विश्व का पहला विश्वविद्यालय तक्षशिला की कहानी-

तक्षशिला (पालि : तक्कसिला) प्राचीन भारत में गांधार देश की राजधानी और शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था। यहाँ का विश्वविद्यालय विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों में शामिल है। 
बौद्धयुग में तो वह विद्या का सर्वमुख्य क्षेत्र थी। यद्यपि बौद्ध साहित्य के प्राचीन सूत्रों में उसकी चर्चा  मिलती तथापि जातकों में उसके वर्णन भरे पड़े हैं। त्रिपिटक की टीकाओं और अठ्ठकथाओं से भी उसकी अनेक बातें ज्ञात होती हैं। तदनुसार बनारस, राजगृह, मिथिला और उज्जयिनी जैसे भारतवर्ष के दूर-दूर क्षेत्रों से विद्यार्थी वहाँ पढ़ने के लिये जाते और विश्वप्रसिद्ध गुरुओं से शिक्षा प्राप्त करते थे।वहाँ के पाठयक्रम में आयुर्वेद, धनुर्वेद, हस्तिविद्या, त्रयी, व्याकरण, दर्शनशास्त्र, गणित, गणना, संख्यानक, वाणिज्य, सर्पविद्या,  संगीत, नृत्य और चित्रकला आदि का मुख्य स्थान था।

*** ऐतिहासिक रूप से यह तीन महान मार्गों के संगम पर स्थित था-

(1) उत्तरापथ - वर्तमान ग्रैण्ड ट्रंक रोड, जो गंधार को मगध से जोड़ता था(इस रोड का निर्माण करने वाला सर्वप्रथम शासक चंद्रगुप्त मौर्य जो गंधार को मगध से जोड़ता था)

(2) उत्तरपश्चिमी मार्ग - जो कापिश और पुष्कलावती आदि से होकर जाता था,

(3) सिन्धु नदी मार्ग - श्रीनगर, मानसेरा, हरिपुर घाटी से होते हुए उत्तर में रेशम मार्ग और दक्षिण में हिन्द महासागर तक

ऐतिहासिक प्रमाण के अनुसार तक्षशिला विश्वविद्यालय का निर्माण किसने कराया यह ज्ञात नहीं हुआ है इतिहास में यह लिखा गया है कि अखंड भारत निर्माता सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य अपने विजयो में तक्षशिला विश्वविद्यालय को जीता था परंतु इस विश्वविद्यालय का निर्माण किसने कराया अभी इतिहास में यह नहीं बताया गया है परन्तु कुछ इतिहासकरों का मत  है कि अजातशत्रु ने तक्षशिला विश्वविद्यालय का निर्माण कराया था इसी विश्वविद्यालय से सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य शिक्षा प्राप्त किये थे सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के  पुत्र बिंदुसार, पौत्र सुसीम और पपौत्र कुणाल वहाँ बारी-बारी से प्रांतीय शासक नियुक्त किए गये। दिव्यावदान से ज्ञात होता है कि वहॉँ मत्रियों के अत्याचार के कारण कभी कभी विद्रोह भी होते रहे और अशोक (सुसीम के प्रशासकत्व के समय) तथा कुणाल (अशोक के राजा होते) उन विद्रोहों को दबाने के लिये भेजे  गए ।

वर्तमान समय में तक्षशिला, पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के रावलपिण्डी जिले की एक तहसील तथा महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है जो इस्लामाबाद और रावलपिंडी से लगभग 32 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित है। ग्रैंड ट्रंक रोड इसके बहुत पास से होकर जाता है। यह स्थल 1970 से यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में सम्मिलित है। वर्ष 2010 की एक रिपोर्ट में विश्व विरासत फण्ड ने इसे उन 12 स्थलों में शामिल किया है जो अपूरणीय क्षति होने के कगार पर हैं। इस रिपोर्ट में इसका प्रमुख कारण अपर्याप्त प्रबन्धन, विकास का दबाव, लूट, युद्ध और संघर्ष आदि बताये गये है और पाँचवीं शताब्दी में हूणों  आक्रमण।

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