★★★ चाय पर ध्यान ★★★
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तुमने बोधिधर्म के विषय में सुना होगा।
मनुष्य के पूरे इतिहास में जो बड़े ध्यानी हुए है वह
उनमें से एक था। उसके संबंध में एक प्रीतिकर कथा
कही जाती है। वह बाहर की किसी वस्तु पर
ध्यान कर रहा था। उसकी आंखें झपक जाती
थी। और ध्यान टूट-टूट जाता था। तो उसने
अपनी पलकों को उखाड़कर फेंक दिया। बहुत
सुंदर कथा है कि उसने अपनी पलकों को
उखाड़कर फेंक दिया और फिर ध्यान करना शुरू
किया। कुछ हफ्तों के बाद उसने देखा कि जहां
उसकी पलकें गिरी थी उस स्थान पर कोई पौधे
उग आए थे।
यह घटना चीन के एक पहाड़ पर घटित हुई
थी। उस पहाड़ का नाम टा था। इसलिए जो
पौधे वहां उग आए थे उनका नाम टी पडा। और
यही कारण है कि चाय जागरण में सहयोगी
होती है। इसलिए जब तुम्हारी पलकें झपकने लगें
और तुम नींद में उतरने लगो, तो एक प्याली चाय
पी लो। वे बोधिधर्म की पलकें है। इसी वजह से
झेन संत चाय को पवित्र मानते है। चाय कोई
मामूली चीज नहीं है। वह पवित्र है, बोधिधर्म
की आँख की पलक है।
जापान में तो वे चायोत्सव करते है। प्रत्येक
परिवार में एक चायघर होता है। जहां धार्मिक
अनुष्ठान के साथ चाय पी जाती है। यह पवित्र
है। और बहुत ही ध्यान पूर्ण मुद्रा में चाय पी
जाती है। जापान ने चाय के इर्द-गिर्द बड़े सुंदर
अनुष्ठान निर्मित किये है। वे चाय घर में ऐसे
प्रवेश करते है जैसे वे किसी मंदिर में प्रवेश करते
हो। तब चाय तैयार की जाएगी। और हरेक
व्यक्ति मौन होकर बैठेगा। और समोवार के
उबलते स्वर को सुनेगा। उबलती चाय का, उसके
वाष्प का गीत सब सुनेंगे। वह कोई अदना वस्तु
नहीं है। बोधिधर्म की आँख की पलक है। और
चूंकि बोधिधर्म खुली आंखों से जागने की
कोशिश में लगा था। इसलिए चाय सहयोगी
है। और चूंकि यह कथा टा पर्वत पर घटित हुई
इसलिए वह टी कहलाती है।

ओशो न्यूजलेटर से साभार....!!

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