*जिंदगी को बदलो जिंदगी*
*तुम्हारी है*

और कोई जिम्मेदार नहीं!
तरकीबें न खेलो आदमी
हमेशा तरकीबें करता है
दोष किसी और पर टाल देता है।
दोष दूसरे पर टालकर
निश्चित हो जाता है
कि अब मेरा तो कोई दोष है नहीं,
अब मैं क्या कर सकता हूँ असहाय हूँ।
लेकिन जिस दिन तुम असहाय
हुए उसी दिन तुम नपुंसक भी हो जाते हो।
जब तुमने कहा!
मैं क्या कर सकता हूँ
समय खराब है,
मैं क्या कर सकता हूँ
समाज खराब है,
मैं क्या कर सकता हूँ
चारों तरफ बेईमान ही बेईमान है
मुझे भी बेईमान होना ही पड़ेगा,
मजबूरी है!
तो तुम बेईमान हो गए और
तुम बेईमान होते चले जाओगे,
तुम कमजोर हो जाते हो,
उसी दिन! जिस दिन तुम
जिम्मेदारी किसी और पर छोड़ते हो,
तुम उसी दिन गुलाम हो जाते हो।
मालिक वही है
जिसने कहा! बुरा हूँ तो मै अपने कारण हूँ,
स्वतंत्र वही है
जिसने कहा!
चोर हूँ तो मै अपने कारण हूँ,
मै चोर हूँ ये सही है!
लेकिन कारण भी मै ही हूँ,
मैंने चोर होना चुना है।
और यह आदमी साफ-सुथरा है,
इस आदमी की जिंदगी
में क्रांति हो सकती है,
क्योंकि इसके पास क्रांति की मूल कुंजी है!
यह कहता है;
बुरा हूँ तो मै अपने कारण हूँ!
अगर अपने कारण बुरा हूँ तो
जिस दिन चाहूंगा,
उस दिन भला भी हो जाऊंगा,
वह दरवाजा मैंने अपने पास में रखा है,
वह कुंजी अपने हाथ में है।
इसलिए तो इस देश में हम
संन्यासी को स्वामी कहते हैं,
स्वामी का अर्थ होता है! 'स्व का मालिक'
मालकियत की घोषणा कि
मैं अपना मालिक हूँ,
बुरा हूँ तो भला हूं तो मैं जैसा
हूँ मैं ही कारणभूत हूँ !!

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