"मृत्यु ध्यान"

मृत्यु के भय से मुक्त कर ध्यान में प्रवेश करवाने वाला ध्यान प्रयोग-

लेट जाएं और शरीर को ढीला छोड़ दें, शरीर से सारे तनाव हटा लें। स्वास को गहरी और धीमी होने दें, स्वास को नाभि तक जाने दें और भाव करें कि शरीर शिथिल हो रहा है... शरीर शिथिल हो रहा है... शरीर शिथिल हो रहा है...   एक से दो मिनट के बाद ही शरीर शिथिल और शांत हो विश्राम में जाने लगेगा।

अब भाव करें कि 'मैं मर रहा हूं...मैं मर रहा हूँ... मैं मर रहा हूँ... इस भाव को गहराने दें कि मैं मर गया हूं, मैं अपने शरीर से अलग हो गया हूं, और मेरा शरीर मरा हुआ पड़ा है,और घर के सभी सदस्य मेरे शरीर के आस - पास इकट्ठा होने लगे हैं।

उस घड़ी की कल्पना करें जब हमारी मौत होगी और परिजन बिलख - बिलख कर रो रहे होंगे। भाव करें कि मैं मर गया हूं और घर में कोहराम मचा हुआ है। पत्नी छाती पीट कर रो रही है, बच्चे रो रहे हैं, यार दोस्त सुनते ही दौड़े चले आए हैं, रोते हुए परिवार को ढांढस बंधा रहे हैं, और रिश्तेदारों को फोन पर मेरी मौत की खबर दी जा रही है।

हम जैसा भाव करेंगे वैसा ही हमारे शरीर और मन के तल पर घटित होने लगेगा । हमने क्रोध का भाव किया तो हमारे शरीर और मन दोनों  पर हम क्रोधित हुए हैं। हमने प्रेम का भाव किया तो हम शरीर और मन दोनों तलों पर आनंदित हुए हैं। यदि हम मृत्यु का भाव करेंगे तो हम शरीर और मन दोनों तरफ शांत और शिथिल होने लगेंगे। मृत्यु का भाव करने से हम मरेंगे नहीं, क्योंकि हमारा संकल्प इतना गहरा नहीं है कि हम मौत में प्रवेश कर जाएं। मृत्यु का भाव हमारे शरीर को उस स्थिती में प्रवेश करवाता है जिस स्थिति में वह मरने के बाद पहुंचता है । शांत शिथिल और मौन । यानी निर्विचार में ।

यदि शरीर शांत होगा तो मन भी शांत होगा। यानी हमारे भीतर कोई विचार नहीं होंगे। और कोई विचार नहीं होंगे तो मृत्यु का भय भी नहीं होगा, क्योंकि मृत्यु का भय भी एक विचार ही है ।

यह प्रयोग हमें मृत्यु के भय से मुक्त कर निर्विचार चेतना में तो प्रवेश करवाता ही है, साथ ही हमारे व्यवहार जीवन में भी परिवर्तन लाता है। हमारे भीतर यह भाव घना होता जाएगा कि यदि एक दिन इस तरह मर ही जाना है तो क्यों झूंठ जीवन जीना? और इस भाव के घनीभूत होते ही हमारे भीतर से असत्य गिरने होने लगेगा और सत्य का अवतरण होने लगेगा । हमारी संवेदनशीलता बढ़ने लगेगी और हमारा जीवन तनाव से आनंद की ओर बढ़ने लगेगा ।

भविष्य में घटने वाली अपनी मौत की घटना को अभी अपने ऊपर घटते हुए महसूस करना है । यहां पर हमें किसी भाव में बहना नहीं है, क्योंकि मरा हुआ व्यक्ति ना भाव प्रकट कर सकता है, ना सोच विचार कर सकता है, और ना ही हिल- डुल सकता है।

यह प्रयोग हमें शरीर से पृथक कर साक्षी का अनुभव करवाता है। क्योंकि शरीर मर गया है और मैं देख रहा हूं, यह भाव ही हमें शरीर से अलग होने में मदद करता है। और हम स्वयं को शरीर से अलग महसूस करते हैं। अपने को शरीर का साक्षी अनुभव करते हैं।

हमारा सारा भय मृत्यु का भय है। मृत्यु होती है मन की, मृत्यु होती है शरीर की, जिसे हम अपनी मृत्यु समझ भयभीत होते हैं।

गहन प्रेम में भी हम मृत्यु का अनुभव करते हैं। क्योंकि प्रेम में मन मर जाता है । गहरे ध्यान में भी हम मृत्यु का अनुभव करते हैं क्योंकि ध्यान में भी मन मर जाता है।  ध्यान और प्रेम दोनों ही परिस्थितियों में मन मर जाता है। और मन के मरते ही विचार विलीन हो जाते हैं, तथा विचारों के विलीन होते ही हम अभय को उपलब्ध हो जाते हैं।

प्रेमी या प्रेमिका के साथ जब हम होते हैं तब हम 'वर्तमान' समय में आ जाते हैं । ना तो 'भविष्य' की योजना का विचार करते हैं और ना ही 'अतीत' की किसी स्मृति में डोलते हैं । यानी निर्विचार होते हैं। यदि प्रेमिका के साथ होने पर भी हम सोच- विचार और बातचीत करते हैं, तो हम 'प्रेम' में नहीं होते हैं। 'वर्तमान' समय में नहीं होते  हैं।

प्रेम में हम वर्तमान में होते हैं और वर्तमान में मन की मृत्यु हो जाती है, क्योंकि वर्तमान में विचार नहीं होते हैं। विचार नहीं यानी मन नहीं अर्थात मन की मृत्यु और मन की मृत्यु होते ही, मृत्यु के भय से मुक्त हो हमारा अभय में प्रवेश हो जाता है। प्रेम में वर्तमान में आने पर मन की मृत्यु के कारण प्रेमी अभय को उपलब्ध हो जाता है। निर्भय हो जाता है। तभी तो कितना ही जान का खतरा क्यों ना हो प्रेमी अपनी प्रेमिका से मिलने चला जाता है।

यह प्रयोग हमें वर्तमान में लाकर मृत्यु के भय से मुक्त कर अभय उपलब्ध करवाता है। निर्भय बनाता है।

भाव करें कि बाहर मित्र और रिश्तेदार अर्थी सजा रहे हैं और भीतर मेरे शरीर को नहलाकर नए कपड़े पहनाए जा रहे हैं। परिजनों का रोना- चीखना तेज हो गया है, क्योंकि अब मुझे अर्थी पर लिटाकर रस्सियों से बांधा जा रहा है। रोते बिलखते बेटे के हाथ में मुखाग्नि है। यार दोस्त अर्थी को कंधा देने के लिए आगे बढ़ रहे हैं । बैंड - बाजे पर मातम की धुन बजाई जा रही है । "राम नाम सत्य है...।" के उद्घोष के साथ अर्थी को शमशान की ओर ले जाया जा रहा है ।और हमारी अंतिम यात्रा शुरू हो गई है।

अपने अंतिम यात्रा का स्मरण करते हुए वहां तक जाएं, जहां बेटा चिता को अग्नि दे रहा है, चिता धू-धू कर जलने लगी है, आग की लपटें उठ रही है, और सारे लोग ताली बजाकर हमें अंतिम विदाई दे रहे हैं। अपनी मृत्यु के भाव के साथ ही अपने अंतिम संस्कार की यात्रा को पूरी तरह से घटते हुए महसूस करें। अनुभव करें कि अब राख ही राख बची हुई है। शरीर जलकर राख हो चुका है । अपने शरीर को जलकर राख होते हुए अनुभव करें ।

इस स्थिति में जितनी देर हो सकें, रहे, फिर  दो चार धीमी और गहरी श्वांस लें और प्रयोग से बाहर आ जाएं ।

इस प्रयोग में उतरने से पहले थोड़ा नृत्य कर लें या थोड़ा व्यायाम कर लें ताकि ध्यान में बाधा देने वाले तत्व पसीने के साथ शरीर से बाहर चले जाएं और हमारा ध्यान विधि में प्रवेश आसान हो जाए।
 ध्यान उत्सव

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