मध्य प्रदेश में भिलसा के निकट बेसनगर में एक यवन राजदूत हेलियोडोरस का स्तंभ है।
इस स्तंभ पर दो अभिलेख हैं - एक सात पंक्तियों का और दूसरा दो पंक्तियों का है।
अभिलेख की लिपि ब्राह्मी और भाषा प्राकृत है। बीच - बीच में एक - दो शब्द- रूप संस्कृत के दिखाई पड़ते हैं। ऐसा पिजिन संस्कृत के कारण दिखाई पड़ते हैं।
अभिलेख लगभग 113 ई. पू. के हैं। तब तक्षशिला में बौद्ध धर्म और गांधार कला का बोलबाला था। हेलियोडोरस उसी बौद्ध - केंद्र तक्षशिला से चलकर दूसरे बौद्ध - केंद्र बेसनगर आए थे।
तब बेसनगर का पूरा इलाका बौद्धमय था। साँची, सतधारा, सोनारी, अंधेर, गिरासपुर जैसे सभी बौद्ध - स्थल बेसनगर के आसपास हैं।
इतिहासकार बताते हैं कि बेसनगर का यह स्तंभ वासुदेव की स्मृति में भागवत धर्मानुयायी हेलियोडोरस ने स्थापित कराए हैं।
आश्चर्य कि जिस वासुदेव की स्मृति में यह स्तंभ स्थापित किए जाने की बात की जाती है, वह वासुदेव इस अभिलेख में सिरे से गायब हैं।
अभिलेख में वासुदेव की परिकल्पना इतिहासकारों के दिमाग की उपज है। कुछ मिटे हुए अक्षरों की जगह " सुदे " की परिकल्पना कर " वासुदेव " बना लिया गया है।
हेलियोडोरस किसी नए भागवत धर्म का अनुयायी नहीं थे। दूसरी सदी ई. पू. में बुद्ध को भगवत और उनके अनुयायी को भागवत कहा जाता था।
अभिलेख में हेलियोडोरस ने अपने आपको " हेलिओदोरेण भागवतेन " बताए हैं। अर्थात हेलियोडोरस बौद्ध धर्म का अनुयायी थे।
जब हेलियोडोरस बेसनगर आए थे, तब बेसनगर पर राजा भागभद्र का शासन था।
इतिहासकारों ने भागभद्र को शुंग वंश का राजा बताए हैं, जबकि शुंग वंश के राजा " भद्र " नहीं बल्कि अपना नामांत " मित्र " लिखा करते थे जैसे पुष्यमित्र, अग्निमित्र, वसुमित्र आदि।
भागभद्र कोई बौद्ध राजा थे, जिनके दरबार में हेलियोडोरस तक्षशिला से राजदूत होकर आए थे।
भागभद्र का भद्र वस्तुतः भद्द का परिवर्तित रूप है।
दूसरी सदी ई. पू. या उसके पहले भी बौद्धानुयायी " भद्द " लिखते थे, जिसका संस्कृत रूप " भद्र " है, बृहद रूप " भदंत " है और आजकल " भंते " है।
अभिलेख के आखिर में धम्मपद के "अमतपद " का जिक्र है - त्रिनि अमुतपदानि। अप्पमादो अमतपदं - धम्मपद 21।
तमाम सबूतों के मद्देनजर बेसनगर का हेलियोडोरस स्तंभ वस्तुतः बौद्ध स्तंभ है, जिसे गलती से इतिहासकारों ने पूरे भारत के इतिहास में वैष्णव धर्म से संबंधित पहला प्रस्तर स्मारक माने जाने की भूल की है।
इस स्तंभ पर दो अभिलेख हैं - एक सात पंक्तियों का और दूसरा दो पंक्तियों का है।
अभिलेख की लिपि ब्राह्मी और भाषा प्राकृत है। बीच - बीच में एक - दो शब्द- रूप संस्कृत के दिखाई पड़ते हैं। ऐसा पिजिन संस्कृत के कारण दिखाई पड़ते हैं।
अभिलेख लगभग 113 ई. पू. के हैं। तब तक्षशिला में बौद्ध धर्म और गांधार कला का बोलबाला था। हेलियोडोरस उसी बौद्ध - केंद्र तक्षशिला से चलकर दूसरे बौद्ध - केंद्र बेसनगर आए थे।
तब बेसनगर का पूरा इलाका बौद्धमय था। साँची, सतधारा, सोनारी, अंधेर, गिरासपुर जैसे सभी बौद्ध - स्थल बेसनगर के आसपास हैं।
इतिहासकार बताते हैं कि बेसनगर का यह स्तंभ वासुदेव की स्मृति में भागवत धर्मानुयायी हेलियोडोरस ने स्थापित कराए हैं।
आश्चर्य कि जिस वासुदेव की स्मृति में यह स्तंभ स्थापित किए जाने की बात की जाती है, वह वासुदेव इस अभिलेख में सिरे से गायब हैं।
अभिलेख में वासुदेव की परिकल्पना इतिहासकारों के दिमाग की उपज है। कुछ मिटे हुए अक्षरों की जगह " सुदे " की परिकल्पना कर " वासुदेव " बना लिया गया है।
हेलियोडोरस किसी नए भागवत धर्म का अनुयायी नहीं थे। दूसरी सदी ई. पू. में बुद्ध को भगवत और उनके अनुयायी को भागवत कहा जाता था।
अभिलेख में हेलियोडोरस ने अपने आपको " हेलिओदोरेण भागवतेन " बताए हैं। अर्थात हेलियोडोरस बौद्ध धर्म का अनुयायी थे।
जब हेलियोडोरस बेसनगर आए थे, तब बेसनगर पर राजा भागभद्र का शासन था।
इतिहासकारों ने भागभद्र को शुंग वंश का राजा बताए हैं, जबकि शुंग वंश के राजा " भद्र " नहीं बल्कि अपना नामांत " मित्र " लिखा करते थे जैसे पुष्यमित्र, अग्निमित्र, वसुमित्र आदि।
भागभद्र कोई बौद्ध राजा थे, जिनके दरबार में हेलियोडोरस तक्षशिला से राजदूत होकर आए थे।
भागभद्र का भद्र वस्तुतः भद्द का परिवर्तित रूप है।
दूसरी सदी ई. पू. या उसके पहले भी बौद्धानुयायी " भद्द " लिखते थे, जिसका संस्कृत रूप " भद्र " है, बृहद रूप " भदंत " है और आजकल " भंते " है।
अभिलेख के आखिर में धम्मपद के "अमतपद " का जिक्र है - त्रिनि अमुतपदानि। अप्पमादो अमतपदं - धम्मपद 21।
तमाम सबूतों के मद्देनजर बेसनगर का हेलियोडोरस स्तंभ वस्तुतः बौद्ध स्तंभ है, जिसे गलती से इतिहासकारों ने पूरे भारत के इतिहास में वैष्णव धर्म से संबंधित पहला प्रस्तर स्मारक माने जाने की भूल की है।




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