# ईसा_मसीह_बौध्द_थे
   #Jesus_Christ_was_Buddhist_monk

     एक समय था जब कश्मीर बुध्दधम्म का एक बहुत बड़ा केन्द्र था. निकोलाय अलिगजेन्डरोविच नोटोविच नामक रूसी लेखक 1857 के अंत में भारत की यात्रा पर आया था | उसने कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में लद्दाख तक यात्रा की थी | नोटोविच लद्दाख के एक बुध्द विहार में ठहरा तब बुध्द विहार के लामा ने नोटोविच से कहा.......यूरोप के ईसाईयों ने बुध्द की शिक्षा को ग्रहण किया और बुध्द से दूर हो कर अपना दलाई लामा स्थापित कर लिया | नोटोविच ने पूछा, "आप कौनसे ईसाईयों के दलाई लामा की बात कर रहे हैं ?" लामा ने उत्तर दिया "मैं चर्च के फादर पोप अर्थात ईसा मसीह के बारे में बता रहा हूँ |......ईसा किसी भी दलाई लामा से महान है |

 उन्होंने बुध्द के संदेश का प्रचार किया था | हमारे धर्म-ग्रंथों में ईसा के संबंध में लिखा हुआ है |" नोटोविच ने लामा से पूछा वे धर्म-ग्रंथ कहाँ मिलेंगे ? लामा ने उसे बताया कि लहासा में उसे हजारों की संख्या में ऐसे ग्रंथ मिल जाएंगे |
     लगभग 125 ई. पू. कनिष्क का साम्राज्य भारत में दूर तक फैला हुआ था तक्षशिला (पाकिस्तान), कश्मीर, व आर्याना (अफगानिस्तान) यह पूरा क्षेत्र कुषाण साम्राज्य के अधीन था | कुषाण राजवंश के बौध्द सम्राट कनिष्क ने प्रसिद्ध दार्शनिक पार्शव के कहने पर आपस के मतभेद को दूर करने के लिए एक संगीती (महासभा) का आयोजन किया | इस संगीती में 1500 बौध्द-भिक्षुओं ने भागीदारी की | इसी काल में #ललित_विस्तार ग्रंथ लिखा गया था | प्रसिद्ध जर्मन लेखक होलगर करस्टन ने अपनी पुस्तक Jesus lived in India 'जीसस लिव्ड इन इण्डिया' में लिखा है कि इस सभा में यीशु मसीह भी शामिल हुए |

इस संगीती को सफल बनाने में उन्होने बहुत योगदान दिया | सम्राट कनिष्क पर महान बौध्द दार्शनिक आचार्य नागार्जुन का बहुत प्रभाव था | ईसाईयों के धर्म-ग्रंथ "बाईबिल न्यूटेस्टामेंट" की बौध्द धर्म-ग्रंथ "ललित विस्तार" से काफी समानता
है | इसका कारण यह है कि इसकी रचना उसी काल में हुई थी | युज आसफ अर्थात यीशु मसीह बोधिसत्व थे |

 बोधिसत्व यीशु मसीह की आयु उस समय अस्सी वर्ष से अधिक थी | बोधिसत्व का अर्थ है- "ज्ञान और उसके लिए प्रयत्न करने वाला प्राणी अथवा सत्व" | यीशु मसीह की शिक्षा उन सुधारको के अनुरूप है जो हरन सभा में प्रस्तुत किये गये थे |

     ईसा मसीह का समय सम्राट अशोक के 250 वर्ष बाद का है | ईसा मसीह स्वयं कश्मीर के एक बुध्द विहार में 13 वर्षों तक रहे, यहाँ रह कर उन्होने बौध्द भिक्खुओं से शिक्षा ग्रहण की और एक महान बौध्द-भिक्खु की तरह महान धम्म प्रचारक बने थे |

     ग्रेटब्रिटेन का प्रसिध्द समाचार पत्र "The Time's" लंदन से प्रकाशित किया जाता है, जिसे सारे संसार में पढा जाता है | इस समाचार पत्र के धार्मिक संवाददाता ने 4 मार्च 1995. के अंक में "लेखकों का कहना है कि यीशु मसीह बौध्द थे" शीर्षक से इस प्रकार प्रकाशित किया -
     तथागत बुध्द ने कहा है, #"यो-धम्मं_पस्सति,_सो_मं_पस्सति" अर्थात जो धम्म को देखता है (समझता है) वही मुझे देखता है |
     यीशु ने कहा #"He_that_sight_me_Him_that_sent_me." अर्थात जो कोई भी मुझे देखता है, वह उसे देखता है, जिसने मुझे भेजा है |

#आचार्य_चतुरसेन
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ईसा मसीह के जन्म से पहले भारत के सम्राट अशोक ने फ़िलिस्तीन में बौद्ध-धर्म प्रचारकों को भेजा था। मसीह के समय में भी, बौद्ध-भिक्षु वहाँ उपस्थित थे। मसीह के उपदेश और जीवन पर बौद्ध धर्म की इतनी गहरी छाप पड़ने का कारण ही यही था। बाइबल में, बौद्ध सिद्धांतों का मिलना, रोमन कैथॉलिक लोगों गसी का पजाक समुदाय धर्मानुष्ठान, रीति-नीति सभी बौद्ध-धर्म का अनुकरण मात्र है।
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जर्मन पंडित Arthur Schopenhauer ने यह बात स्वीकार की है। एक रूसी ग्रंथकार Nicolas Notovitch को तिब्बत में एक ग्रंथ मिला था, उससे पता लगा कि मसीह ने स्वंय #भारत_और_तिब्बत_में_रहकर_बौद्ध-धर्म_का_अनुशीलन_किया_था
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#डॉ_बी_आर_अंबेडकर
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आप ईसाइयों के चर्च में जाइए। वहाँ क्या होता है? हर हफ्ते वहाँ लोग इकट्ठे होते हैं। वे प्रार्थना करते हैं, फिर पादरी उन्हें “बाइबल” के उपदेश देता है। वह उन्हें याद दिलाता है कि यीशु मसीह ने उन्हें क्या संदेश दिया है।
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आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि #बाइबल_की_90%_से_अधिक_शिक्षाएँ_बौद्धधम्म से_नकल_की_गई_है
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#आचार्य_रजनीश_ओशो
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जब भी कोई सत्य के लिए प्यासा होता है, अनायास ही वह भारत आने के लिए उत्सुक हो उठता है। अचानक पूरब की यात्रा पर निकल पड़ता है। और यह केवल आज की ही बात नहीं है। यह उतनी ही प्राचीन बात है, जितने पुराने प्रमाण और उल्लेख मौजूद हैं। आज से 2500 वर्ष पूर्व, सत्य की खोज में #पाइथागोरस भारत आया था। #ईसा_मसीह भी भारत आए थे ।

#ईसा_मसीह_के_13_से_30_वर्ष_की_उम्र_के_बीच_का_बाइबिल_में_कोई_उल्लेख_नहीं_है
और यही उनकी लगभग पूरी जिंदगी थी, क्योंकि 33 वर्ष की उम्र में तो उन्हें सूली पर ही चढ़ा दिया गया था।

तेरह से 30 तक (17 सालों) का हिसाब बाइबिल से गायब है! इतने समय वे कहां रहे? आखिर बाइबिल में उन सालों को क्यों नहीं रिकार्ड किया गया?

उन्हें जानबूझ कर छोड़ा गया है, कि ईसायत मौलिक धर्म नहीं है, कि ईसा मसीह जो भी कह रहे हैं वे उसे भारत से लाए हैं. यह बहुत ही विचारणीय बात है। वे एक यहूदी की तरह जन्में, यहूदी की ही तरह जिए और यहूदी की ही तरह मरे।

स्मरण रहे कि वे ईसाई नहीं थे, उन्होनें तो ईसा और ईसाई, ये शब्द भी नहीं सुने थे। फिर क्यों यहूदी उनके इतने खिलाफ थे? यह सोचने जैसी बात है, आखिर क्यों ? न तो ईसाईयों के पास इस सवाल का ठीक-ठाक जवाब है और न ही यहूदियों के पास।

 क्योंकि इस व्यक्ति ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। ईसा उतने ही निर्दोष थे जितनी कि कल्पना की जा सकती है.
पर उनका अपराध बहुत सूक्ष्म था।
पढ़े-लिखे यहूदियों और चतुर रबाईयों ने स्पष्ट देख लिया था कि वे पूरब से विचार ले रहे हैं, जो कि गैर यहूदी हैं।

वे कुछ अजीबोगरीब और विजातीय बातें ले रहे हैं। और यदि इस दृष्टिकोण से देखो तो तुम्हें समझ आएगा कि क्यों वे बार-बार कहते हैं- ''अतीत के पैगंबरों ने तुमसे कहा था कि यदि कोई तुम पर क्रोध करे, हिंसा करे तो आंख के बदले में आंख लेने और ईंट का जवाब पत्थर से देने को तैयार रहना। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं कि अगर कोई तुम्हें चोट पहुंचाता है, एक गाल पर चांटा मारता है तो उसे अपना दूसरा गाल भी दिखा देना।''
यह पूर्णत: गैर यहूदी बात है। उन्होंने ने ये बातें गौतम बुद्ध और महावीर की देशनाओं से सीखी थीं. ईसा जब भारत आए थे-तब बौद्ध धर्म बहुत जीवंत था, यद्यपि बुद्ध की मृत्यु हो चुकी थी। गौतम बुद्ध के पांच सौ साल बाद जीसस यहां आए थे।

 पर बुद्ध ने इतना विराट आंदोलन, इतना बड़ा तूफान खड़ा किया था कि तब तक भी पूरा मुल्क उसमें डूबा हुआ था। बुद्ध की करुणा, क्षमा और प्रेम के उपदेशों को भारत पिए हुआ था.

जीसस कहते हैं कि ''अतीत के पैगंबरों द्वारा यह कहा गया था।'' कौन हैं ये पुराने पैगंबर?'' वे सभी प्राचीन यहूदी पैगंबर हैं: इजेकिएल, इलिजाह, मोसेस,- '' कि ईश्वर बहुत ही हिंसक है और वह कभी क्षमा नहीं करता है!? '' यहां तक कि प्राचीन यहूदी पैगंबरों ने ईश्वर के मुंह से ये शब्द भी कहलवा दिए हैं कि '' मैं कोई सज्जन पुरुष नहीं हूं, तुम्हारा चाचा नहीं हूं। मैं बहुत क्रोधी और ईर्ष्यालु हूं, और याद रहे जो भी मेरे साथ नहीं है, वे सब मेरे शत्रु हैं।'' पुराने टेस्टारमेंट में ईश्ववर के ये वचन हैं, और ईसा मसीह कहते हैं, '' मैं तुमसे कहता हूं कि परमात्मा प्रेम है।'' यह ख्याल उन्हें कहां से आया कि परमात्मा प्रेम है?

#गौतम_बुद्ध_की_शिक्षाओं_के_सिवाए_दुनिया_में_कहीं_भी_परमात्मा_को_प्रेम_कहने_का_कोई_और_उल्लेख_नहीं_है उन 17 वर्षों में जीसस इजिप्त, भारत, लद्दाख और तिब्बत की यात्रा करते रहे। यही उनका अपराध था कि वे यहूदी परंपरा में बिल्कुल अपरिचित और अजनबी विचारधाराएं ला रहे थे। न केवल अपरिचित बल्कि वे बातें यहूदी धारणाओं के एकदम से विपरीत थीं। तुम्हें जानकर आश्चकर्य होगा कि अंतत: उनकी मृत्यु भी भारत में हुई! और ईसाई रिकार्ड्स इस तथ्य को नजरअंदाज करते रहे हैं। यदि उनकी बात सच है कि जीसस पुनर्जीवित हुए थे तो फिर पुनर्जीवित होने के बाद उनका क्यां हुआ? आजकल वे कहां हैं ? क्योंकि उनकी मृत्यु का तो कोई उल्लेख है ही नहीं ।

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#जैन_और_बौद्धधर्म_की_अहिंसा_को_ईसा_मसीह_ने_जी_कर_दिखाया

लगता है ईसाई धर्म पर उन्हीं लोगों का कब्जा है जिन लोगों ने मसीह को सूली पर लटकाया।

सत्यपाल बौद्ध

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