जब मैं कहता हूँ कि समस्या पर ध्यान दो तो मेरा यह अर्थ नहीं है कि उसके बारे में सोचो, मेरा यह अर्थ नहीं है कि उस पर मनन करो, उस पर चिंतन करो।

जब मैं कहता हूँ कि उस पर ध्यान दो तो मेरा अर्थ है उसे देखो, उसके साक्षी बनो। जो भी समस्या हो -- क्रोध, काम, ईर्ष्या, लोभ, अहंकार -- जो भी समस्या हो, सबकी औषधि एक ही है।

यदि तुम ईर्ष्या से परेशान हो, तो बस देखो कि यह तुममें कैसे उठती है, कैसे तुम्हें अपने पाश में ले लेती है, कैसे तुम पर आच्छादित हो जाती है, कैसे तुमसे वे चीजें करवा लेती है और उन रास्तों पर ले जाती है जहाँ तुम जाना ही नहीं चाहते थे! देखो कि किस प्रकार यह तुम्हें हताशा में ले जाती है, कैसे तुम्हारी ऊर्जा को नष्ट करती है, तुम्हारी ऊर्जा को इतना शिथिल कर देती है कि तुम नकारात्मकता और विषाद में डूब जाते हो। पूरी बात को देखो कि वह कैसे घटती है।

और याद रहे कि उसकी निंदा नहीं करनी है, क्योंकि तुमने निंदा की तो तुमने उसके बारे में सोचना शुरू कर दिया। नहीं, मैं निंदा करने को नहीं कहता।

बिना निंदा और बिना प्रशंसा के समस्या के तथ्य को देखो, पक्ष या विपक्ष में बिना कोई भी निर्णय लिए। दूर से निष्पक्ष होकर समस्या को ऐसे देखो जैसे उससे तुम्हारा कोई लेना-देना ही न हो।

साक्षी होने में वैज्ञानिकता लाओ। समस्या जो भी हो, वह स्वयं ही गिर जाएगी; तुम्हें उसे गिराने की जरूरत नहीं होगी।

Ilबुद्धाll

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