बच्चे के लिए मां के दूध का महत्व............. !!
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यह जान कर आपको हैरानी
होगी कि अगर बच्चे को
मां के दूध पर जीवन न मिले,
पालन न मिले,
तो बच्चे की जीवन—धारा
हमेशा के लिए क्षीण रह जाती है।
उसे दूध पिलाया जा सकता है
और तरह से भी, लेकिन अगर
मां के हृदय का उसे निरंतर स्पर्श न मिले,
तो उसका जीवन हमेशा के
लिए कुंठित हो जाता है
और हमेशा के लिए उसके
जीवन की संभावना क्षीण हो जाती है।
जो बच्चे मां के दूध पर नहीं पाले जाते,
वे बच्चे कभी भी जीवन में
बहुत आनंद को और शांति
को उपलब्ध नहीं हो सकते हैं।
पश्चिम का सारा
युवक समाज और
धीरे—धीरे भारत का भी,
जो अत्यंत विद्रोह से भर रहा है,
इसके बहुत गहरे में और
बुनियाद में यह बात है
कि पश्चिम के बच्चे मां के
दूध पर नहीं पाले जा रहे हैं।
जीवन के प्रति उनकी आस्था और जीवन
के प्रति उनके संबंध प्रीतिपूर्ण नहीं हैं।
बचपन से ही उनकी
जीवन— धारा ने
धक्के पाए हैं
और वे अप्रीतिपूर्ण हो गए हैं।
उन धक्कों में,
मां से विच्छिन्न होने में जीवन
से ही वे विच्छन्न हो गए हैं।
क्योंकि बच्चे के लिए प्राथमिक
रूप से मां के अतिरिक्त
और कोई जीवन नहीं होता।
सारी दुनिया में,
जहां भी स्त्रियां शिक्षित हो रही हैं,
वे बच्चों को अपने निकट पालना
पसंद नहीं करती हैं
और उसके परिणाम घातक होने शुरू हुए हैं।
आदिवासी समाजों में बच्चे
बहुत देर तक मां के दूध
पर पलते हैं।
जितना समाज शिक्षित होता जाता है,
बच्चे उतनी ही जल्दी मां के दूध
से अलग कर दिए जाते हैं।
जो बच्चे जितनी जल्दी मां
के दूध से अलग कर दिए जाएंगे,
वे बच्चे अपने जीवन में शांति को
उतनी ही कठिनाई से अनुभव कर सकेंगे।
उनके जीवन में एक गहरी
अशांति हमेशा के लिए
प्रांरभ से ही शुरू
हो जाएगी।
और यह अशांति का बदला वे किससे लें?
इसका बदला मां—बाप से ही लिया जाएगा,
और सारी दुनिया में बच्चे
मां—बाप से बदला ले रहे हैं।
इसका बदला किससे लेंगे बच्चे?
उनको भी पता नहीं है कि
यह कौन सी प्रतिक्रिया
उनके भीतर पैदा
हो रही है,
यह कौन सा एक विद्रोह
उनके भीतर पैदा
हो रहा है,
यह कौन सी आग उनके
भीतर पैदा हो रही है।
लेकिन अनजान में,
बहुत गहरे में उनका मन जानता है
कि यह विद्रोह मां से बहुत शीघ्र
छुड़ा लिए जाने का ही परिणाम है।
उनकी जीवन—चेतना इस बात को जानती है,
उनकी बुद्धि नहीं जानती।
इसका परिणाम यह होगा कि वे
मां से, पिता से सबसे इसका बदला लेंगे।
और जो बच्चा मां और पिता के विरोध में है,
वह बच्चा परमात्मा के कभी
भी पक्ष में नहीं होसकता।
कोई संभावना नहीं है
कि वह परमात्मा के पक्ष में हो जाए।
क्योंकि परमात्मा के प्रति जो सबसे
पहले भावनाएं उठनी शुरू होती हैं,
वे वे ही हैं, जो मां और पिता के प्रति उठती हैं।
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यह जान कर आपको हैरानी
होगी कि अगर बच्चे को
मां के दूध पर जीवन न मिले,
पालन न मिले,
तो बच्चे की जीवन—धारा
हमेशा के लिए क्षीण रह जाती है।
उसे दूध पिलाया जा सकता है
और तरह से भी, लेकिन अगर
मां के हृदय का उसे निरंतर स्पर्श न मिले,
तो उसका जीवन हमेशा के
लिए कुंठित हो जाता है
और हमेशा के लिए उसके
जीवन की संभावना क्षीण हो जाती है।
जो बच्चे मां के दूध पर नहीं पाले जाते,
वे बच्चे कभी भी जीवन में
बहुत आनंद को और शांति
को उपलब्ध नहीं हो सकते हैं।
पश्चिम का सारा
युवक समाज और
धीरे—धीरे भारत का भी,
जो अत्यंत विद्रोह से भर रहा है,
इसके बहुत गहरे में और
बुनियाद में यह बात है
कि पश्चिम के बच्चे मां के
दूध पर नहीं पाले जा रहे हैं।
जीवन के प्रति उनकी आस्था और जीवन
के प्रति उनके संबंध प्रीतिपूर्ण नहीं हैं।
बचपन से ही उनकी
जीवन— धारा ने
धक्के पाए हैं
और वे अप्रीतिपूर्ण हो गए हैं।
उन धक्कों में,
मां से विच्छिन्न होने में जीवन
से ही वे विच्छन्न हो गए हैं।
क्योंकि बच्चे के लिए प्राथमिक
रूप से मां के अतिरिक्त
और कोई जीवन नहीं होता।
सारी दुनिया में,
जहां भी स्त्रियां शिक्षित हो रही हैं,
वे बच्चों को अपने निकट पालना
पसंद नहीं करती हैं
और उसके परिणाम घातक होने शुरू हुए हैं।
आदिवासी समाजों में बच्चे
बहुत देर तक मां के दूध
पर पलते हैं।
जितना समाज शिक्षित होता जाता है,
बच्चे उतनी ही जल्दी मां के दूध
से अलग कर दिए जाते हैं।
जो बच्चे जितनी जल्दी मां
के दूध से अलग कर दिए जाएंगे,
वे बच्चे अपने जीवन में शांति को
उतनी ही कठिनाई से अनुभव कर सकेंगे।
उनके जीवन में एक गहरी
अशांति हमेशा के लिए
प्रांरभ से ही शुरू
हो जाएगी।
और यह अशांति का बदला वे किससे लें?
इसका बदला मां—बाप से ही लिया जाएगा,
और सारी दुनिया में बच्चे
मां—बाप से बदला ले रहे हैं।
इसका बदला किससे लेंगे बच्चे?
उनको भी पता नहीं है कि
यह कौन सी प्रतिक्रिया
उनके भीतर पैदा
हो रही है,
यह कौन सा एक विद्रोह
उनके भीतर पैदा
हो रहा है,
यह कौन सी आग उनके
भीतर पैदा हो रही है।
लेकिन अनजान में,
बहुत गहरे में उनका मन जानता है
कि यह विद्रोह मां से बहुत शीघ्र
छुड़ा लिए जाने का ही परिणाम है।
उनकी जीवन—चेतना इस बात को जानती है,
उनकी बुद्धि नहीं जानती।
इसका परिणाम यह होगा कि वे
मां से, पिता से सबसे इसका बदला लेंगे।
और जो बच्चा मां और पिता के विरोध में है,
वह बच्चा परमात्मा के कभी
भी पक्ष में नहीं होसकता।
कोई संभावना नहीं है
कि वह परमात्मा के पक्ष में हो जाए।
क्योंकि परमात्मा के प्रति जो सबसे
पहले भावनाएं उठनी शुरू होती हैं,
वे वे ही हैं, जो मां और पिता के प्रति उठती हैं।
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