साँची स्तूप के निर्माण में कई राजवंशों, देश के कई गाँव, शहर के लोगों, उनके संबंधियों, विभिन्न पेशा से जुड़े दानदाताओं ने योगदान किया है।
स्तूप की वेदिकाओं, स्तंभों पर अनेक गाँव, शहरों के नाम, दानदाताओं के नाम ब्राह्मी लिपि में लिखे हुए हैं।
भारत के गाँवों, शहरों और लोगों के नाम जो लिखे हुए हैं, उसे पढ़कर सहसा विश्वास ही नहीं होता है कि हमारे पूर्वज- पुरखे कभी अपना नाम, अपने गाँव का नाम प्राकृत भाषा में ऐसे रखा करते थे।
अब देखिए ना, कुछेक गाँवों - शहरों के नाम ... पहले तो साँची का नाम ही काकनादबोट था, फिर अनेक गाँव, शहरों के नाम अंकित हैं ... उजेन, कुरारा, भोगावाधन, कम्दगीगम, कुर्घरा आदि आदि!
तब लोगों के नाम भी प्राकृत भाषा में हुआ करते थे ... आप नीचे का अभिलेख पढ़िए ... ये साँची स्तूप के दानदाता हैं ... इनका नाम है - मिदतु! ऐसे अनेक लोगों का नाम वहाँ के अभिलेखों में दर्ज हैं - केकट, धमासिव, वहना, वजिगुत, कादक्ष, वाकला, नगादिन, अयपसनक, काबोज, विसकम, धमरिवत आदि!
अब गाँव - शहरों के नाम, लोगों के नाम संस्कृतनिष्ठ होते जा रहे हैं। प्राकृत नाम बीते युग की बात हो गई है। इन गाँवों - शहरों के नाम, लोगों के नाम, ऐसा लगता है मानो किसी दूसरे देश का नाम हो।
ये नाम लिखित हैं ... पत्थरों पर लिखित हैं ... प्रामाणिक हैं। हमारी भाषाई संस्कृति कितनी बदल गई है कि हम आज अपने पूर्वजों के नाम और गाँव भी नहीं पहचान पा रहे हैं!



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