तृष्णा :-
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मनुष्य के जीवन में जरूरत की चीजो के प्रति लगाव देखने मिलता है, लेकिन जरूरत के अलावा वस्तुओं के प्रति आकर्षण या मोह, लालसा या आसक्ति, उन्हें प्राप्त करने की चाह मनुष्य को बेचैन करती हैै। उन्हें प्राप्त करने के लिए मनुष्य लालायित हो उठता है। इसे ही मनुष्य के लिए तृष्णा कहा गया है।

बुद्ध कथन है -
" विषयवस्तु की वासना ( तृष्णा ) ही दुख का मुख्य कारण है।
भोगविलास यह अस्थायी है, जो अपने सुख समृद्धि का विनाश करता है, भोगविलास ऐसा मायाजाल है, जिसकी अपेक्षा भी मनुष्य का चित्त विचलित करने हेतु पर्याप्त है, और उसने यदि मन पर काबू पा लिया, तो फिर कुछ नहीं बचता।
इस विषयवस्तु के शिकार होने से मृत्यु लोक तो क्या दिव्यलोक में भी सुख प्राप्त नहीं हो सकता।
जिस प्रकार वायु और ईंधन के संयोग से अग्नि कभी बुझ नहीं पाती, उसी प्रकार विषयवस्तु और भोगविलास की वासना कभी खत्म नहीं होती।
विषयसुख में लिप्त व्यक्ति को क्षणिक अपनी वासना की तृप्ति हो रही है ऐसे लगता है, लेकिन तब उसपर विपत्तियों का आना निश्चित होता है, विषयवासना की तृप्ति मनुष्य को अपना गुलाम बनाती है, अपने मन की तृप्ती  हेतु वह उसके अधीन हो जाता है, अपनी वासना की शूधा शांति के लिए वह जो नहीं करना चाहिए वह करता है, जो करने योग्य है वह नहीं करता , वासना के अधीन ऐसे व्यक्ति का दुखद अंत होता है।"
        बुद्ध

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