगा। जीवन में एक सातत्य, एक संकल्प, जो चुना है करने के लिए उसे करते रहने का धीरज, प्रतीक्षा, सहिष्णुता। आज ही फल तो नहीं आ जाएगा। बीज बोए हैं तो वक्त लगेगा, प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, मौसम आएगा ठीक, अनुकूल, तब बीज अंकुरित होंगे, फिर वृक्ष बड़े होंगे, वर्षों लगेंगे तब कहीं फल होंगे—प्रतीक्षा करनी होगी।
पांचवां
है—सम्यक
आजीव।
बुद्ध कहते हैं, हर किसी चीज को आजीविका मत बना लेना।
अब कोई आदमी कसाई बनकर अपनी रोटी कमा रहा है।
यह भी कोई कमाना हुआ! रोटी ही कमानी थी, हजार ढंग से कमा सकते थे, कसाई होने की क्या जरूरत थी? यह बड़ी असम्यक आजीविका है। कि कोई स्त्री वेश्या होकर रोटी कमा रही है! कोई सम्यक आजीविका खोजना। रोटी तो कमानी ही है, यह बात सच है, लेकिन सम्यक खोजना।
और ध्यान रखना, अगर तुम्हारी आजीविका सम्यक हो, तो तुम्हारे जीवन में शांति होगी। अगर तुम्हारी आजीविका सम्यक हो, तो सत्य और तुम्हारे बीच अनेक बाधाएं कम हो जाएंगी। अब अगर कोई आदमी झूठ का ही धंधा कर रहा है—समझो कि वकील है—अब बड़ा मुश्किल होगा इसको जीवन में सत्य को लाना। इसका धंधा ही झूठ है। झूठ इसकी आजीविका है। झूठ में जितना पारंगत होगा, उतनी ही सफलता मिलने वाली है। अब सत्य से तो यह डरेगा। सत्य का तो कोई संबंध ही नहीं इसकी आजीविका से। इसको तो झूठ को ही सत्य सिद्ध करना है। और ध्यान रखना, वही वकील सफल होता है, जो अदालत में झूठ को सत्य सिद्ध ही नहीं करता, बल्कि इस तरह सिद्ध करता है कि लगे कि सत्य है ही। खुद भी आदोलित दिखायी पड़ता है, कि उसे पक्का भरोसा है कि यह सच है। झूठ को बोलते वक्त ऐसे बोलता है कि जैसे वह खुद आंखों से देखा है, सामने मौजूद था। क्योंकि अगर वकील खुद ही आश्वस्त नहीं है तो अदालत को आश्वस्त नहीं कर पाएगा।
अगर भीतर खुद ही जान रहा है कि यह झूठ है, तो झूठ की खबर मिलती रहेगी उसके चेहरे से, ढंग से, जानेगा कि यह मामला तो हारे ही हैं,
जीतना मुश्किल है। तो उदास होगा, प्रफुल्लता न होगी,
बल न होगा, वाणी में प्रभाव न होगा।
सम्यक आजीव का अर्थ है, सृजनात्मक आजीविका। ऐसी कुछ आजीविका चुनना, जो तुम्हारे जीवन को परमात्मा की तरफ ले जाने में सृजनात्मक हो, विध्वंसात्मक न हो।
बुद्ध कहते हैं, हर किसी चीज को आजीविका मत बना लेना।
अब कोई आदमी कसाई बनकर अपनी रोटी कमा रहा है।
यह भी कोई कमाना हुआ! रोटी ही कमानी थी, हजार ढंग से कमा सकते थे, कसाई होने की क्या जरूरत थी? यह बड़ी असम्यक आजीविका है। कि कोई स्त्री वेश्या होकर रोटी कमा रही है! कोई सम्यक आजीविका खोजना। रोटी तो कमानी ही है, यह बात सच है, लेकिन सम्यक खोजना।
और ध्यान रखना, अगर तुम्हारी आजीविका सम्यक हो, तो तुम्हारे जीवन में शांति होगी। अगर तुम्हारी आजीविका सम्यक हो, तो सत्य और तुम्हारे बीच अनेक बाधाएं कम हो जाएंगी। अब अगर कोई आदमी झूठ का ही धंधा कर रहा है—समझो कि वकील है—अब बड़ा मुश्किल होगा इसको जीवन में सत्य को लाना। इसका धंधा ही झूठ है। झूठ इसकी आजीविका है। झूठ में जितना पारंगत होगा, उतनी ही सफलता मिलने वाली है। अब सत्य से तो यह डरेगा। सत्य का तो कोई संबंध ही नहीं इसकी आजीविका से। इसको तो झूठ को ही सत्य सिद्ध करना है। और ध्यान रखना, वही वकील सफल होता है, जो अदालत में झूठ को सत्य सिद्ध ही नहीं करता, बल्कि इस तरह सिद्ध करता है कि लगे कि सत्य है ही। खुद भी आदोलित दिखायी पड़ता है, कि उसे पक्का भरोसा है कि यह सच है। झूठ को बोलते वक्त ऐसे बोलता है कि जैसे वह खुद आंखों से देखा है, सामने मौजूद था। क्योंकि अगर वकील खुद ही आश्वस्त नहीं है तो अदालत को आश्वस्त नहीं कर पाएगा।
अगर भीतर खुद ही जान रहा है कि यह झूठ है, तो झूठ की खबर मिलती रहेगी उसके चेहरे से, ढंग से, जानेगा कि यह मामला तो हारे ही हैं,
जीतना मुश्किल है। तो उदास होगा, प्रफुल्लता न होगी,
बल न होगा, वाणी में प्रभाव न होगा।
सम्यक आजीव का अर्थ है, सृजनात्मक आजीविका। ऐसी कुछ आजीविका चुनना, जो तुम्हारे जीवन को परमात्मा की तरफ ले जाने में सृजनात्मक हो, विध्वंसात्मक न हो।
छठवां
है—सम्यक
व्यायाम।
अति न करना, बुद्ध कहते हैं।
कुछ लोग हैं आलसी और कुछ लोग हैं अति कर्मठ। दोनों ही नुकसान में पड़ जाते हैं। आलसी उठता ही नहीं, तो पहुंचे कैसे! कर्मठ मंजिल के सामने से भी निकल जाता है दौड़ता हुआ, रुके कैसे, वह रुक ही नहीं सकता। रुकने की उन्हें आदत नहीं है।
मैं दोनों तरह के लोगों को जानता हूं, दोनों ध्यान में नहीं पहुंच पाते। आलसी कुछ करता ही नही, कर्मठ ज्यादा कर जाता है! तुम अगर तीर लेकर निशाना लगाने गए हो, तो निशाना सम्यक होना चाहिए। अगर थोड़ा नीचे पड़ा तो भी चूक जाएगा तीर, अगर थोड़ा ऊपर पड़ गया तो भी चूक जाएगा तीर। और जब तुम तीर को चलाओ तब प्रत्यंचा सम्यक खिंचनी चाहिए। अगर थोड़ी कम खिंची, तो पहले ही गिर जाएगा तीर। अगर थोड़ी ज्यादा खिंच गयी, तो आगे निकल जाएगा तीर।
इसलिए बुद्ध का जोर अति वर्जित करने पर है। बुद्ध कहते हैं, सम्यकत्व, मध्य, मज्झिम निकाय। सम्यक व्यायाम।
अति न करना, बुद्ध कहते हैं।
कुछ लोग हैं आलसी और कुछ लोग हैं अति कर्मठ। दोनों ही नुकसान में पड़ जाते हैं। आलसी उठता ही नहीं, तो पहुंचे कैसे! कर्मठ मंजिल के सामने से भी निकल जाता है दौड़ता हुआ, रुके कैसे, वह रुक ही नहीं सकता। रुकने की उन्हें आदत नहीं है।
मैं दोनों तरह के लोगों को जानता हूं, दोनों ध्यान में नहीं पहुंच पाते। आलसी कुछ करता ही नही, कर्मठ ज्यादा कर जाता है! तुम अगर तीर लेकर निशाना लगाने गए हो, तो निशाना सम्यक होना चाहिए। अगर थोड़ा नीचे पड़ा तो भी चूक जाएगा तीर, अगर थोड़ा ऊपर पड़ गया तो भी चूक जाएगा तीर। और जब तुम तीर को चलाओ तब प्रत्यंचा सम्यक खिंचनी चाहिए। अगर थोड़ी कम खिंची, तो पहले ही गिर जाएगा तीर। अगर थोड़ी ज्यादा खिंच गयी, तो आगे निकल जाएगा तीर।
इसलिए बुद्ध का जोर अति वर्जित करने पर है। बुद्ध कहते हैं, सम्यकत्व, मध्य, मज्झिम निकाय। सम्यक व्यायाम।
और
सातवां है—सम्यक
स्मृति।
व्यर्थ को भूलना और सार्थक को सम्हालना।
तुम अक्सर उलटा करते हो, सार्थक तो भूल जाते हो, व्यर्थ को याद रखते हो। कुछ ऐसा है कि हीरे —हीरे तो छोड़ देते हो, कूड़ा—कचरा सब इकट्ठा कर लेते हो। जीवन में जो भी बहुमूल्य है, उसको तो बिसार देते हो। सबसे ज्यादा बहुमूल्य तो तुम्हारी चेतना है, उसको तो तुम बिलकुल बिसारकर बैठ गए हो और ठीकरे इकट्ठे कर रहे हो और उनका हिसाब लगा रहे हो। तिजोड़ी में कितने रुपए हैं, तुम्हें पता है, लेकिन तुम्हारे भीतर कौन बैठा है, यह तुम्हें पता नहीं है। इसको बुद्ध ने कहा, सम्यक स्मृति।
बुद्ध के स्मृति शब्द से ही संतो का सुरति शब्द आया। सुरति स्मृति का ही अपभ्रंश है। जिसको कबीर सुरति कहते हैं, वह बुद्ध की स्मृति ही है। उसको ही थोड़ा मीठा कर लिया—सुरति, अपनी याद, अपनी पहचान।
व्यर्थ को भूलना और सार्थक को सम्हालना।
तुम अक्सर उलटा करते हो, सार्थक तो भूल जाते हो, व्यर्थ को याद रखते हो। कुछ ऐसा है कि हीरे —हीरे तो छोड़ देते हो, कूड़ा—कचरा सब इकट्ठा कर लेते हो। जीवन में जो भी बहुमूल्य है, उसको तो बिसार देते हो। सबसे ज्यादा बहुमूल्य तो तुम्हारी चेतना है, उसको तो तुम बिलकुल बिसारकर बैठ गए हो और ठीकरे इकट्ठे कर रहे हो और उनका हिसाब लगा रहे हो। तिजोड़ी में कितने रुपए हैं, तुम्हें पता है, लेकिन तुम्हारे भीतर कौन बैठा है, यह तुम्हें पता नहीं है। इसको बुद्ध ने कहा, सम्यक स्मृति।
बुद्ध के स्मृति शब्द से ही संतो का सुरति शब्द आया। सुरति स्मृति का ही अपभ्रंश है। जिसको कबीर सुरति कहते हैं, वह बुद्ध की स्मृति ही है। उसको ही थोड़ा मीठा कर लिया—सुरति, अपनी याद, अपनी पहचान।
और
आठवा है—सम्यक
समाधि।
बुद्ध समाधि में भी कहते हैं सम्यक, खयाल रखना। क्यों?
क्योंकि ऐसी भी समाधियां हैं जो सम्यक नहीं हैं—जड़ समाधि।
एक आदमी मूच्छित पड़ जाता है, इसको बुद्ध सम्यक समाधि नहीं कहते। ऐसा आदमी गहरी निद्रा में पड़ गया, बेहोशी। मन के तो पार चला गया है, लेकिन ऊपर नहीं गया, नीचे चला गया। मन तो बंद हो गया, क्योंकि गहरी मूर्च्छा में मन तो बंद हो जाएगा, लेकिन यह बंद होना कुछ काम का न हुआ। मन बंद हो जाए और होश भी बना रहे। मन तो चुप हो जाए, विचार तो बंद हो जाएं, लेकिन बोध न खो जाए।
तीन स्थितियां हैं मन की। स्वप्न, जागृति, सुषुप्ति।
स्वप्न तो बंद होना चाहिए—चाहे सम्यक समाधि हो, चाहे असम्यक समाधि हो, स्वप्न तो दोनों में बंद हो जाएगा, विचार की तरंगें बंद हो जाएंगी। लेकिन जड़ समाधि में आदमी गहरी मूर्च्छा में पड़ गया, सुषुप्ति में डूब गया, उसे होश ही नहीं है। जब वापस लौटेगा तो निश्चित ही शात लौटेगा, बड़ा प्रसन्न लौटेगा, क्योंकि इतना विश्राम मिल गया। लेकिन यह कोई बात न हुई! यह तो नींद का ही प्रयोग हुआ। यह तो योगतंद्रा हुई। असली बात तो तब घटेगी जब तुम भीतर जाओ और होशपूर्वक जाओ। तब तुम प्रसन्न भी लौटोगे, आनंदित भी लौटोगे और प्रज्ञावान होकर भी लौटोगे। तुम बाहर आओगे, तुम्हारी ज्योति और होगी। तुम्हारी प्रभा और होगी। तुम्हारे चारों तरफ रोशनी होगी। तुम्हारे चारों तरफ जीवन में सुगंध होगी।
ऐसा समझो कि एक आदमी को हम स्ट्रेचर पर लिटा लें, क्लोरोफॉर्म दे दें और फिर बगीचे में घुमा दें। तो निश्चित ही उसकी नाक तो काम कर ही रही है, फूलों की गंध भी उसके भीतर जाएगी—उसे पता नहीं चलेगा। और वृक्षों की ताजी हवा भी उसको लगेगी, शीतल भी होगा—उसे पता नहीं चलेगा। फिर जैसे —जैसे वह होश में आने लगे, हम जल्दी उसे बगीचे के बाहर ले जाएं। आंख खोलकर वह कहेगा, अच्छा लगा। कुछ—कुछ भनक याद आएगी—ताजा था, सुगंध थी, मगर ज्यादा कुछ पकड़ में न आएगी। और किस रास्ते गया और किस रास्ते लौटा, यह भी पता नहीं होगा। फिर खुद न जा सकेगा। अगर उसको तुम छोड़ दो जाने को तो खुद न जा सकेगा, रास्ते का पता नहीं है।
दो तरह की समाधियां हैं। जड़ समाधि, आदमी गांजा पीकर जड़ समाधि में चला जाता है, अफीम खाकर जड़ समाधि में चला जाता है; मारीजुआना, एल. एस. डी, मेस्कलीन, इनको लेकर जड़ समाधि में चला जाता है। अभी पश्चिम में जड़ समाधि का खूब प्रभाव चल रहा है। भारत में तो रहा ही बहुत दिनों से —गंजेड़ी, भंगेड़ी, सब तरह के साधु —संन्यासी तुम्हें मिल जाएंगे। वह जड़ समाधियां हैं।
बुद्ध ने उनका बड़ा विरोध किया। बुद्ध ने कहा, यह भी कोई बात है, माना कि सुख मिलता है, इसमें कोई शक नहीं है —तुम भी अगर भंग खाकर डूब गए मस्ती में तो सुख मिलता है। गाजे की दम लगा ली तो डूब गए, एक तरह का सुख मिलता है। शराब भी इसी तरह के सुख को देती है— भूल गए सब, डूब गए अपने में, मगर यह डुबकी नींद की है। यह कोई डुबकी हुई! यह कुछ मनुष्य योग्य हुआ! ऊपर उठो, जागते हुए भीतर जाओ। दीया लेकर भीतर जाओ। मशाल लेकर भीतर जाओ। ताकि सब रास्ता भी उजाला हो जाए और तुम्हें पता भी हो जाए, तो जब जाना हो तब चले जाओ। और तुम फिर किसी चीज पर निर्भर भी न रहोगे।
तो तुमने देखा, हिंदू साधु —संन्यासी तुम्हें मिल जाएंगे कुंभ के मेले में—दम लग रही, सत्संग हो रहा। दम मारो दम! सत्संग हो रहा है, ब्रह्मचर्चा चल रही है! यह कुछ नयी बात नहीं है, इस मुल्क में पांच हजार साल से चल रही है। ये सब समझते हैं कि ये सब शंकर जी के शिष्य हैं। बम भोले!
इसका बुद्ध ने बहुत विरोध किया। क्योंकि बुद्ध ने कहा कि असली ही बात चूंकी जा रही है। असली बात है, जाग्रत होकर आनंद को उपलब्ध हो जाना। उसको उन्होंने सम्यक समाधि कहा।
बुद्ध समाधि में भी कहते हैं सम्यक, खयाल रखना। क्यों?
क्योंकि ऐसी भी समाधियां हैं जो सम्यक नहीं हैं—जड़ समाधि।
एक आदमी मूच्छित पड़ जाता है, इसको बुद्ध सम्यक समाधि नहीं कहते। ऐसा आदमी गहरी निद्रा में पड़ गया, बेहोशी। मन के तो पार चला गया है, लेकिन ऊपर नहीं गया, नीचे चला गया। मन तो बंद हो गया, क्योंकि गहरी मूर्च्छा में मन तो बंद हो जाएगा, लेकिन यह बंद होना कुछ काम का न हुआ। मन बंद हो जाए और होश भी बना रहे। मन तो चुप हो जाए, विचार तो बंद हो जाएं, लेकिन बोध न खो जाए।
तीन स्थितियां हैं मन की। स्वप्न, जागृति, सुषुप्ति।
स्वप्न तो बंद होना चाहिए—चाहे सम्यक समाधि हो, चाहे असम्यक समाधि हो, स्वप्न तो दोनों में बंद हो जाएगा, विचार की तरंगें बंद हो जाएंगी। लेकिन जड़ समाधि में आदमी गहरी मूर्च्छा में पड़ गया, सुषुप्ति में डूब गया, उसे होश ही नहीं है। जब वापस लौटेगा तो निश्चित ही शात लौटेगा, बड़ा प्रसन्न लौटेगा, क्योंकि इतना विश्राम मिल गया। लेकिन यह कोई बात न हुई! यह तो नींद का ही प्रयोग हुआ। यह तो योगतंद्रा हुई। असली बात तो तब घटेगी जब तुम भीतर जाओ और होशपूर्वक जाओ। तब तुम प्रसन्न भी लौटोगे, आनंदित भी लौटोगे और प्रज्ञावान होकर भी लौटोगे। तुम बाहर आओगे, तुम्हारी ज्योति और होगी। तुम्हारी प्रभा और होगी। तुम्हारे चारों तरफ रोशनी होगी। तुम्हारे चारों तरफ जीवन में सुगंध होगी।
ऐसा समझो कि एक आदमी को हम स्ट्रेचर पर लिटा लें, क्लोरोफॉर्म दे दें और फिर बगीचे में घुमा दें। तो निश्चित ही उसकी नाक तो काम कर ही रही है, फूलों की गंध भी उसके भीतर जाएगी—उसे पता नहीं चलेगा। और वृक्षों की ताजी हवा भी उसको लगेगी, शीतल भी होगा—उसे पता नहीं चलेगा। फिर जैसे —जैसे वह होश में आने लगे, हम जल्दी उसे बगीचे के बाहर ले जाएं। आंख खोलकर वह कहेगा, अच्छा लगा। कुछ—कुछ भनक याद आएगी—ताजा था, सुगंध थी, मगर ज्यादा कुछ पकड़ में न आएगी। और किस रास्ते गया और किस रास्ते लौटा, यह भी पता नहीं होगा। फिर खुद न जा सकेगा। अगर उसको तुम छोड़ दो जाने को तो खुद न जा सकेगा, रास्ते का पता नहीं है।
दो तरह की समाधियां हैं। जड़ समाधि, आदमी गांजा पीकर जड़ समाधि में चला जाता है, अफीम खाकर जड़ समाधि में चला जाता है; मारीजुआना, एल. एस. डी, मेस्कलीन, इनको लेकर जड़ समाधि में चला जाता है। अभी पश्चिम में जड़ समाधि का खूब प्रभाव चल रहा है। भारत में तो रहा ही बहुत दिनों से —गंजेड़ी, भंगेड़ी, सब तरह के साधु —संन्यासी तुम्हें मिल जाएंगे। वह जड़ समाधियां हैं।
बुद्ध ने उनका बड़ा विरोध किया। बुद्ध ने कहा, यह भी कोई बात है, माना कि सुख मिलता है, इसमें कोई शक नहीं है —तुम भी अगर भंग खाकर डूब गए मस्ती में तो सुख मिलता है। गाजे की दम लगा ली तो डूब गए, एक तरह का सुख मिलता है। शराब भी इसी तरह के सुख को देती है— भूल गए सब, डूब गए अपने में, मगर यह डुबकी नींद की है। यह कोई डुबकी हुई! यह कुछ मनुष्य योग्य हुआ! ऊपर उठो, जागते हुए भीतर जाओ। दीया लेकर भीतर जाओ। मशाल लेकर भीतर जाओ। ताकि सब रास्ता भी उजाला हो जाए और तुम्हें पता भी हो जाए, तो जब जाना हो तब चले जाओ। और तुम फिर किसी चीज पर निर्भर भी न रहोगे।
तो तुमने देखा, हिंदू साधु —संन्यासी तुम्हें मिल जाएंगे कुंभ के मेले में—दम लग रही, सत्संग हो रहा। दम मारो दम! सत्संग हो रहा है, ब्रह्मचर्चा चल रही है! यह कुछ नयी बात नहीं है, इस मुल्क में पांच हजार साल से चल रही है। ये सब समझते हैं कि ये सब शंकर जी के शिष्य हैं। बम भोले!
इसका बुद्ध ने बहुत विरोध किया। क्योंकि बुद्ध ने कहा कि असली ही बात चूंकी जा रही है। असली बात है, जाग्रत होकर आनंद को उपलब्ध हो जाना। उसको उन्होंने सम्यक समाधि कहा।
यह आर्य —अष्टांगिक मार्ग।
बुद्ध कहते हैं, चार आर्य—सत्य हैं—
दुख है,
दुख की उत्पत्ति है,
दुख से मुक्ति है और
मुक्तिगामी आर्य— अष्टांगिक मार्ग है।
ये आठ अंग हैं उस दुख—मुक्ति के लिए।
बुद्ध कहते हैं, चार आर्य—सत्य हैं—
दुख है,
दुख की उत्पत्ति है,
दुख से मुक्ति है और
मुक्तिगामी आर्य— अष्टांगिक मार्ग है।
ये आठ अंग हैं उस दुख—मुक्ति के लिए।
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