!! संगीत कैसे पैदा हो !!
बुद्ध के पास श्रोण नाम का
एक राजकुमार दीक्षित हुआ था।
वह राजकुमार था, वह दीक्षित हुआ।
वह बड़े वैभव में पला,
उसने कभी कोई दुख नहीं देखे,
कभी नंगे पैर सड़क पर नहीं चला।
वह भिखारी हो गया उसको
अब चीथड़े पहनने पड़े और
नंगे पैर सड़क पर चलना पड़ा।
लेकिन बुद्ध देख कर हैरान हुए कि
और भिक्षु तो ठीक रास्ते पर चलते हैं,
वह उन पगडंडियों पर चलता है
जहां कांटे पड़े हों,
जान कर चलता है।
और जब उसके पैरों से खून बहने लगता है
और फफोले हो जाते हैं,
तो इसमें गौरव अनुभव करता है।
इसको वह तपश्चर्या समझ रहा है,
इसको वह त्याग समझ रहा है।
तीन महीने में वह सूख कर हड्डी हो गया।
बड़ा सुंदर था, गौरवर्ण था,
एकदम काला पड़ गया, सूख गया।
बुद्ध ने उसके पास जाकर एक दिन कहा
एक बात पूछनी है।
मैंने सुना, जब तुम राजकुमार थे,
तो तुम वीणा बजाने में बहुत कुशल थे।
तो मैं यह पूछने आया हूं कि
अगर वीणा के तार बहुत ढीले
हों तो उनमें संगीत पैदा होता है?
उसने कहा, अगर तार बहुत ढीले हों तो
संगीत कैसे पैदा हो, ध्वनित ही नहीं होंगे।
और बुद्ध ने कहा तार अगर
बहुत कसे हों तो संगीत पैदा होता है?
उस श्रोण ने कहा अगर
वे बहुत कसे हों तो टूट जाएंगे,
तब भी ध्वनित नहीं होंगे।
तो बुद्ध ने कहा मैं तुमसे यह कहने आया हूं
कि जो वीणा का नियम है
वही जीवन का नियम भी है।
तार बहुत ढीले हों तो बेकार हैं,
तार बहुत कस जाएं तो बेकार हो जाएंगे।
तारों की एक स्थिति ऐसी भी है
जब वे न ढीले हैं और न कसे हुए हैं।
तारों की एक स्थिति ऐसी भी है
जहां न वे बिलकुल ढीले हैं
न कसे हुए हैं।
वही स्थिति जहां न तुम उन्हें
ढीले कह सकी और
न कसे कह सको वहीं
उनमें संगीत पैदा होता है।
और जीवन में भी संगीत
वहीं पैदा होता है
जहां संतुलन होता है
जहां इस तरफ और
उस तरफ आप अति पर नहीं निकल जाते हैं।
अब मैं देखता हूं
एक आदमी अतिशय भोजन करता है,
फिर एक दिन उपवास भी करता है।
ये दोनों बातें पागलपन की हैं।
ये दोनों बातें पागलपन की हैं।
एक आदमी अति भोजन करता रहता है,
फिर एक दिन आता है
उपवास भी कर लेता है।
न, मैं न तो आपको निराहार
होने को कहता हूं और
न अति आहार को कहता हूं।
मैं तो सम्यक आहार को कहता हूं।
🙏🏻बुद्धा🙏🏻
नमो बुद्धाय
बुद्ध के पास श्रोण नाम का
एक राजकुमार दीक्षित हुआ था।
वह राजकुमार था, वह दीक्षित हुआ।
वह बड़े वैभव में पला,
उसने कभी कोई दुख नहीं देखे,
कभी नंगे पैर सड़क पर नहीं चला।
वह भिखारी हो गया उसको
अब चीथड़े पहनने पड़े और
नंगे पैर सड़क पर चलना पड़ा।
लेकिन बुद्ध देख कर हैरान हुए कि
और भिक्षु तो ठीक रास्ते पर चलते हैं,
वह उन पगडंडियों पर चलता है
जहां कांटे पड़े हों,
जान कर चलता है।
और जब उसके पैरों से खून बहने लगता है
और फफोले हो जाते हैं,
तो इसमें गौरव अनुभव करता है।
इसको वह तपश्चर्या समझ रहा है,
इसको वह त्याग समझ रहा है।
तीन महीने में वह सूख कर हड्डी हो गया।
बड़ा सुंदर था, गौरवर्ण था,
एकदम काला पड़ गया, सूख गया।
बुद्ध ने उसके पास जाकर एक दिन कहा
एक बात पूछनी है।
मैंने सुना, जब तुम राजकुमार थे,
तो तुम वीणा बजाने में बहुत कुशल थे।
तो मैं यह पूछने आया हूं कि
अगर वीणा के तार बहुत ढीले
हों तो उनमें संगीत पैदा होता है?
उसने कहा, अगर तार बहुत ढीले हों तो
संगीत कैसे पैदा हो, ध्वनित ही नहीं होंगे।
और बुद्ध ने कहा तार अगर
बहुत कसे हों तो संगीत पैदा होता है?
उस श्रोण ने कहा अगर
वे बहुत कसे हों तो टूट जाएंगे,
तब भी ध्वनित नहीं होंगे।
तो बुद्ध ने कहा मैं तुमसे यह कहने आया हूं
कि जो वीणा का नियम है
वही जीवन का नियम भी है।
तार बहुत ढीले हों तो बेकार हैं,
तार बहुत कस जाएं तो बेकार हो जाएंगे।
तारों की एक स्थिति ऐसी भी है
जब वे न ढीले हैं और न कसे हुए हैं।
तारों की एक स्थिति ऐसी भी है
जहां न वे बिलकुल ढीले हैं
न कसे हुए हैं।
वही स्थिति जहां न तुम उन्हें
ढीले कह सकी और
न कसे कह सको वहीं
उनमें संगीत पैदा होता है।
और जीवन में भी संगीत
वहीं पैदा होता है
जहां संतुलन होता है
जहां इस तरफ और
उस तरफ आप अति पर नहीं निकल जाते हैं।
अब मैं देखता हूं
एक आदमी अतिशय भोजन करता है,
फिर एक दिन उपवास भी करता है।
ये दोनों बातें पागलपन की हैं।
ये दोनों बातें पागलपन की हैं।
एक आदमी अति भोजन करता रहता है,
फिर एक दिन आता है
उपवास भी कर लेता है।
न, मैं न तो आपको निराहार
होने को कहता हूं और
न अति आहार को कहता हूं।
मैं तो सम्यक आहार को कहता हूं।
🙏🏻बुद्धा🙏🏻
नमो बुद्धाय
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