आइए जानते है बौद्ध धर्म में  श्रावण माह का नामकरण कैसे पड़ा तथा आज के कावड़ यात्रा का बुद्धा से क्या सम्बन्ध था?
बौद्धों के लिए श्रावण माह वास्तव में पवित्र महिना है। बारिश के चलते तथागत बुद्ध अपने भिक्खुसंघ के साथ वर्षावास के लिए एकही जगह पर रूकते थे। इस दरम्यान वे भिक्खुसंघ को मार्गदर्शन करते थे। सालभर मे भिक्खुओं को धम्मप्रचार के दौरान कौन कौन सी कठिनाइयों का सामना करना पडा, उसपर क्या उपाय करना चाहिए और भविष्य की क्या रणनीति होनी चाहिए, इसपर वर्षावास मे चर्चा होती थी। तथागत बुद्ध का मार्गदर्शन सुनने के लिए आसपास के गांवों के लोग बडी संख्या में बुद्ध के निवासस्थान पर आते थे। जो बुढे लोग चल नहीं सकते थे, उन्हें उनके परिजन "कांवड" मे बिठाकर बुद्ध को सुनने के लिए लाते थे। बुद्ध के बाद भी यह परंपरा भिक्खुसंघ ने जारी रखी और इस तरह आगे चलकर यह परंपरा कांवड़ यात्रा में परिवर्तित हुई।

तथागत बुद्ध के धम्मवचनों का श्रवण करना (मतलब सुनना) वर्षावास का मुख्य स्वरूप बन चुका था। बुद्ध के बाद भी लोगों ने इस परंपरा को वर्षावास के काल में जारी रखा। इसलिए, वर्षावास के इस काल को श्रवण काल और फिर श्रावण माह कहा जाने लगा। इस काल में  मुंडन करके लोग बौद्ध श्रमण बनते थे और शुद्ध शाकाहारी भोजन करते थे। शुद्ध शाकाहार की इस माह के दरम्यान की बौद्ध परंपरा आज भी कायम है। लेकिन, मुंडन परंपरा बंद पड गई हैं। मुंडक श्रमण बनना मतलब बौद्ध बनना है।
 
पुष्यमित्र  ब्राह्मण सेनापति ने मौर्य वंश के बौद्ध राजा वृहद रथ की हत्या कर के स्वयं राजा बना उस समय लाखो की संख्या में बौद्ध भिक्षुओं की गर्दन काट कर सरयू नदी में बहा दिया, जिससे उस नदी का नाम ही सर + युक्त = सरयू नदी पड़ा। इस तरह भारत से बौद्ध धर्म का पतन हुआ और बौद्ध संस्कारो का विकृतिकरण हो गया।
 इसलिए, श्रावण माह में मुंडन का विरोध करने के लिए उन्होंने 'बाल न कटवाने की परंपरा' इस माह के दौरान कायम कर दी। तथागत बुद्ध का संबंध श्रावण माह से तोडने के लिए उन्होंने श्रावण बाल की मनगढ़ंत काल्पनिक कहानी बना दी। और कावड़ यात्रा को भी अर्थहीन बना दिया। इससे लोग बौद्धधर्मी श्रवण माह को भुल गये और ब्राह्मणवादी श्रावण माह के अनुयायी बन गए।
 यही है श्रावण माह का वास्तविक इतिहास।
नमो बुद्धाय

Comments

Popular Posts