[06/01, 4:46 pm] Hirendra Bauddha: ।।सद् गुरू संदेश ।।
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मन को काबू मे करने का प्रयास करना ही मन को बार बार वापिस लाता है।मन को काबू मे कोशिश ना कर केवल मन का निरीक्षण करना चाहिये ,आंख बंद करके बैठ जाये और मन मे जो भी चलता है बस देखे।उसके साथ शामिल ना हो ना उसे रोके।मतलब ना तो उसे शह दे ना उसका विरोध करे,क्योंकि मन का स्वभाव ही अशांति है।ध्यान मे मन शांत नही होता ,बल्कि मन अनुपस्थित हो जाता हैै।यानि दो स्थितियां होती है या तो मन है या नही है।शांत अशांत जैसी बात नही होती।

जिसे हम शांत मन कहते है वह मन का शांत होना नही है बल्कि मन का कम अशांत होना है,मन मे ज्यादा विचार चल रहे है तो मन ज्यादा अशांत और कम विचार चल रहे है तो कम अशांत।मन कभी भी पूरा शांत नही हो सकता।हां मन रहे ही नही,यानि किसी समय मन हो ही नही,अनुपस्थित हो जाये तो वह ध्यान की अवस्था होती है।
*उस स्थिति के लिये बस आंख बंद करके थोडी देर के लिये मन को खुला छोड़ दे व देखे मन मे आते तरह तरह के विचारो को।

जब मन को पूरी तरह छूट देते है व हम खुद उसके साथ इन्वोल्व नही होते तो वह स्वत:ही धीरे धीरे शांति की और बढता जाता है अर्थात समाप्त सा होने लगता है,बस ध्यान रखे ना तो मन को चलाने की कोशिश करे ना ही काबू मे करने की, बस हम आंख बंद करके मन की गतिविधियो का निरीक्षण करे बस

दो स्थितियों मे मन श्रृंखला बनाता है व आगे भविष्य मे या अगले जन्म मे भी उसका प्रभाव रहता है यदि एक मन को दबाया जाये।मन के दबाने से मन की इच्छा बाहर तो नही फलित होती लेकिन निकलती भी नही है,अंदर अचेतन मन मे गहरी पर्तो मे दब जाती है,वही इच्छा जो दबी है अचेतन मन मे ग्रंथियां पैदा करती है और किसी और रूप मे निष्कासित होती है।यदि हम मन की इच्छा को नही दबाकर मन के अनुसार चलते है तो वह वासना तो पूरी हो जाती है लेकिन वासना का स्वभाव है कि जैसे ही एक वासना पूरी हो मन तुरंत दूसरी वासना मे प्रवेश कर जाता है यानि दूसरी वासना बना लेता है।जैसे हमे एक लाख रूपये चाहिये तो जैसे ही एक लाख मिल जाते है तो मन वापिस 10 लाख की वासना निर्मित कर लेता है।तो मन की इच्छा पूरी करने के लिये किये जाने वाले बाहरी प्रयास भी मन से मुक्त नही करते
*लेकिन मै जो प्रयोग बता रहा हूं वहां ना तो मन की इच्छा को दबाना है और ना ही मन की इच्छा की पूर्ति करनी है केवल भीतर उठते विचारो को ,इच्छाओ को देखना है जैसे वह किसी और के भीतर उठ रही है हमारे स्वयं के भीतर नही।बस इस तरह निरीक्षण करना है इससे यह मन किसी विचार से दूसरा विचार निर्मित नही करेगा,केवल जो विचार आये उसे देखे और जाने दे।ना रोके ना बढाये।यदि विचार आगे ना फैले तो उसकी कोई श्रृंखला भविष्य मे नही बनती।

निरीक्षण से दूरी बनती है हमारे और विचारो के बीच।विचार मात्र ऊर्जा ही तो है़।जब हम उस विचार से दूरी बना लेते है तो उस विचार को हमारी और से ऊर्जा नही मिलती और वह विचार स्वत:ही धीरे धीरे विचार की ऊर्जा ना मिलने से समाप्त से होने लग जाते है।बस हम उसे ऊर्जा ना दे केवल देखे।

किसी विपरीत विचार को दोहराने से कोई ईच्छा मिटती नही है।हां केवल दब जाती है। विचार देखने ये विचार अनगिनत नही रहेगे बल्कि जैसे जैसे हम विचारो को देखना शुरू करेगे साथ ही साथ थोडे समय मे विचारो के बीच जो निर्विचार की स्थिति आती है ,दो विचारो के बीच जो छोटा सा निर्विचार का गैप है वह भी दिखना प्रारंभ हो जाता है,क्योंकि हर  विचार के बाद जब दूसरा विचार आता है तो बीच मे थोडा सा गैप होता है वह हम महसूस नही कर पाते,क्योंकि हम सदैव विचार के साथ इन्वोल्व होते है उससे दूरी नही रखते है तो गैप हमे कभी भी दिखाई नही देता ,क्योंकि मन सदा एक विचार के बाद दूसरे विचार मे जाता रहता है और हम मन के अनुसार चलते रहते है।जब अलग होकर देखने पर गैप दिखना प्रारंभ हो जाता है तो फिर तादात्म नही होने के कारण एवं विचार को ऊर्जा नही मिलने के कारण धीरे धीरे विचार तो कम होने लगते है और गैप बढने लगता है।
 यह गैप ही बाद मे फैलकर ध्यान बनने लग जाता है।।
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[06/01, 5:53 pm] Hirendra Bauddha: .
         💐ओशो 💐
..........✍🏻कभी जब चित बहुत प्रसन्न हो तो द्वार-दरवाजे बंद करके अपने कमरे में लेट जाए, कम से कम वस्त्र हो या नग्न होकर लेटे तो और भी बेहतर होगा। और एक मिनट तक अपने माथे पर हाथ रखकर दोनों आंखों के बीच में एक मिनट तक रगड़ते रहे। चित्त अगर प्रसन्न हो, तो माथे पर रगड़ते ही सारी प्रसन्नता माथे पर इक्कठी हो जाएगी।
ध्यान रहे जब आदमी उदास होता है। तो अक्सर माथे पर हाथ रखता है। माथे पर हाथ रखने से उदासी बिखरती है। और प्रसन्नता इकट्ठी होती है। हालांकि प्रसन्नता में कोई नहीं रखता,उसका खयाल नहीं है।
जब आदमी उदास होता है, दुःख होता है चिंतित होता है, तो माथे पर हाथ रखता है। उससे चिंता बिखर जाती हे। उस समय जो इकट्ठा है वह बिखर जाता है। निगेटिव कुछ होगा तो माथे पर हाथ रखने से बिखर जाता है। पाजीटिव कुछ होगा तो माथे पर हाथ रखने से इक्कठ्ठा हो जाता है।
इस लिए मैंने कहा: जब प्रसन्न क्षण हो मन को कोई,लेट जाएं, माथे पर एक क्षण रगड़ लें जोर से हाथ से, अपने ही हाथ से। वह जगह बीच में जो है, वह बहुत कीमती जगह है। शरीर में शायद सर्वाधिक कीमती जगह है। वह अध्यात्म का सारा राज छिपा है। थर्ड आई, कोई कहता है उसे कोई शिवनेत्र, उसे कोई भी कुछ नाम देता हो, पर वहां राज छिपा है। उस पर हाथ रगड़ लें। उस पर हाथ रगड़ने के बाद जब आपको लगे कि प्रसन्नता सारे शरीर से दौड़ने लगी है उस तरफ, आँख बंद ही रखें, और सोचें कि मेरा सिर कहां हे। खयाल करें आप आँख बंद करके कि मेरा सर कहां है।
आपको बराबर पता चल जाएगा कि सिर कहां है। सब को पता है, अपना सिर कहां है। फिर एक क्षण के लिए सोचें कि मेरा सिर जो है, वह छ: इंच लंबा हो गया। आप कहेंगे, कैसे सोचेंगे।
यह बिलकुल सरल है, और एक दो दिन में आपको अनुभव में आ जाएगा कि माथा छ: इंच लंबा हो गया। आँख बंद किए। फिर वापिस लौट आएं, नार्मल हो जाएं, अपनी खोपड़ी के अंदर वापिस आ जाएं। फिर छ: इंच पीछे लोटे, फिर वापस लोटे, पाँच सात बार करें।
जब आपको यह पक्का हो जाए कि यह होने लगा, तब सोचें कि पूरा शरीर मेरा जो है। वह कमरे के बराबर बड़ा हो गया है। सिर्फ सोचना, जस्ट ए थाट, एंड दि थिंग हैपेंस। क्योंकि जैसे ही वह तीसरे नेत्र के पास शक्ति आती हे। आप जो भी सोचें, वह हो जाता हे। इसलिए इस तरफ शक्ति लाकर कभी भी कुछ भूलकर गलत नहीं सोच लेना, वरना ........
इस लिए इस तीसरे नेत्र के संबंध में बहुत लोगों को नहीं कहा जाता है। क्योंकि इससे बहुत संबंधित द्वार हैं। यह करीब-करीब वैसी ही जगह है, जैसा पश्चिम का विज्ञान ऐटमिक एनर्जी के पास जाकर झंझट में पड़ गया है। वैसाही पूरब को योग इस बिंदु के पास आकर झंझट मैं पड़ गया था। और पूरब के मनीषी यों ने खोजा हजारों वर्षों तक, और फिर छिपाया इसको। क्योंकि आम आदमी के हाथ में पडा तो खतरा शुरू हो जाएगा।
अभी पश्चिम में वहीं हालत है। आइंस्टीन रोते-रोते मरा है, कि किसी तरह एटमिकएनर्जी के सीक्रेट खो जाए तो अच्छा हो। नहीं तो आदमी मर जाएगा।
पूरब भी एक दफा इस जगह आ गया था दूसरे बिंदु से, और उसने सीक्रेट खोज लिया था। और उससे बहुत उपद्रव संभव हो गए थे, और शुरू हो गए थे तो,उन्हें भुला देना पडा। पर यह छोटा-सा सूत्र मैं कहता हूं, इससे कोई बहुत ज्यादा खतरे नहीं हो सकते है। क्योंकि और गहरे सूत्र है, जो खतरे ला सकते है।



[06/01, 5:59 pm] Hirendra Bauddha: 🔴बुद्धि का संतुलन

आपके पास जो बुद्धि है, वह बुद्धि आपकी पूर्णता नहीं है। आप बुद्धि से बहुत ज्यादा हैं। जैसे मेरा हाथ सिर्फ मेरा हाथ है, हाथ से मैं बहुत ज्यादा हूं। मेरा पैर सिर्फ मेरा पैर है, मैं पैर से बहुत ज्यादा हूं। ऐसे ही बुद्धि भी मेरा एक उपकरण है, उससे मैं बहुत ज्यादा हूं। तो जो सिर्फ बुद्धि से खोज करेंगे, वे परमात्‍मा तक नहीं पहुंचेंगे।

समग्र तक पहुंचना हो तो खुद भी समग्र होना पड़ेगा। बुद्धि एक अंग है, उपयोगी। लेकिन बुद्धि ने पूरी मालकियत कर ली है। और आपको ऐसा लगने लगा है बुद्धि की मालकियत से कि आप खोपड़ी के भीतर रहे हैं। अगर कोई आपसे पूछे कि आप कहां हैं, तो आप इशारा करेंगे खोपड़ी के भीतर। यह एक बड़ी भारी दुर्घटना है।
बच्चा जब मां के पेट में होता है, तो मस्तिष्क न के बराबर होता है, लेकिन बच्चा पूरा होता है। और मस्तिष्क के बिना भी शरीर बढ़ता है, बड़ा होता है।
जीवन मस्तिष्क से पहले है। और जीवन की प्रक्रिया से मस्तिष्क पैदा होता है। जब बच्चा पैदा होता है, तो उसके पास केवल दस प्रतिशत मस्तिष्क होता है। फिर नब्बे प्रतिशत तो विकसित होगा। और जब मां के पेट में पहले दिन बच्चे का अणु निर्मित होता है, तब तो मस्तिष्क जैसी कोई चीज होती ही नहीं। लेकिन जीवन होता है। और जीवन फैलता है।
जिस तरह पैर बढ़ता है, हाथ बढ़ते हैं, उसी तरह मस्तिष्क भी बढ़ता है। वह जीवन की एक शाखा है। शाखा को मूल मत समझें। और उस शाखा को ही सब समझकर जो जीने की कोशिश करेगा, उसकी दृष्टि पंगु हो जाएगी।
इसलिए बुद्धि से जीने वाले लोग पंगु हो जाते हैं, क्रिपिल्ड। जैसे कोई आदमी सिर्फ हाथ से ही जी रहा हो, और सारे शरीर को बांधकर रख दे। तो उस आदमी की क्या जिंदगी होगी! वह हाथ से ही देखने की भी कोशिश करेगा। हाथ से ही सुनने की भी कोशिश करेगा। हाथ से ही चलेगा भी। हाथ ही सब कुछ बना ले और सारे शरीर को बांधकर रख ले, ऐसी हमारी हालत है।
हमने मस्तिष्क को सब कुछ बना लिया है और सारे व्यक्तित्व को बांधकर रख दिया है। यह जकड़ा हुआ, बंधा हुआ व्यक्तित्व परम सत्य को नहीं जान सकता। इसलिए बुद्धि से थोड़ा गहरे उतरना जरूरी है। और जीवन के उस तल पर आना चाहिए जो बुद्धि के पहले था, और जिस दिन मस्तिष्क जल रहा होगा चिता में, उस दिन भी होगा।
जीवन विराट शक्ति है। आप उस जीवन की विराट शक्ति का एक छोटा—सा पहलू हैं—मस्तिष्क में।
शिव ने पार्वती को दिए गए सूत्रों में एक सूत्र कहा है। और कहा है कि तू ऐसे जी जैसे मस्तिष्क नहीं है—हेड़लेस—जैसे खोपड़ी नहीं है। आप भी चकित होंगे। अगर आप चलते—उठते एक ही बात का स्मरण रख सकें कि खोपड़ी गई,नहीं है, बिना खोपड़ी के सिर्फ धड़ ! अगर आप तीन महीने इसका अभ्यास कर सकें—जब भी स्मरण आ जाए तो बस,खोपड़ी नहीं है—आप बहुत चकित होंगे, आपकी जिंदगी में बड़े परिवर्तन हो जाएंगे।
क्योंकि खोपड़ी नहीं है, तो आप धीरे—धीरे हृदय की तरफ सरकने लगेंगे, वह केंद्र बन जाएगा होने का। और खोपड़ी नहीं है तो आप बड़ी मुश्किल में पड़ेंगे कि अब अशात कैसे हों? खोपड़ी नहीं है तो अब बेचैन कैसे हों? खोपड़ी नहीं है तो अब क्रोध कैसे करें न अब चिंतित कैसे हों?
खोपड़ी का त्याग सब उपद्रव का त्याग हो जाता है। अगर तीन महीने आप इस अभ्यास को करते रहें, आप पाएंगे आपकी चिंताए विसर्जित हो गईं, आपके मन में चलने वाले तूफान और आंधिया खो गईं, और आप ज्यादा संतुलित, शात और सौम्य हो गए। और हृदय में उतर आए।
लेकिन हृदय से भी नीचे एक और गहराई है, जो नाभि है। क्योंकि बच्चे के जीवन की पहली पूलक नाभि से शुरू होती है। हृदय से भी नीचे उतरने के उपाय हैं। और जब कोई व्यक्ति ठीक नाभि में पहूंच जाता है, तब अपने केंद्र पर, सेंटर पर आ गया। और उस केंद्र से ही परमात्मा से संबंध जुड़ सकता है।
[07/01, 8:22 am] Hirendra Bauddha: *हम वही सुनते हैं जहां हमारा मन लगा है*

एक फकीर अपने एक साथी के साथ एक बाजार से गुजरता था। पास ही की पहाड़ी पर खड़े चर्च की संध्या की प्रार्थना की घंटियां बजने लगीं। उस फकीर ने कहा, सुनते हो उस युवक को कितना मधुर रव है! कैसा प्यारा संगीत है! पहाड़ पर खड़े चर्च की घंटियों की आवाज सुनी? उस युवक ने कहा, इस बाजार के शोरगुल में कहां का पहाड़, कहां का चर्च, कहां की घंटियां! मुझे कुछ सुनाई नहीं पड़ता। यहां इतना शोरगुल मचा है, सांझ का वक्त है, लोग अपनी दुकानें उठा रहे हैं, ग्राहक आखिरी खरीद फरोख्त कर रहे हैं, बेचने वाले भी कोशिश में हैं कि कुछ कम दाम में ही सही, जल्दी बिक जाए, जो भी बिक जाए बिक जाए। सूरज ढलने ढलने को है। लोगों को अपना सामान बांधना है। लोगों को अपनी गाड़ियां तैयार करनी हैं। लोगों को भागना है अपने घरों की तरफ। यहां इतना शोरगुल मचा है! घोड़े हिनहिना रहे हैं, बैल आवाज कर रहे हैं, गाड़ियां जोती जा रही हैं। घुड़सवार हैं, आदमी हैं, भीड़ भाड़ है। कहां की घंटियां? इतनी भीड़ भाड़ में, इतने शोरगुल में मुझे कुछ सुनाई नहीं पड़ता।

उस फकीर ने अपनी जेब से एक रुपया निकाला। पुरानी कहानी है। नगद, चांदी का रुपया! जोर से उसे पास के ही पत्थर पर पटक दिया। सड़क के किनारे लगा पत्थर, खननखन की आवाज! और एक भीड़ इकट्ठी हो गई। सौ दो सौ आदमी एकदम दौड़ पड़े। कहा कि किसी का रुपया गिरा। उस फकीर ने उस युवक को कहा, देखते हो! घोड़े हिनहिना रहे हैं, गाड़ियां सजाई जा रही हैं, खरीद फरोख्त का आखिरी वक्त, सांझ हो रही है, बिसाती अपना फैलाव संवार रहे हैं; लेकिन रुपये की खननखन दो सौ आदमियों ने सुन ली! और चर्च की घंटियां गूंज रही हैं, किसी को सुनाई नहीं पड़ता!

रुपये पर जिसका मन अटका हो वह रुपये को सुन लेगा। हम वही सुनते हैं जहां हमारा मन लगा है। हम वही गुनते हैं जहां हमारा मन लगा है। हम वही देखते हैं…रास्ता तो वही होता है, लेकिन हर गुजरने वाला अलग अलग चीजें देखता है। चमार रास्ते के किनारे बैठा हुआ तुम्हारे चेहरे नहीं देखता, तुम्हारे जूते देखता है। चेहरों से उसे क्या लेना देना! उसका प्रयोजन जूतों से है। लोग वही देखते हैं जहां उनकी वासना है, जहां उनकी आकांक्षा है, अभीप्सा है।
[08/01, 12:13 pm] Hirendra Bauddha: जापान में एक कहानी है। एक बौद्ध साध्वी थी। उसके पास बड़े प्यारे बुद्ध की प्रतिमा थी। स्फटिक की बनी थी। और वह रोज बुद्ध की प्रार्थना करती सुबह-सांझ, आरती उतारती, दीया जलाती, ऊदबत्ती लगाती। साध्वी थी तो अक्सर मंदिरों में ठहरती। यात्रा पर जाती। एक बार मंदिर में ठहरी। हजार बुद्धों का मंदिर, जहां हजार प्रतिमाएं हैं बुद्ध की। उसने सुबह अपने छोटे से बुद्ध को निकाला। ये हजार इतनी बड़ी प्रतिमाएं पूजा के लिए काफी नहीं हैं! उसे अपनी थैली में जो बुद्ध हैं, उनकी ही प्रार्थना करनी है। ये उसी बुद्ध की प्रतिमाएं हैं सारी, बड़ी विराट प्रतिमाएं हैं, जिन्हें देखने हजारों मील से लोग आते हैं। लेकिन जब वह सुबह पूजा करने बैठी तो उसने अपनी झोली में से अपने बुद्ध निकाले। अपने-अपने बुद्ध सब सम्हाल कर रखते हैं। ऐसे उधार बुद्ध और हर किसी के बुद्ध और ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे जिनकी प्रार्थना करते हैं। लोग अपने-अपने विशिष्ट बुद्ध रखते हैं, अपनी थैली में रखते हैं, सम्हाल कर रखते हैं। अपने बुद्ध को निकाला, बिठाया आसन पर। छोटा सा आसन भी रखती थी।

तब उसे एक सवाल उठा कि आज अगर मैंने ऊदबत्ती लगाई तो ऊदबत्ती के धुएं पर किसका क्या बस! धुआं तो धुआं है। धुआं कोई आदमी तो नहीं है। आदमी जैसी बुद्धि भी धुएं के पास नहीं है। धुआं तो उड़ेगा और ये जो हजार बुद्धों की प्रतिमाएं हैं, न मालूम किसके नासापुटों में समा जाए। धुआं तो धुआं है, धुएं का क्या भरोसा! तो उसने एक छोटी सी पोंगरी बनाई–बांस की पोंगरी। ऊदबत्ती लगाई और बांस की पोंगरी में से धुएं को अपने बुद्ध तक पहुंचाया। उसने जो किया, सो ठीक, मगर हुआ यह कि बुद्ध का चेहरा काला हो गया। वह बड़ी दुखी हुई। यह प्यारी-प्यारी प्रतिमा खराब हो गई।

मंदिर का बड़ा पुजारी यह सब खड़ा देखता था। वह एक पहुंचा हुआ फकीर था। उसने कहा कि तेरी बात मैं समझ पाया। यह तेरा देख रहा हूं खेल। मगर देख, तेरे साथ बुद्ध की क्या गति हो गई! तू तो मुक्त न हुई बुद्ध को पाकर, बुद्ध तेरे कैदी हो गए। तू तो बुद्ध को पाकर सुंदर न हुई, बुद्ध कुरूप हो गए। जरा देख बुद्ध को क्या हुआ! तूने चेहरा काला कर दिया। ऐसी भी क्या बात? ऐसा भी क्या लोभ, मोह? ऐसा भी क्या बंधन?

मगर यही है हालत। अपने-अपने भगवान हैं। अपने-अपने मंदिर हैं। तुमने प्रेम को समझा ही नहीं। प्रेम विस्तीर्ण है। प्रेम कोई सीमा नहीं मानता और न कोई सीमा जानता है। प्रेम कुछ मांगता नहीं उत्तर में। प्रेम कोई प्रत्युत्तर नहीं चाहता। प्रेम तो इसी से धन्यभागी अनुभव करता है कि मैं प्रेम को कर पाया।



[08/01, 2:04 pm] Hirendra Bauddha: धम्म प्रचार एव प्रसार के लिए संपूर्ण विश्व में बौद्धों का एक ही प्रातिक होना चाहिए इस विचार को श्रीलंका के अनागारिक देवंमित्त धम्मपाल, महास्थवीर गुणानंद ,सुमगल ,बौद्ध विद्वान् जी आर .डिसिल्वा आदी ने मिलकर नीला, पिला, लाल, सफ़ेद, केसरी, एसे पाच रगों के खड़े एव आड़े पट्टों में विश्व बोद्ध ध्वज की निर्मीती की….! जिसका माप -खड़ा 50 से. मी.,तथा अडा 70 से.मी. है !
1) नीला रंग — शांति एव प्रेम का प्रतिक है !
2) पिला रंग — तेज और उत्साह का प्रतिक है !
3) लाल रंग — शौर्य और साहस का प्रतिक है !
4) सफेद रंग — शुद्धता और निर्मलता का प्रतिक है !
5) केसरी रंग — त्याग और करुना का प्रतिक है !
मन जाता है की तथागत की काया से प्रस्फुटित होनेवाले रगों की आभा के अनुरूप इनमे रगों का समावेश किया गया है…… ! अत : इसे विश्व “बौद्ध ध्वज” या “धम्म ध्वज”…… ही कहना न्याय सगत होगा !
8 जनवरी….बौद्ध धम्म ध्वज दिन….आप सभी को पंचशील बौद्ध धम्म ध्वज दिन की हार्दिक बधाई

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