[04/11, 9:23 pm] Hirendra Bauddha: जिन्दगी एक रात है, जिस में ना जाने कितने ख्वाब हैं,
जो मिल गया वो अपना है,
जो टुट गया वो सपना है,
ये मत सोचो की जिन्दगी में कितने पल है,
ये सोचो की हर पल में कितनी जिन्दगी है,
इसलिए… जिन्दगी को जी भर कर जी लो…
[05/11, 7:35 am] Hirendra Bauddha: बुद्ध-तत्व को
जानने के बाद भी
दर्द तो रह ही जाता है

पहले
सिर्फ अपना था
अब सबका है ...!!

🌛
[05/11, 7:43 am] Hirendra Bauddha: क्रोध
बुद्ध ने कहा है कि जब मैंने जाना तो मैंने पाया है कि अदभुत हैं वे लोग, जो दूसरों की भूल पर क्रोध करते हैं! क्यों? तो बुद्ध ने कहा कि अदभुत इसलिए कि भूल दूसरा करता है, दंड वह अपने को देता है। गाली मैं आपको दूं और क्रोधित आप होंगे। दंड कौन भोग रहा है? दंड आप भोग रहे हैं, गाली मैंने दी! क्रोध में जलते हम हैं, राख हम होते हैं, लेकिन ध्यान वहां नहीं होता! इसलिए धीरे-धीरे पूरी जिंदगी राख हो जाती है। और हमको भ्रम यह होता है कि हम जान गये हैं! हम जानते नहीं-- क्रोध की सिर्फ स्मृति है और क्रोध के संबंध में शास्त्रों में पढ़े हुए वचन हैं और हमारा कोई अनुभव नहीं। जब क्रोध आ जाये तो उस आदमी को धन्यवाद दें, जिसने क्रोध पैदा करवा दिया, क्योंकि उसकी कृपा, उसने आत्म-निरीक्षण का एक मौका दिया; भीतर आपको जानने का एक अवसर दिया। उसको फौरन धन्यवाद दें कि मित्र धन्यवाद, और अब मैं जाता हूं, थोड़ा इस पर ध्यान करके वापस आकर बात करूंगा। द्वार बंद कर लें और देखें कि भीतर क्रोध उठ गया है। हाथ-पैर कसते हों, कसने दें; क्योंकि हाथ-पैर कसेंगे। हो सकता है कि क्रोध में, अंधेरे में, हवा में, घूंसे चलें; चलने दें। द्वार बंद कर दें और देखें कि क्या-क्या होता है। अपनी पूरी पागल स्थिति को जानें और पागलपन को पूरा प्रकट हो जाने दें अपने सामने। तब आप पहली बार अनुभव करेंगे कि क्या है यह क्रोध। जब आप इस पागलपन की स्थिति को अनुभव करेंगे तो कांप जायेंगे भीतर से, कि यह है क्रोध। यह मैंने कई बार किया था, दूसरे लोगों ने क्या सोचा होगा! मनोवैज्ञानिक कहते हैं, क्रोध संक्षिप्त रूप में आया हुआ पागलपन है, थोड़ी देर के लिए आया हुआ पागलपन है, क्षणिक पागलपन है। क्षण भर में आदमी उसी हालत में हो गया, जिस हालत में कुछ लोग सदा के लिए हो जाते हैं। क्रोध में जलते हुए आदमी में और पागल आदमी में मौलिक अंतर नहीं है। अंतर सिर्फ लंबाई का है। पागल आदमी स्थायी पागल है, क्रोधी आदमी अस्थायी पागल है। दूसरे ने आपको क्रोध में देखा होगा, इसलिए दूसरे कहते है कि यह बेचारा कितना पागल हो गया है, यह क्या करता है? आपने कभी देखा है अपने को? अतः द्वार बंद कर लें। और अपनी पूरी हालत को देखें कि यह क्या हो रहा है। और रोकें मत, प्रकट होने दें, जो हो रहा है। और उसका पूरा निरीक्षण करें, तब आप पहली दफा परिचित होंगे, यह है क्रोध।
[06/11, 7:27 pm] Hirendra Bauddha: असली दिवाली कैसे हो ?”
जीवन की कुटिया में हूं मैं बुझा हुआ सा दीपक।
आशा के मंदिर में हूं मैं बुझा हुआ सा दीपक।।
बुझा हुआ सा दीपक हूं मैं, बुझा हुआ सा दीपक।।
कजराए दीवट पर धरा हूं यूं कुटिया में हाए।
जैसे कोयल सीस नवा कर अंबुआ पर सो जाए।।
जैसे श्यामा गाते-गाते कुहरे में खो जाए।
जैसे दीपक आग में अपने-आप भस्म हो जाए।।
विरह में जैसे आंख किसी क्वांरी की पथरा जाए।
बुझा हुआ सा दीपक हूं मैं बुझा हुआ सा दीपक।।
आतम, हिरदय जीवन, मृत्यु, सतयुग, कलियुग, माया।
हर रिश्ते पर मैंने अपने नूर का जाल बिछाया।।
चारों ओर चमक कर अपनी किरनों को दौड़ाया।
जितना ढूंढा उतना खोया खोकर खाक न पाया।।
बीत गए जुग लेकिन ‘सागर’ मुझ तक कोई न आया।
बुझा हुआ सा दीपक हूं मैं, बुझा हुआ सा दीपक।।

आदमी एक अंधेरा है। आदमी है अमावस की रात। और दीवाली तुम बाहर कितनी ही मनाओ, भीतर का अंधेरा बाहर के दीयों से कटता नहीं, कटेगा नहीं। धोखे तुम अपने को कितने ही दो, पछताओगे अंततः। देखते हो, दीवाली हम मनाते हैं अमावस की रात! वह हमारे धोखे की कथा है। रात है अमावस की, दीयों की पंक्तियां जला लेते हैं। पर दीये तो होंगे बाहर। दीये तो भीतर नहीं जा सकते। बाहर की कोई प्रकाश की किरण भीतर प्रवेश नहीं कर सकती। भीतर की अमावस तो भीतर अमावस ही रहती है। बाहर की पूर्णिमा कितनी ही बनाओ, तुम तो भीतर जानते ही रहोगे कि बुझे हुए दीपक हो। तुम तो भीतर रोते ही रहोगे। तुम्हारी सब मुस्कुराहटें भी तुम्हारे आंसुओं को छुपाने में असमर्थ हैं। और छुपा भी लें तो सार क्या? मिटाने में निश्चित असमर्थ हैं।

धोखे छोड़ो! इस सीधे सत्य को स्वीकार करो कि तुम बुझे हुए दीपक हो। होने की जरूरत नहीं है। होना तुम्हारी नियति भी नहीं है। ऐसा होना ही चाहिए, ऐसा कोई भाग्य का विधान नहीं है। अपने ही कारण तुम बुझे हुए हो। अपने ही कारण चांद नहीं उगा। अपने ही कारण भीतर प्रकाश नहीं जगा। कहां भूल हो गई है? कहां चूक हो गई है?

हमारी सारी जीवन-ऊर्जा बाहर की तरफ यात्रा कर रही है। इस बहिर्यात्रा में ही हम भीतर अंधेरे में पड़े हैं। यह ऊर्जा भीतर की तरफ लौटे तो यही ऊर्जा प्रकाश बनेगी। यह ऊर्जा ही प्रकाश है।

तुम्हारा सारा प्रकाश बाहर पड़ रहा है..वृक्षों पर, पर्वतों पर, पहाड़ों पर, लोगों पर। लेकिन तुम एक अपने पर अपनी रोशनी नहीं डालते। सबको देख लेते हो अपने प्रति अंधे रह जाते हो। और सबको देख
[06/11, 7:31 pm] Hirendra Bauddha: *किसी को अपना बनाओ*
            *तो “दिल” से बनाओ….*
            *“जुबान” से नहीं ।*
     *और किसी पर गुस्सा करो*
            *तो “जुबान” से करो…..*
            *“दिल” से नही*
*सुई में वही धागा प्रवेश कर सकता है जिस धागे में कोई गांठ नहीं हो ,*
[06/11, 7:37 pm] Hirendra Bauddha: प्रानी अपने प्रभू से पूछे किस बिधि पाऊँ तोहे
प्रभू कहे तू मन को पा ले पा जाएगा मोहे
तोरा मन दर्पन कहलाए
भले, बुरे, सारे कर्मों को देखे और दिखाए
मन ही देवता, मन ही ईश्वर
मन से बड़ा ना कोई
मन उजियारा, जब जब फैले
जग उजियारा होए
इस उजले दर्पन पर प्राणी, धूल ना जमने पाए
सुख की कलियाँ, दुःख के काँटे
मन सब का आधार
मन से कोई बात छूपे ना
मन के नैन हजार
जग से चाहे भाग ले कोई, मन से भाग ना पाए
तन की दौलत ढ़लती छाया
मन का धन अनमोल
तन के कारन मन के धन को मत माटी में रोल
मन की कदर भूलानेवाला हीरा जनम गँवाए..!
[06/11, 7:38 pm] Hirendra Bauddha: दि बुक ऑव सीक्रेट्स



जिस व्यक्ति को तुमने गहराई से प्रेम किया है, उसकी मृत्यु के क्षण तुम्हें तुम्हारी मृत्यु की याद दिलाते हैं । मृत्यु का क्षण एक महान रहस्योद्घाटन का समय है। यह तुम्हें अहसास दिलाता है कि तुम नपुंसक और विवश हो। यह तुम्हें अहसास दिलाता है कि तुम हो ही नहीं। तुम्हारे होने का धोखा मिट जाता है।

कोई भी विचलित हो जायेगा क्योंकि अचानक तुम पाते हो कि तुम्हारे पांओं तले से ज़मीन खिसक गयी है। तुम कुछ भी नहीं कर पाते। कोई जिसे तुम प्रेम करते हो, मर रहा है। तुम चाहोगे कि तुम उसे अपना जीवन दे दो लेकिन तुम ऐसा कर नहीं सकते। कुछ भी नहीं हो सकता। व्यक्ति नितांत निर्बल सा प्रतीक्षा करता रहता है।

वह घड़ी तुम्हें अवसाद से भर जाती है। वह घड़ी तुम्हें उदास कर सकती है या फिर तुम्हें सत्य की एक महान यात्रा पर ले जा सकती है.... खोज की एक महान यात्रा। यह जीवन क्या है? यदि मृत्यु आकर इसे ले जा सकती है तो यह जीवन क्या है? इसका क्या अर्थ है यदि व्यक्ति मृत्यु के खिलाफ इतना नपुंसक है? और स्मरण रहे हर कोई अपनी मृत्युशय्या पर है। जीवनोपरांत हर कोई अपनी मृत्युशय्या पर है। दूसरा कोई रास्ता नहीं है। सब बिस्तर मृत्युशय्या हैं, क्योंकि जन्म के बाद एक ही बात निश्चित है और वह है मृत्यु।

कोई आज मरता है, कोई कल , कोई परसों: मूलत: फर्क क्या है? समय कोई खास फर्क नहीं डालता। समय केवल जीवन का भ्रम पैदा करता है लेकिन वह जीवन जिसका अंत मृत्यु में हो, वास्तविक जीवन नहीं है। निस्संदेह यह स्वप्न होगा।

जीवन केवल तभी प्रामाणिक है जब यह शाश्वत हो। अन्यथा स्वप्न में और जिसे तुम जीवन कहते हो उसमें क्या अंतर है? रात्रि में, गहरी निद्रा में एक स्वप्न उतना ही सत्य होता है जितना कुछ और, उतना ही वास्तविक-बल्कि उससे भी अधिक वास्तविक जो तुम खुली आंखों से देखते हो। सुबह होते ही यह विलीन हो जाता है , कोई चिंह नहीं बचता। सुबह जब तुम उठते हो तो पाते हो कि यह एक स्वप्न था, सत्य नहीं।

जीवन का यह स्वप्न कुछ वर्षों तक चलता है, फिर अचानक व्यक्ति जागता है और पूरा जीवन एक स्वप्न सिद्ध होता है। मृत्यु एक महान रहस्योद्घाटन है। यदि मृत्यु न होती तो कोई धर्म न होता। यह मृत्यु ही है जिसके कारण धर्म का अस्तित्व है। यह मृत्यु ही है जिसके कारण बुद्ध का जन्म हुआ। सब बुद्धों का जन्म मृत्यु के बोध के कारण होता है।

जब तुम किसी मरते हुए व्यक्ति के पास जाकर बैठो तो अपने लिये अफसोस करना। तुम भी उसी नाव में हो, तुम्हारी भी वही परिस्थिति है। मृत्यु एक दिन तुम्हारे द्वार पर भी दस्तक देगी। तैयार रहना। इससे पहले कि मृत्यु दस्तक दे, घर लौट आओ। बीच में ही मत पकड़े जाना, अन्यथा यह पूरा जीवन एक स्वप्न की भांति विलीन हो जाता है और तुम स्वयं को अत्यंत दीन पाते हो, आंतरिक रूप में दीन।

जीवन, वास्तविक जीवन, कभी नहीं मरता। फिर मरता कौन है? तुम मरते हो। 'मैं' मरता है, अहं मरता है। अहंकार मृत्यु का हिस्सा है; जीवन नहीं। तो यदि तुम अहंकारशून्य हो सकते हो, तो मृत्यु तुम्हें कभी न मार पायेगी। यदि तुम सचेतन रूप में अहंकार को गिरा सकते हो तो तुमने मृत्यु पर विजय पा ली। यदि तुम सचमुच जागरूक हो तो तुम इसे एक क्षण में गिरा सकते हो। तयदि तुम इतने जागरूक नहीं तो तुम इसे धीरे- धीरे गिरा सकते हो। यह तुम पर निर्भर करता है। लेकिन एक बात निश्चित है: अहंकार को गिराना ही होगा। अहंकार के मिटते ही मृत्यु तिरोहित हो जाती है। अहंकार के गिरते ही मृत्यु भी गिर जाती है।

मरते हुए व्यक्ति के लिये अफसोस मत करो, अपने लिये अफसोस करो। मृत्यु को तुम्हें घेर लेने दो। इसका स्वाद चखो। अहसास करो कि तुम असहाय हो, नपुंसक हो। कौन असहाय महसूस कर रहा है, और कौन नपुंसक महसूस कर रहा है? अहंकार-क्योंकि तुम पाते हो कि तुम कुछ नहीं कर सकते। तुम उसकी सहायता करना चाहते हो परंतु कर नहीं पाते। तुम चाहते हो कि वो जीवित रहे लेकिन कुछ भी नहीं किया जा सकता।

इस नपुंसकता को जितनी गहराई से हो सके महसूस करो और इस विवशता से एक प्रकार की जागरूकता, एक प्रर्थना और ध्यान उठेगा। व्यक्ति की मृत्यु को सीढ़ी बनाओ, यह एक अवसर है। हर बात को अवसर बना लो।

उनके पास बैठो। मौन बैठो और ध्यान करो। उनकी मृत्यु को एक दिशा निर्देश होने दो ताकि तुम अपने जीवन को व्यर्थ न गंवाते रहो। यही तुम्हारे साथ भी होने वाला है।
[06/11, 7:43 pm] Hirendra Bauddha: यहां बुद्ध को जानना हो तो उत्सव से जानने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। आंसू भी गिरें, तो आनंद में गिरें। पीड़ा भी हो, तो उसके प्यार की पीड़ा हो!देखते हैं चारों तरफ प्रकृति को! उत्सव ही उत्सव है। नाद ही नाद है। सब तरह के साज बज रहे हैं। पक्षियों में, पहाड़ों में, वृक्षों में, सागरों में--सब तरफ बहुत-बहुत ढंगों और रूपों में परमात्मा होली खेल रहा है। कितने रंग फेंकता है तुम पर! कितनी गुलाल फेंकता है तुम पर! और अगर तुम नहीं देख पाते, तो सिवाय तुम्हारे और कोई जिम्मेवार नहीं।
[06/11, 7:45 pm] Hirendra Bauddha: " क्रोध में आंय-बांय बकने लगता है आदमी , एक-दूसरे की बात न समझ पाने के कारण भ्रम पैदा हो जाता है कि मैं सही हूं , भ्रम में बुद्धि व्यग्र होती है , व्यग्रता में तर्क नष्ट हो जाते हैं और तर्क  नष्ट  होने पर व्यक्ति की शख्सियत का पतन  होने लगता है ।" यह क्रोध सदियों से मनुष्य के घाटे का सौदा रहा है । इसमें उसका पतन ठीक उसी प्रकार होता है जिस प्रकार आंधी आने पर अपनी मकान और दुकान का होता है। इसमें औरों का तो पता नहीं , किन्तु अपना नुकसान ही नुकसान है।...
[06/11, 7:50 pm] Hirendra Bauddha: तुम कहते हो, कृष्णानंद, संसार में मुझे बुराई ही बुराई क्यों दिखाई देती है? ज़रा भीतर टटोलो, ज़रा अपनी गांठ में टटोलो, वहां कुछ भूलचूक होगी। सब से बड़ी भूलचूक है, अहंकार। अहंकार के कारण लोग दूसरों में बुराई देखते हैं। क्योंकि अहंकार दूसरों में बुराई देखकर बड़ा प्रफुल्लित होता है कि मैं श्रेष्ठ, कि मैं सुंदर, कि मैं महात्मा, कि मैं पवित्र; कि कौन है जो मेरा जैसा विनम्र और कौन है जो मेरा जैसा पुण्यात्मा; कि कौन है जो मेरा जैसा दानवीर,दानशूर। अहंकार दूसरों पर जीता है। दूसरों की लकीरें छोटी कर देता है, तो अपनी लकीर बड़ी मालूम पड़ने लगती है। दूसरों को छोटा करने का एक ही उपाय है कि उनकी बुराई देखो, बुराई—ही—बुराई देखो।
[06/11, 7:51 pm] Hirendra Bauddha: *ओशो...*🎤💖🔔

*मेरे प्रिय आत्मन्*

     _*आज मैं अहिंसा पर आपसे बात करूंगा। पंच महाव्रत नकारात्मक हैं, अहिंसा भी। असल में साधना नकारात्मक ही हो सकती है, निगेटिव ही हो सकती है। उपलब्धि पॉजिटिव होगी, विधायक होगी। जो मिलेगा वह वस्तुतः होगा और जो हमें खोना है, वही खोना है जो वस्तुतः नहीं है।*_

_*अंधकार खोना है, प्रकाश पाना है। असत्य खोना है, सत्य पाना है। इससे एक बात और खयाल में ले लेनी जरूरी है कि नकारात्मक शब्द इस बात की खबर देते हैं कि अहिंसा हमारा स्वभाव है, उसे पाया नहीं जा सकता, वह है ही। हिंसा पायी गयी है, वह हमारा स्वभाव नहीं है। वह अर्जित है, एचीव्ड। हिंसक बनने के लिए हमें कुछ करना पड़ा है। हिंसा हमारी उपलब्धि है। हमने उसे खोजा है, हमने उसे निर्मित किया है। अहिंसा हमारी उपलब्धि नहीं हो सकती। सिर्फ हिंसा न हो जाये तो जो शेष बचेगा वह अहिंसा होगी।*_

_*इसलिए साधना नकारात्मक है। वह जो हमने पा लिया है और जो पाने योग्य नहीं है, उसे खो देना है। जैसे कोई आदमी स्वभाव से हिंसक नहीं है, हो नहीं सकता। क्योंकि कोई भी दुख को चाह नहीं सकता और हिंसा सिवाय दुख के कहीं भी नहीं ले जाती। हिंसा एक्सीडेंट है, सांयोगिक है। वह हमारे जीवन की धारा नहीं है। इसलिए जो हिंसक है वह भी चौबीस घंटे हिंसक नहीं हो सकता। अहिंसक चौबीस घंटे अहिंसक हो सकता है। हिंसक चौबीस घंटे हिंसक नहीं हो सकता। उसे भी किसी वर्तुल के भीतर अहिंसक ही होना पड़ता है। असल में, अगर वह हिंसा भी करता है तो किन्हीं के साथ अहिंसक हो सके, इसीलिए करता है। कोई आदमी चौबीस घंटे चोर नहीं हो सकता। और अगर कोई चोरी भी करता है तो इसीलिए कि कुछ समय वह बिना चोरी के हो सके। चोर का लक्ष्य भी अचोरी है, और हिंसक का लक्ष्य भी अहिंसा है। और इसीलिए ये सारे शब्द नकारात्मक हैं...क्रमशः*_

*ज्‍यों की त्‍यों धरि दीन्‍हीं चदरिया-(प्रवचन-01)*
[06/11, 7:52 pm] Hirendra Bauddha: मैं,तुम्हे बिन मांगे अपनी बहुमूल्य सलाह  देता हूँ
क्योकि मैं पुरुष हूँ
मैं सोशल प्रेजेंस से तुम्हारी वास्तविकता निर्धारित करता हूँ
क्योकि मैं पुरुष हूँ
मैं तुम्हारे कमेंट्स को तुम्हारा अफेयर कहता हूँ
क्योकि मैं पुरुष हूँ
मैं तुम्हारे वस्त्र विन्यास को नियंत्रित करता हूँ
क्योकि मैं पुरुष हूँ
मुझे तुम्हारा नाम कहीं जोड़ने की आजादी है
क्योकि मैं पुरुष हूँ
मैं बातो ही बातो मे तुम्हारे नित नए किस्से गढ़ता हूँ
क्योकि मैं पुरुष हूँ
मैं तुम्हारे घूँघट और पल्लू पर प्रश्नचिन्ह लगाता हूँ
क्योकि मैं पुरुष हूँ
मैं अपने उलाहनों को आसानी से मजाक कह देता हूँ
क्योकि मैं पुरुष हूँ
मैं स्वयं को सर्वोच्च रख तुम्हारा दोहन करता हूँ
क्योकि मैं पुरुष हूँ
मैं तुम्हारे वाक्यो से चारित्र का सत्यापन करता हूँ
क्योकि मैं पुरुष हूँ
मैं अपनी सुविधा अनुसार तुम्हारी छवि बनाता हूँ
क्योकि मैं पुरुष हूँ
मैं नारी अधिकारो का मुखोटा लगा उसका पक्षधर बन जाता हूँ
क्योकि मैं पुरुष हूँ
मैं तुम्हारे बहाने अपने हिडन एजेंडे को पूर्ण करता हूँ
क्योकि मैं पुरुष हूँ
सही मायनो में मैं दोगला,लंपट,धूर्त,विषैला,सुविधाभोगी हूँ
क्योकि मैं पुरुष हूँ
[06/11, 7:53 pm] Hirendra Bauddha: 🕸 *गीत को उठने दो और साज को छिड़ जाने दो।*🕸

चुप्पी को छूने दो लफ्जों के नर्म तारों को
और लफ्जों को चुप्पी की गजल गाने दो।
खोल दो खिड़कियां सब, और उठा दो पर्दे
नई हवा को जरा बंद घर में आने दो।
छत से है झांक रही, कब से चांदनी की परी
दीया बुझा दो, आंगन में उतर आने दो।
फिजां में छाने लगी है बहार की रंगत
जुही को खिलने दो, चंपा को महक जाने दो।
जरा सम्हलने दो मीरा की थिरकती पायल
जरा गौतम के सधे पांव बहक जाने दो।
हंसते ओंठों को जरा चखने दो अश्कों की नमी
और नम आंखों को जरा फिर से मुस्कुराने दो।
दिल की बातें अभी झरने दो हरसिंगारों-सी
बिना बातों के कभी आंख को भर आने दो।
रात को कहने दो, कलियों से राज की बातें
गुलों के ओंठों से उन राजों को खुल जाने दो।
जरा जमीं को अब उठने दो अपने पांवों पर
जरा आकाश की बांहों को भी झुक जाने दो।
कभी मंदिर से भी उठने दो अजान की आवाज
कभी मस्जिद की घंटियों को भी बज जाने दो।
पिंजरे के तोतों को दोहराने दो झूठी बातें
अपनी मैना को तो पर खोल चहचहाने दो।
उनको करने दो मुर्दा रस्मों की बरबादी का गम
हमें नई जमीन, नया आसमां बनाने दो।
एक दिन उनको उठा लेंगे इन सर-आंखों पर
आज जरा खुद के तो पांवों को सम्हल जाने दो।
जरा सागर को बरसने दो बन कर बादल
और बादल की नदी सागर में खो जाने दो।
जरा चंदा की नर्म धूप में सेंकने दो बदन
जरा सूरज की चांदनी में भीग जाने दो।
उसको खोने दो, जो कि पास कभी था ही नहीं
जिसको खोया ही नहीं, उसको फिर से पाने दो।
अरे, हांऱ्हां हुए हम, लोगों के लिए दीवाने
अब लोगों को भी कुछ होश में आ जाने दो।
ये है सच कि बहुत कड़वी है मय इस साकी की
रंग लाएगी, गर सांसों में उतर जाने दो।
छलकेंगे जाम जब छाएगी खुमारी घटा
जरा मैख्वारों के पैमानों को तो सम्हल जाने दो।
जरा साकी के तेवर तो बदल जाने दो।
न रहे मयखाना, न मयख्वार, न साकी, न शराब
नशे को ऐसी भी इक हद से गुजर जाने दो।
उसको गाने दो, अपना गीत मेरे ओंठों से
और मुझे उसके सन्नाटे को गुनगुनाने दो।
जरा सम्हलने दो मीरा की थिरकती पायल
जरा गौतम के सधे पांव बहक जाने दो।
गीत को उठने दो और साज को छिड़ जाने दो।।
वह घड़ी, वह संध्याकाल--जहां मीरा होश में आ जाती है और जहां बुद्ध नाचने लगते हैं, उसका नाम है--खुमारी। पीवत रामरस लगी खुमारी!
[06/11, 8:05 pm] Hirendra Bauddha: Love u jindagi.🌹
Kohinoor oshoni pooja💕

*♂जो भीतर है! वही बाहर झलकता है!!*★★★

प्रकाश को अंधकार का पता नहीं। प्रकाश तो सिर्फ प्रकाश को ही जानता है। जिनके हृदय प्रकाश और पवित्रता से आपूरित हो जाते हैं, उन्हें फिर कोई हृदय अंधकार पूर्ण और अपवित्र नहीं दिखाई पड़ता। जब तक हमें अपवित्रता दिखाई पड़े, जानना चाहिए कि उसके कुछ न कुछ अवशेष जरूर हमारे भीतर हैं। वह स्वयं के अपवित्र होने की सूचना से ज्यादा और कुछ नहीं है।
सुबह की प्रार्थना के स्वर मंदिर में गूंज रहे थे। आचार्य रामानुज भी प्रभु की प्रार्थना में तल्लीन से दीखते मंदिर की परिक्रमा करते थे। और तभी अकस्मात एक चांडाल स्त्री उनके सम्मुख आ गई। उसे देख उनके पैर ठिठक गये, प्रार्थना की तथाकथित तल्लीनता खंडित हो गई और मुंह से अत्यंत कलुष शब्द फूट पड़े : ''चांडालिन मार्ग से हट, मेरे मार्ग को अपवित्र न कर।'' प्रार्थना करती उनकी आंखों में क्रोध आ गया और प्रभु की स्तुति में लगे होठों पर विष। किंतु वह चांडाल स्त्री हटी नहीं, अपितु हाथ जोड़कर पूछने लगी, ''स्वामी, मैं किस ओर सरकूं? प्रभु की पवित्रता तो चारों ओर ही है! मैं अपनी अपवित्रता किस ओर ले जाऊं?'' मानों कोई परदा रामानुज की आंखों के सामने से हट गया हो, ऐसे उन्होंने उस स्त्री की ओर देखा। उसके वे थोड़े से शब्द उनकी सारी कठोरता बहा ले गये। श्रद्धावनत उन्होंने कहा, ''मां, क्षमा करो। भीतर का मैल ही हमें बाहर दिखाई पड़ता है। जो भीतर की पवित्रता से आंखों को जांच लेता है, उसे चहुं ओर पावनता ही दिखाई देती है।''
प्रभु को देखने का कोई और मार्ग मैं नहीं जानता हूं। एक ही मार्ग है और वह है - सब ओर पवित्रता का अनुभव होना। जो सब में पावन को देखने लगता है, वही और केवल वही प्रभु की कुंजी उपलब्ध कर पाता है।

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