ओशो...

रोओ! रोने की कला सीखो! कभी—कभी अकारण रोओ। रोने के मजे के लिए ही रोओ। कभी शांत बैठ जाओ और आने दो आंसुओ को। तुम सोचोगे ऐसे कसे आ जाएँगे, कोई कारण तो चाहिए, ऐसे कैसे आ जाएँगे? मैं तुमसे कहता हूँ तुम जरा प्रतीक्षा तो करो किसी दिन बैठकर! तुम चकित होओगे, आते हैं। क्योंकि

 कारण तो जिंदगी भर रहे हैं, तुम आंसू रोक कर बैठे हो। कारण तो कितने आए और चले गये, तुम नहीं रोए हो। और हर बार आँसू भरे थे और निकलना चाहते थे। उनके बाँध तुमने बाँध दिये हैं। बाँध को टूटने दो।

बैठो और रोओ। सौंदर्य को देखो परमात्मा के और रोओ। संगीत को सुनो परमात्मा के और रोओ। आह्लाद में रोओ। रोओ और नाचो। नृत्य तुम्हारे शरीर को पवित्र कर जाएगा। आँसू तुम्हारी आँखों को पवित्र कर जाएँगे। लेकिन लोग बडे उल्टे करते रहते हैं।

लोग यहाँ दूसरों को बचाने में लगे रहते हैं और खुद डूब जाते हैं। न—मालूम कितनों की नावें बचा लेते हैं और यह भूल ही जाते हैं कि अपनी किश्ती शिकस्ता होती जा रही है, टूटती जा रही है — डूबी, अब डूबी, तब डूबी। यहाँ लोग दूसरों को सलाह देते हैं और अपनी ही सलाह अपने काम में नहीं लाते।
जब हँसने—हँसाने के दिन थे हम आठ पहर रोते ही रहे
अब वक्त जो आया रोने का हम अश्क बहाना भूल गये

तुम पूछते हो —— आँख को निर्मल करने का उपाय! तुम्हें खुद ही ख्याल आ जाना चाहिए था, उपाय तो आँख के साथ जुड़ा है——आँसू। मगर शायद आँसू की प्रक्रिया भूल गयी होगी। जिंदगी सख्त कर गयी होगी, पथरीला कर गयी होगी; हृदय को सुखा गयी होगी, रसधार नहीं बहती होगी। उस रसधार को उमगाओ। फिर से बहने दो, आँसुओं को आने दो, आंखों को गीली होने दो। आँखें गीली होंगी तो हृदय भी गीला होगा। और गीला हृदय परमात्मा के निकट हो जाता है, सूखा हृदय दूर हो जाता है।

भक्त ऐसे ही नहीं रोए। समझ लिया था उन्होंने कि रोना भजन की गहरी—से— गहरी प्रक्रिया है। भाव जब भीग जाते हैं, शब्द क्या कहेंगे जो आँसू कह सकते हैं! और तुमने ख्याल किया है, जब भी भाव अतिरेक होता है तो आंसू जरूर आते हैं, फिर चाहे भाव दुख का हो, चाहे सुख का हो, आनंद का हो, कोई भी भाव हो। जब भी भाव अतिरेक में हो जाता है, जब उसकी बाढ़ आती है, तो आंसूओं से बहता है।
संगीत को सुनो और रोओ। सूर्यास्त को देखो और बहने दो आँसुओं को।

इस अपूर्व जगत को अनुभव करो। यह हमारे होने का विस्मय, यह हमारा होना कितना विस्मयपूर्ण है! हमारे होने की कोई आवश्यकता नहीं है, कोई अनिवार्यता नहीं है, हमारे बिना दुनिया बड़े मजे में होती, कोई अड़चन न आती। यह हमारा होना इतना बड़ा चमत्कार है! इस चमत्कार को नहीं देखते और क्षुद्र चमत्कारों की तलाश में रहते हो——मदारियों की तलाश में रहते हो! किसीने हाथ से राख निकाल दी, अहहss। इतना बड़ा चमत्कार हुआ है कि तुम हो, चैतन्य है, प्रेम है, जीवन है! जो नहीं होना चाहिए था, कोई कारण नहीं जिसके होने का, है। तुमने कमाया नहीं है, अर्जित नहीं किया है, यह तुम्हारा हक नहीं है, यह तुम्हें भेंट मिली है, यह प्रसाद अनुग्रह है। इस अनुग्रह में रोओ।

रोओ, विरह में रोओ, परमात्मा नहीं मिला है अब तक इसलिए रोओ। और फिर जब मिल जाए तो इसलिए रोना कि परमात्मा मिल गया है। रोना दोनों समय काम आता है। जब नहीं मिला तब भी, और जब मिल जाता है तब भी।
डरो मत; भयभीत न होओ। क्योंकि मनुष्य जी रहा है बुद्धि से और बुद्धि के आँकडूाएं की पकड़ में आँसू नहीं आते। आँसू दूसरे ही जगत से आते हैं, उनका बुद्धि से कुछ संबंध नहीं है। आँसू हृदय से आते हैं। इसलिए तुम रोओगे तो दूसरे समझेंगे दुख में हो, पीड़ा में हो। समझाएँगे, सांत्वना देंगे। उनसे कहना कि तुम दुख के कारण नहीं रो रहे हो। क्योंकि परमात्मा का विरह भी बड़ा आनंदपूर्ण है। धन्यभागी हैं वे जो उसके विरह में जलते हैं। क्योंकि उन्हीं का मिलन भी होगा। उसकी याद में बितायी गयी घड़ियाँ कीमती घड़ियाँ हैं। उसके इंतजार में बिताये पल बहुमूल्य हैं।

कट तो गयी है हिज की रात
कैसे कटी यह और है बात
 यूँ आए वे रात ढले
जैसे जल में ज्योत जले
आँख जिन्हें टपका न सकी
सहरों में वे अश्क ढले

विरह की रात भी कट जाती है। कैसे कटी, कहना मुश्किल है। शब्दों में नहीं कहा जा सकता। सिर्फ आंसुओ में ही गीत उतरते हैं। और विरह में जो रोया है, जितना रोया है, उतने ही मिलन को करीब बुला लिया है। तुम अगर समग्रभाव से रो सको तो इसी क्षण भी मिलन हो सकता है। परमात्मा दूर नहीं है। सामने ही खड़ा है। मगर आँखें धूल से भरी हैं।

अगर रो सको, तो उससे सुंदर फिर कुछ और नहीं है। वही तुम्हारी उपासना। अगर न रो सको, तो फिर कुछ और उपाय खोजने पड़ेंगे। रोना प्रेम की विधि है। भक्ति की विधि है। अगर रोना न बन सके, तो फिर ध्यान करना होगा। ध्यान भक्तिशून्य विधि है। प्रेमरिक्त विधि है। उसका नंबर दो है स्थान। प्रेम से जो वंचित ही हो गये हैं, इस तरह वंचित हो गये हैं अब उन्हें कुछ उपाय नहीं सूझता, उनके लिए ध्यान विधि है।

लेकिन अभी जिनका हृदय प्रेम से भरा है, उन्हें ध्यान की चिंता छोड़ देनी चाहिए।

मग्न होओ। कोई अवसर न चूको मान होने का। और हजार अवसर आते हैं रोज। अवसर. आते ही रहते हैं, तुम्हें जरा पहचान आ जानी चाहिए। फूल खिला बगिया में, नाचो, गाओ, रोओ। पत्थरों में फूल खिल रहे हैं, चमत्कार हो रहा है! ओस की बूँद सरकने लगी घास की पत्ती पर, और पूरा सूरज उसमें चमक आया, किरणें— किरणें फूट गयीं, इंद्रधनुष रच गया उसके आसपास, नाचो, गाओ, रोओ।

 तलाशोगे तो हर घड़ी कुछ—न—कुछ पा लोगे। प्रकृति परमात्मा से भरी है, लबालब भरी है। सागर के गर्जन को सुनो। उसके गर्जन के साथ आत्मसात हो जाओ। जल्दी ही बादल आते होंगे, बिजलियाँ चमकेगी, आकाश बादलों से भरेगा, तुम भी उन बादलों के साथ आकाश में तैरो, तिरो। जरा संबंध जोड्ने लगो अपना परमात्मा के रहस्य— मय लोक से। यही उसका मंदिर है।

और यहाँ बहुत बार हँसी भी आएगी, रोना भी आएगा। और ऐसी घड़ियाँ भी आएँगी जब आँसू भी बहेंगे और हँसी भी साथ होगी। खिलखिलाहट भी फूटेगी और आँख से आँसू भी झरते होंगे। और जब हँसी और रोना साथ—साथ घटते हैं तो बड़ी रहस्यपूर्ण प्रतीति होती है। बड़ी भाव की दशा आ जाती है।

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