आर्यसत्य की संकल्पना बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत है। इसे संस्कृत में 'चत्वारि आर्यसत्यानि' और पालि में 'चत्तरि अरियसच्चानि' कहते हैं

आर्यसत्य चार हैं-
  • (1) दुःख : संसार में दुःख है,
  • (2) समुदय : दुःख के कारण हैं,
  • (3) निरोध : दुःख के निवारण हैं,
प्राणी जन्म भर विभिन्न दु:खों की शृंखला में पड़ा रहता है, यह दु:ख आर्यसत्य है। संसार के विषयों के प्रति जो तृष्णा है वही समुदय आर्यसत्य है। जो प्राणी तृष्णा के साथ मरता है, वह उसकी प्रेरणा से फिर भी जन्म ग्रहण करता है। इसलिए तृष्णा की समुदय आर्यसत्य कहते हैं। तृष्णा का अशेष प्रहाण कर देना निरोध आर्यसत्य है। तृष्णा के न रहने से न तो संसार की वस्तुओं के कारण कोई दु:ख होता है और न मरणोंपरांत उसका पुनर्जन्म होता है। बुझ गए प्रदीप की तरह उसका निर्वाण हो जाता है। और, इस निरोध की प्राप्ति का मार्ग आर्यसत्य - आष्टांगिक मार्ग है। इसके आठ अंग हैं-सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वचन, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। इस आर्यमार्ग को सिद्ध कर वह मुक्त हो जाता है।

पंचशील बौद्ध धर्म की मूल आचार संहिता है जिसको थेरवाद बौद्ध उपासक एवं उपासिकाओं के लिये पालन करना आवश्यक माना गया है।
भगवान बुद्ध द्वारा अपने अनुयायिओं को दिया गया है यह पंचशील।
हिन्दी में इसका भाव निम्नवत है-
1. हिंसा न करना, 2. चोरी न करना, 3. व्यभिचार न करना, 4. झूठ न बोलना, 5. नशा न करना।
पालि में यह निम्नवत है-
1- पाणातिपाता वेरमणी-सिक्खापदं समादयामि।।
2- अदिन्नादाना वेरमणी- सिक्खापदं समादयामि।।
3- कामेसु मिच्छाचारा वेरमणी- सिक्खापदं समादयामि।।
4- मुसावादा वेरमणी- सिक्खापदं समादयामि।।
5- सुरा-मेरय-मज्ज-पमादठ्ठाना वेरमणी- सिक्खापदं समादयामि।।

आर्याष्टांगमार्ग
 महात्मा बुद्ध की प्रमुख शिक्षाओं में से एक है जो दुखों से मुक्ति पाने एवं आत्म-ज्ञान के साधन के रूप में बताया गया है। अष्टांग मार्ग के सभी 'मार्ग' , 'सम्यक' शब्द से आरम्भ होते हैं (सम्यक = अच्छी या सही)। बौद्ध प्रतीकों में प्रायः अष्टांग मार्गों को धर्मचक्र के आठ ताड़ियों (spokes) द्वारा निरूपित किया जाता है।
बौद्ध धर्म के अनुसार, चौथे आर्य सत्य का आर्य अष्टांग मार्ग है - दुःख निरोध पाने का रास्ता। गौतम बुद्ध कहते थे कि चार आर्य सत्य की सत्यता का निश्चय करने के लिए इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए :
  1. सम्यक दृष्टि : चार आर्य सत्य में विश्वास करना
  2. सम्यक संकल्प : मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा करना
  3. सम्यक वाक : हानिकारक बातें और झूठ न बोलना
  4. सम्यक कर्म : हानिकारक कर्म न करना
  5. सम्यक जीविका : कोई भी स्पष्टतः या अस्पष्टतः हानिकारक व्यापार न करना
  6. सम्यक प्रयास : अपने आप सुधरने की कोशिश करना
  7. सम्यक स्मृति : स्पष्ट ज्ञान से देखने की मानसिक योग्यता पाने की कोशिश करना
  8. सम्यक समाधि : निर्वाण पाना और स्वयं का गायब होना
कुछ लोग आर्य अष्टांग मार्ग को पथ की तरह समझते है, जिसमें आगे बढ़ने के लिए, पिछले के स्तर को पाना आवश्यक है। और लोगों को लगता है कि इस मार्ग के स्तर सब साथ-साथ पाए जाते है। मार्ग को तीन हिस्सों में वर्गीकृत किया जाता है : प्रज्ञा, शील और समाधि।

बौद्ध धर्म में 'परिपूर्णता' या कुछ गुणों का चरमोन्नयन की स्थिति को पारमिता या पारमी (पालि) कहा गया है। बौद्ध धर्म में इन गुणों का विकास पवित्रता की प्राप्ति, कर्म को पवित्र करने आदि के लिए की जाती है ताकि साधक अनावरुद्ध जीवन जीते हुए भी ज्ञान की प्राप्ति कर सके। 'पारमिता' शब्द 'परम्' से व्युत्पन्न है।
छः पारमिता : महायान ग्रन्थों में छः पारमिता की गणना मिलती है-
  1. दान पारमिता
  2. शील पारमिता
  3. क्षान्ति पारमिता
  4. वीर्य पारमिता
  5. ध्यान पारमिता
  6. प्रज्ञा पारमिता
दशभूमिकासूत्र में निम्नलिखित चार पारमिता भी गिनायी गयीं हैं-
  • 7. उपाय पारमिता
  • 8. प्राणिधान पारमिता
  • 9. बल पारमिता
  • 10. ज्ञान पारमिता
दस पारमिता : थेरवाद ग्रन्थों में दस पारमिता वर्णित हैं-
  1. दान पारमी
  2. शील पारमी
  3. नेक्खम्मा (त्याग) पारमी
  4. पण्ण पारमी
  5. वीरिय पारमी
  6. खान्ति पारमी
  7. सच्च पारमी
  8. अधित्थान पारमी
  9. मेत्ता पारमी
  10. उपेक्खा पारमी।           

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