निर्वाण का शाब्दिक अर्थ है - 'बुझा हुआ' (दीपक अग्नि, आदि)। किन्तु बौद्ध, जैन धर्म और वैदिक धर्म में इसके विशेष अर्थ हैं। श्रमण विचारधारा में (संस्कृत: निर्वाण;पालि : निब्बान;) पीड़ा या दु:ख से मुक्ति पाने की स्थिति है। पाली में "निब्बाण" का अर्थ है "मुक्ति पाना"- यानी, लालच, घृणा और भ्रम की अग्नि से मुक्ति।[1] यह बौद्ध धर्म का परम सत्य है और जैन धर्म का मुख्य सिद्धांत।
यद्यपि 'मुक्ति' के अर्थ में निर्वाण शब्द का प्रयोग गीता, भागवत, रघुवंश, शारीरक भाष्य इत्यादि नए-पुराने ग्रंथों में मिलता है, तथापि यह शब्द बौद्धों का पारिभाषिक है। सांख्य, न्याय, वैशेषिक, योग, मीमांसा (पूर्व) और वेदांत में क्रमशः मोक्ष, अपवर्ग, निःश्रेयस, मुक्ति या स्वर्गप्राप्ति तथा कैवल्य शब्दों का व्यवहार हुआ है पर बौद्ध दर्शन में बराबर निर्वाण शब्द ही आया है और उसकी विशेष रूप से व्याख्या की गई है।
बौद्ध धर्म की दो प्रधान शाखाएँ हैं—हीनयान (या उत्त- रीय) और महायान (या दक्षिणी)। इनमें से हीनयान शाखा के सब ग्रंथ पाली भाषा में हैं और बौद्ध धर्म के मूल रूप का प्रतिपादन करते हैं। महायान शाखा कुछ पीछे की है और उसके सब ग्रंथ सस्कृत में लिखे गए हैं। महायान शाखा में ही अनेक आचार्यों द्वारा बौद्ध सिद्धांतों का निरूपण गूढ़ तर्कप्रणाली द्वारा दार्शनिक दृष्टि से हुआ है। प्राचीन काल में वैदिक आचार्यों का जिन बौद्ध आचार्यों से शास्त्रार्थ होता था वे प्रायः महायान शाखा के थे। अतः निर्वाण शब्द से क्या अभिप्राय है इसका निर्णय उन्हीं के वचनों द्वारा हो सकता है। बोधिसत्व नागार्जुन ने माध्यमिक सूत्र में लिखा है कि 'भवसंतति का उच्छेद ही निर्वाण है', अर्थात् अपने संस्कारों द्वारा हम बार बार जन्म के बंधन में पड़ते हैं इससे उनके उच्छेद द्वारा भवबंधन का नाश हो सकता है। रत्नकूटसूत्र में बुद्ध का यह वचन हैः राग, द्वेष और मोह के क्षय से निर्वाण होता है। बज्रच्छेदिका में बुद्ध ने कहा है कि निर्वाण अनुपधि है, उसमें कोई संस्कार नहीं रह जाता। माध्यमिक सूत्रकार चंद्रकीर्ति ने निर्वाण के संबंध में कहा है कि सर्वप्रपंचनिवर्तक शून्यता को ही निर्वाण कहते हैं। यह शून्यता या निर्वाण क्या है ! न इसे भाव कह सकते हैं, न अभाव। क्योंकि भाव और अभाव दोनों के ज्ञान के क्षप का ही नाम तो निर्वाण है, जो अस्ति और नास्ति दोनों भावों के परे और अनिर्वचनीय है।
माधवाचार्य ने भी अपने सर्वदर्शनसंग्रह में शून्यता का यही अभिप्राय बतलाया है—'अस्ति, नास्ति, उभय और अनुभय इस चतुष्कोटि से विनिमुँक्ति ही शून्यत्व है'। माध्यमिक सूत्र में नागार्जुन ने कहा है कि अस्तित्व (है) और नास्तित्व (नहिं है) का अनुभव अल्पबुद्धि ही करते हैं। बुद्धिमान लोग इन दोनों का अपशमरूप कल्याण प्राप्त करते हैं। उपयुक्त वाक्यों से स्पष्ट है कि निर्वाण शब्द जिस शून्यता का बोधक है उससे चित्त का ग्राह्यग्राहकसंबंध ही नहीं है। मै भी मिथ्या, संसार भी मिथ्या। एक बात ध्यान देने की है कि बौद्ध दार्शनिक जीव या आत्मा की भी प्रकृत सत्ता नहीं मानते। वे एक महाशून्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानते।
सर्वप्रथम स्वयं शांत होकर निर्वाण प्राप्त करना चाहिए फिर इच्छुक व्यक्तियों को शांत कर निर्वाण प्राप्त करना चाहिए। हर मनुष्य के भीतर अनंत ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता होती है इसलिए सभी मनुष्य निर्वाण प्राप्त कर सकते है उनमें उम्र लिंग भेद नहीं है ना ही धर्म संस्कृति भेद है और ना ही संसारिक सन्यासी जैसा भेद है तथा दुष्ट सज्जन व सामान्य मनोस्थित वाले भी निर्वाण प्राप्त कर सकते है ।
प्रायः रजत युग में ही सम्पूर्ण विश्व को बोधित्व चेतना पुरूष ही अनंत ज्ञान देता है क्योंकि उस समय विश्व में धर्म संस्कृति व विज्ञान के सिध्दान्त एक दूसरे का विरोध कर विश्व में अशांति उत्पन्न करते है तथा अधिकांश लोग दुष्ट प्रवृत्ति के होकर समाज में अश्लीलता आसमाजिकता फैलाते है । तथा सभी मनुष्यों के अहंकार का एक साथ अंत करने के लिए बोधित्व पुरूष की चेतना जागृत होगी जिसमें राष्ट्रों के शासक विश्व स्तर के सम्पत्तिवान व प्रसिध्द व्यक्ति तथा धार्मिक ज्ञानी होगे जिन्हें अत्याधिक अहंकार हो जाऐगा तो उनके अहंकार का अंत कर सर्वश्रेष्ठ अनंत ज्ञान ही विश्व में है ज्ञात करने पर ही पुनः विश्व में शांति स्थापित होगी ।
विश्व स्तर पर ज्ञान का प्रचार करने वाला बोधिसत्व पुरूष की चेतना जागृत प्रायः भारत में होता है क्योंकि भारत सभी धर्मों का संगम स्थल है और प्रायः हिन्दू धर्म का होता है क्योंकि हिन्दू धर्म के प्रमुख ग्रंथों जिसमें उपनिषद है जो ब्रह्म की व्याख्या करते है वे सब हिन्दू पुराणों के देवी देवता असुर को एक परिकल्पना है ऐसा परिभाषित कर देते है अन्य धर्मों को भी मिथ्क कह देते है इसलिए परम् सत्य हिन्दूत्व व्यक्ति ही फैलता है विश्व में जहां बौध्द धर्म की अधिकता वहां क्षेत्र में अन्य धर्म के लोग कम रहते है जिसके कारण परम सत्य विश्व में फैल नहीं सकेगा परन्तु भारत में प्रायः सभी धर्मों के लोग होते है इसलिए इसी क्षेत्र में विश्व स्तर पर परम् सत्य जाने वाले पुरूषों का आगमन होता रहता है । ऐसा व्यक्ति भविष्य में आने की सम्भावना हो सकती है ।
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