बौध्द धम्म में पूर्णिमा का महत्त्व

बौध्द धम्म में पूर्णिमा का बड़ा महत्त्व है , कई बौद्ध देश में इस दिन को ही छुट्टी रहती है और बौद्ध धम्म को मानाने वाले विहारों में जाते है - श्रीलंका , म्यांमार , नेपाल , वियतनाम , थाईलैंड आदि देश  पूर्णिमा  को बड़े धूम धाम से मानते है

चैत्र पूर्णिमा
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सुजाता द्वारा राजकुमार  सिद्धार्थ को खीर दान जो आगे चल बुद्ध हुए (528 ईसा पूर्व )

भृगु ऋषि के आश्रम में राजकुमार  सिद्धार्थ का तप

उदक आश्रम में रामपुत्त ऋषि के पास राजकुमार  सिद्धार्थ ने ध्यान की आठवीं सीढ़ी को आत्मसात किया

उरुवेला नगर के पशुपालक ने तथागत बुद्ध को दान दिया

नागराज महोदर और नागराज पुत्रोदर को महाकरुण समाप्ति की देशना

वैशाख पूर्णिमा ( बुद्ध पूर्णिमा )
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राजकुमार  सिद्धार्थ जो आगे चल गौतम बुद्ध हुए उन का नेपाल के लुम्बिनी में जन्म (563 ईसा पूर्व )

राजकुमार  सिद्धार्थ  और माता यशोधरा का विवाह (547 ईसा पूर्व )

राजकुमार  सिद्धार्थ को बुद्धत्व प्रापति  (528 ईसा पूर्व )

तथागत गौतम बुद्ध का महापरिनिर्वाण (483ईसा पूर्व )

ज्येष्ठ पूर्णिमा
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उत्कल ( उड़ीसा) में व्यापारी तपस्सु और भल्लिक को धम्म दीक्षा 

सुजाता को धम्म दीक्षा

महाधम्मदायाद सम्राट अशोक महान के पुत्र भिक्षु महेंद्र का श्रीलंका आगमन  (252ईसा पूर्व )

भिक्षुणी संघमित्रा द्वारा श्रीलंका के अनुराधापुर में महान बोधि वृक्ष की शाखा लगाई गई

भिक्षु महामति  महेंद्र का परिनिर्वाण (203ईसा पूर्व )

सम्राट अशोक महान द्वारा बुलाई गई तीसरी बौद्ध धम्म  संगति का समापन

आषाढ़ पूर्णिमा
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राजकुमार  सिद्धार्थ की माता को स्वपन आया  (564ईसा पूर्व )

राजकुमार  सिद्धार्थ ने महाभिनिष्क्रमण अर्थात गृह त्याग 29 वर्ष की आयु में (534ईसा पूर्व )

धम्मचक्र परिवर्तन दिवस अर्थात पांच भिक्षुओ को पहला धम्म उपदेश और दीक्षा सारनाथ  में

तथागत गौतम बुद्ध के वर्षा वास का पहला दिन (528ईसा पूर्व )

500भिक्षुओ की पहली  धम्म संगती का आरभ

श्रावण  पूर्णिमा
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 भिक्षु   अंगुलिमाल की धम्म दीक्षा   (504ईसा पूर्व )

भिक्षु अनाथपिंडक द्वारा 160 सुत मुखमुदारित

बौद्ध धम्म की पहली संगती राजगृह के वैभार पर्वत के सप्तकर्णी गुफा में  (483ईसा पूर्व )

भाद्रपद  पूर्णिमा
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तथागत द्वारा राज्य को सुव्यवस्थित बनाने हेतु राजा के लिए 18 नियम की रचना और कोशल नरेश प्रसेनजीत को देशना

तथागत द्वारा अरियवश सूत की देशना

अश्विन पूर्णिमा
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तथागत गौतम द्वारा अपनी माता को  ज्ञान प्राप्ति के 16 वे  वर्ष   में अभिधम्म देशना

प्रथम बौद्ध संगती का समापन

तथागत गौतम द्वारा आरभ किये गए वर्षावास का समापन

भिक्षुओ के बौद्ध धम्म प्रचार के लिए निकलने का समय

कार्तिक पूर्णिमा
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तथागत द्वारा कश्यप बंधुओ को धम्म दीक्षा

बौद्ध भिक्षु  ऊरवेला कश्यप का निर्वाण

धम्मसेनापति सारिपुत्र को धम्म दीक्षा

धम्मसेनापति सारिपुत्र का नालाग्राम में निर्वाण (484 ईसा पूर्व )

धम्मसेनापति सारिपुत्र के तीन भाई सुंद, रेवात और उपसेन और बहने चाला , उपचाला और सिसुपला की धम्मदिक्षा

भिक्षु संघ का वर्षावास पूर्ण रूप से समाप्त

तथागत ने 60 अरिहंत भिक्षुओ को आदेश किया की वह धम्म प्रचार शुरू करे " - चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय लोकानुकंपाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानं । देसेथ भिक्खवे धम्मं आदिकल्याण मंझे कल्याणं परियोसान कल्याणं सात्थं सव्यंजनं केवल परिपुन्नं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेथ। [महावग्ग: : विनयपिटक]

अर्थ- भिक्षुओ, बहुजनसुख के लिये, बहुजन हित के लिये , लोगों को सुख पंहुचाने के लिये निरन्तर भ्रमण करते रहो ।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा
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तथागत गौतम बुद्ध का ज्ञाननिर्मिति के लिए राजगृह से ऊरुवेला के लिए प्रस्थान

राजा बिंबिसार की धम्मदिक्षा

देवदत्त जो बुद्ध के फुफेरे भाई थे उन के दवरा निलगिरी हाथी द्वारा बुद्ध पर आक्रमण

बुद्ध द्वारा हाथी का सान्तवन एव निलगिरी हाथी द्वारा बुद्ध को त्रिवार प्रदक्षिणा

सम्राटों के सम्राट अशोक महान की पुत्री संघमित्रा बौद्ध भिक्षुणी बनी

 पौष पूर्णिमा
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महाकारुणिक तथागत गौतम बुद्ध राजगृह को प्रथम भेंट ( 527 ईसा पूर्व ) क्यों की राजगृह में ही सिद्धार्थ की प्रवज्या हुई थी और सिद्धार्थ ने राजा बिंबिसार को वचन दिया था बुद्धत्व प्रापति के बाद आने का वचन दिया था

दुनिया में पहली बार भगवान बुद्ध से 1 लाख  लोगो ने उपासक दीक्षा ली

माघ पूर्णिमा
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तथागत गौतम बुद्ध ने 80 वर्ष की आयु में सारंदरय  चैत्य  में घोषणा की  वह 3 माह बाद निर्वाण प्राप्त करेंगे

तथागत गौतम बुद्ध ने वैशाली के लच्छावियो को अपना भिक्षा पात्र दान दिया

महाकारुणिक तथागत गौतम बुद्ध ने सारिपुत्र और मौद्गल्यायन को धम्म सेनापति बनाया

वैशाली   में बुद्ध के धातु पर बनाये स्तूपों की खोज

फाल्गुन पूर्णिमा
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तथागत गौतम बुद्ध अपने 20 हज़ार अरिहंत भिक्षुओ  के साथ बौद्धत्व प्रापति के बाद कपिलवस्तु गए  ( 527 ईसा पूर्व )

राजकुमार राहुल और महाप्रजापति गौतमी पुत्र आनंद की धम्मदीक्षा राजकुमार राहुल सबसे छोटे बौद्ध भिक्षु हुए केवल 7 वर्ष की आयु में वे भिक्षु बने

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