आदमी भीड़ में जीता है। राजनेता ही नहीं, सभी भीड़ की तलाश करते हैं। परिवार हम बसाते हैं, किसलिए? अकेलापन न अनुभव हो। विवाह करते हैं, बच्चे पैदा करते हैं--अकेलापन अनुभव न हो, संग-साथ रहे। सबसे बड़ा डर अकेले होने का डर है कि कहीं मैं अकेला न पड़ जाऊं! इसके लिए हम कितने आयोजन करते हैं! अगर हम जीवन को छान कर देखें तो हमारे सारे आयोजन एक बात के हैं कि किसी तरह मुझे यह याद न आए कि मैं नहीं हूं। और बुद्ध कहते हैं कि जो जान ले मैं नहीं हूं, उसने पा लिया सब, उसे मिल गया वह देश--जहां न तू है, न मैं है।
चूंकि हम भीड़ पर निर्भर होते हैं, इसलिए भीड़ से डरते भी हैं, भीड़ से भयभीत भी रहते हैं। भीड़ हमसे जो करवाए हम करते हैं। भीड़ की आज्ञा माननी पड़ती है। भीड़ जो चरित्र दे दे, उसे थोप लेना पड़ता है; चाहे अंतरात्मा गवाही दे या न दे। भीड़ को खुश रखना होता है, क्योंकि बिना भीड़ के हम मुश्किल में पड़ जाते हैं। इसलिए भीड़ अगर युद्ध को जा रही हो तो हम भी चले युद्ध को। अगर भीड़ मंदिर को जला रही हो तो हम भी जलाते हैं मंदिर को। अगर भीड़ मस्जिद को गिराती हो तो हम मस्जिद गिराते हैं। अगर भीड़ हत्याएं करती हो तो हम हत्याएं करते हैं। हिंदू-मुस्लिम दंगे सिर्फ भीड़ों के कारण हैं। कुछ लोग एक भीड़ के हिस्से बन गए हैं, कुछ लोग दूसरी भीड़ के हिस्से बन गए हैं।
इस दुनिया से हिंदू-मुस्लिमों के दंगे, ईसाइयों-मुसलमानों के दंगे नहीं मिटेंगे तब तक, जब तक आदमी अकेला होने की सामर्थ्य नहीं जुटाता। जब तक भीड़ें हैं तब तक दंगे रहेंगे, क्योंकि भीड़ को भी बचने के लिए दंगों की जरूरत है। जैसे तुम्हें बचने के लिए भीड़ की जरूरत है, भीड़ को बचने के लिए दंगों की जरूरत है।
अडोल्फ हिटलर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि अगर तुम्हारे देश का कोई शत्रु न हो तो झूठा शत्रु पैदा रखो, लेकिन बनाए रखो। जब तक शत्रु है तब तक देश इकट्ठा रहता है, मजबूत रहता है। जैसे ही शत्रु न हुआ वैसे ही देश ढीला पड़ जाता है, सुस्त हो जाता है। अगर सच्चा शत्रु हो तो सौभाग्य; अगर सच्चा शत्रु न हो तो झूठी ही अफवाहें उड़ाए रखो, डराए रखो लोगों को। इस्लाम खतरे में है–तो मुसलमान इकट्ठा रहता है। हिंदू धर्म खतरे में है, हिंदू राष्ट्र खतरे में है--तो लोग चलेl खतरा पैदा रखो, खतरे को जगाए रखो। जब तक खतरा है तब तक तुम इकट्ठे हो; जैसे ही खतरा गया कि तुम बिखरे।
चूंकि हम भीड़ पर निर्भर होते हैं, इसलिए भीड़ से डरते भी हैं, भीड़ से भयभीत भी रहते हैं। भीड़ हमसे जो करवाए हम करते हैं। भीड़ की आज्ञा माननी पड़ती है। भीड़ जो चरित्र दे दे, उसे थोप लेना पड़ता है; चाहे अंतरात्मा गवाही दे या न दे। भीड़ को खुश रखना होता है, क्योंकि बिना भीड़ के हम मुश्किल में पड़ जाते हैं। इसलिए भीड़ अगर युद्ध को जा रही हो तो हम भी चले युद्ध को। अगर भीड़ मंदिर को जला रही हो तो हम भी जलाते हैं मंदिर को। अगर भीड़ मस्जिद को गिराती हो तो हम मस्जिद गिराते हैं। अगर भीड़ हत्याएं करती हो तो हम हत्याएं करते हैं। हिंदू-मुस्लिम दंगे सिर्फ भीड़ों के कारण हैं। कुछ लोग एक भीड़ के हिस्से बन गए हैं, कुछ लोग दूसरी भीड़ के हिस्से बन गए हैं।
इस दुनिया से हिंदू-मुस्लिमों के दंगे, ईसाइयों-मुसलमानों के दंगे नहीं मिटेंगे तब तक, जब तक आदमी अकेला होने की सामर्थ्य नहीं जुटाता। जब तक भीड़ें हैं तब तक दंगे रहेंगे, क्योंकि भीड़ को भी बचने के लिए दंगों की जरूरत है। जैसे तुम्हें बचने के लिए भीड़ की जरूरत है, भीड़ को बचने के लिए दंगों की जरूरत है।
अडोल्फ हिटलर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि अगर तुम्हारे देश का कोई शत्रु न हो तो झूठा शत्रु पैदा रखो, लेकिन बनाए रखो। जब तक शत्रु है तब तक देश इकट्ठा रहता है, मजबूत रहता है। जैसे ही शत्रु न हुआ वैसे ही देश ढीला पड़ जाता है, सुस्त हो जाता है। अगर सच्चा शत्रु हो तो सौभाग्य; अगर सच्चा शत्रु न हो तो झूठी ही अफवाहें उड़ाए रखो, डराए रखो लोगों को। इस्लाम खतरे में है–तो मुसलमान इकट्ठा रहता है। हिंदू धर्म खतरे में है, हिंदू राष्ट्र खतरे में है--तो लोग चलेl खतरा पैदा रखो, खतरे को जगाए रखो। जब तक खतरा है तब तक तुम इकट्ठे हो; जैसे ही खतरा गया कि तुम बिखरे।
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