❤ *पुरूष शब्द का अर्थ क्या है?*
पुरूष शब्द का अर्थ ठीक से समझ ले। पुरूष का अर्थ यह मत समझ लेना कि जो नारी नहीं है। इस सुत्र को लिखने वाला होगा कोई पंडित, होगा कोई थोथी, व्यर्थ की बौद्धिक बातों से भरा हुआ आदमी। पुरूष का अर्थ ठीक उस शब्द में छिपा है। पुर का अर्थ होता है: नगर। नागपुर, कानपुर, उदयपुर, जयपुर। पुर का अर्थ होता है नगर। और पुरूष का अर्थ होता है: नगर के भीतर जो बसा है। शरीर है नगर, सच मैं ही नगर है। विज्ञान की दृष्टि में भी नगर है। वैज्ञानिक कहते है: एक शरीर में सात अरब जीवाणु होते है।
अभी तो पूरी पृथ्वी की भी इतनी संख्या नहीं; अभी तो चार अरब को पर कर गई है। लेकिन एक-एक शरीर में सात अरब जीवाणु है। सात अरब जीवित चेतनाओं का यह नगर है। और उसके बीच में तुम बसे हो। मूर्च्छित हो, इसलिए पता नहीं। होश में आ जाओ तो पता चले। तुम देह नहीं हो, मन नहीं हो, भाव नहीं हो।
देह का परकोटा बाहरी परकोटा है तुम्हारे नगर का, जैसे बड़ी दीवार होती है, पुराने नगरों के चारों और—किले की दीवारे। फिर मन का परकोटा है—और एक दीवार।
और फिर भावनाओं का परकोटा सबसे अंतरंग हे—और एक दीवार। और इन तीन दीवारों के पीछे तुम हो चौथे। जिसको जानने वालों ने तुरिया कहा है। तुरीय का अर्थ होता है। चौथा। और जब तुम चौथे को पहचान लोगे; तुरीय को पहचान लोगे, इतने जाग जाओगे कि जान लोगे—न मैं देह हूं, न मैं मन हूं, न मैं ह्रदय हूं। मैं तो केवल चैतन्य हूं। सिर्फ बुद्धत्व हूं—उस क्षण तुम पुरूष हुए।
स्त्री भी पुरूष हो सकती है। और तुम्हारे “तथाकथित” पुरूष भी पुरूष हो सकते है। स्त्री और पुरूष से इसका कुछ लेना देना नहीं है। स्त्री का देह का परकोटा भिन्न है। यह परकोटे की बात है। घर यूं बनाओ या यूं बनाओ। घर का स्थापत्य भिन्न हो सकता है। द्वार-दरवाजे भिन्न हो सकते है। घर के भीतर के रंग-रौनक भिन्न हो सकती है। घर के भीतर की साज-सजावट भिन्न हो सकती है।
मगर घर के भीतर रहने वाला जो मालिक है, वह एक ही है। वह न तो स्त्री है, न पुरूष तुम्हारे अर्थों में। स्त्री और पुरूष दोनों के भीतर जो बसा हुआ चैतन्य है, वही वस्तुत: पुरूष है............😍
❣ _*ओशो*_ ❣
पहला प्रश्न: भगवान, क्या भारतीय संस्कृति विश्व की श्रेष्ठतम संस्कृति नहीं है?
सुरेंद्र कुमार, मनुष्य का अहंकार बहुत से रूप लेता है। अहंकार के खेल बड़े सूक्ष्म हैं। मैं बड़ा हूं, ऐसा सीधा कहना तो मुश्किल है,परोक्ष रूप से ही कहा जा सकता है। मेरा धर्म बड़ा है, मेरा देश बड़ा है, मेरी संस्कृति बड़ी है, इन सबके पीछे घोषणा एक ही है: मैं बड़ा हूं!
और तुम सोचते हो, तुम्हीं सोचते हो कि भारतीय संस्कृति श्रेष्ठतम है? चीनी सोचते हैं चीनी संस्कृति श्रेष्ठतम है। और अमरीकी सोचते हैं कि अमरीकी संस्कृति श्रेष्ठतम है। दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है जो ऐसा ही न सोचता हो।
जरा इस पर विचार करो! हिंदू सोचते हैं उनका ही धर्म श्रेष्ठ; वही मुसलमान सोचता, वही जैन, वही बौद्ध, वही ईसाई, पारसी,यहूदी। जब सभी ऐसा सोचते हैं तो इसका संबंध धर्म से नहीं होगा;इसका संबंध किसी और गहरी चीज से होगा जो सभी के भीतर छिपी है। हम हर बात में किसी न किसी रूप में अपने अहंकार को सिद्ध करना चाहते हैं।
जरूर खूबियां हैं। चीनी संस्कृति की अपनी खूबियां हैं; लाओत्सु दिया दुनिया को, च्वांगत्सु दिया, कनफ्यूशियस दिया। भारतीय संस्कृति की अपनी खूबियां हैं; बुद्ध दिए, महावीर दिए, कृष्ण दिए। अरबी संस्कृति की अपनी खूबियां हैं; मोहम्मद दिए, बायजीद,बहाऊद्दीन, जलालुद्दीन...। सारी दुनिया की संस्कृतियों की अपनी-अपनी खूबियां हैं; लेकिन श्रेष्ठ कौन, यह बात ही गलत, यह विचार ही भ्रांत। और इसके भीतर मूल आकांक्षा एक ही है कि सब तरह से सिद्ध हो जाए कि मैं श्रेष्ठ हूं। और जो भी यह सिद्ध करना चाहता है कि मैं श्रेष्ठ हूं उसे कहीं भीतर डर है कि वह श्रेष्ठ है नहीं। नहीं तो सिद्ध क्यों करना चाहेगा? हीनता की ग्रंथि ही श्रेष्ठता का दावा करती है।
मनस्विदों से पूछो! वे यही कहेंगे, जितना हीन व्यक्ति हो उतना चारों तरफ श्रेष्ठता का शोरगुल मचाता है। इसीलिए राजनीति में सिर्फ हीनता की ग्रंथि से पीड़ित लोग ही उत्सुक होते हैं--निकृष्टतम। क्योंकि भीतर घाव की तरह हीनता काटती है। इसे किसी तरह फूलों से ढांक देना है; सिंहासनों पर विराजमान होकर इसे भुला देना है।
मैंने एक कहानी सुनी है। पेरिस के विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र का जो विभागाध्यक्ष था, जो हेड ऑफ दि डिपार्टमेंट था, उसने एक दिन आकर सुबह-सुबह ही अपनी कक्षा में घोषणा की कि मैं दुनिया का सबसे श्रेष्ठतम व्यक्ति हूं!
विद्यार्थी हंसे। झक्की तो वे उसे मानते ही थे। दर्शनशास्त्र का कोई प्रोफेसर और विश्वविद्यालय में झक्की न माना जाए, ऐसा होता ही नहीं। पहली तो बात, दर्शनशास्त्र में झक्की ही उत्सुक होते हैं, ऐसी धारणा है। फिर कोई साधारण झक्की नहीं होगा, जब विभाग का अध्यक्ष हो गया तो असाधारण झक्की होगा। और आज तो हद हो गई। इतने सीधे-सीधे कोई कहता है? लोग छिपा-छिपा कर कहते हैं! इस आदमी ने सीधे ही आकर घोषणा कर दी कि मैं दुनिया का सबसे श्रेष्ठतम व्यक्ति हूं। विद्यार्थी तो सकते में आ गए। लेकिन एक विद्यार्थी ने हिम्मत खड़े होने की की और पूछा कि आप दर्शनशास्त्र के अध्यापक हैं, आप तो जो भी कहते हैं उसके पीछे जरूर कोई तर्क होगा। आपकी इस घोषणा के पीछे क्या तर्क प्रक्रिया है?समझाएं।
तो उस प्रोफेसर ने कहा, मुझे पता था कोई न कोई पूछेगा कि इसके पीछे तर्क की प्रक्रिया क्या है। तो मैं सारी तैयारी करके आया हूं। उसने अपने झोले से दुनिया का नक्शा निकाला, बोर्ड पर टांगा, और कहा, यह दुनिया का नक्शा है। मैं तुमसे पूछता हूं कि दुनिया में सबसे श्रेष्ठ देश कौन सा है?
स्वभावतः सभी फ्रेंच थे; उन्होंने कहा, फ्रांस! इसमें क्या पूछने की बात है? यह तो स्वतः सिद्ध है।
तो उस प्रोफेसर ने कहा, तो बाकी दुनिया छोड़ दें। फ्रांस सबसे श्रेष्ठ देश है, यह सिद्ध हुआ। तुम सब राजी होते हो, हाथ उठा दो। अब इतना ही मुझे सिद्ध करना है कि मैं फ्रांस में सर्वश्रेष्ठ हूं, तो दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हो जाऊंगा। और मैं तुमसे यह पूछता हूं कि फ्रांस में सर्वश्रेष्ठ नगर कौन सा है?
तब जरा विद्यार्थी समझे कि अब मामला गड़बड़ हुआ जा रहा है। स्वभावतः वे सभी पेरिस के निवासी थे, उन्होंने कहा, पेरिस। तो प्रोफेसर ने कहा, अब फ्रांस को भी छोड़ दो, अब रहा पेरिस, अब पेरिस में ही निपटारा करना है। और पेरिस में सर्वाधिक श्रेष्ठतम संस्था कौन सी है?
निश्चित ही विश्वविद्यालय! विद्यापीठ! सरस्वती का मंदिर!
और उसने पूछा कि विश्वविद्यालय में सर्वश्रेष्ठ विषय कौन सा है?
दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी थे तो सभी ने कहा, दर्शनशास्त्र। तो उसने कहा, अब भी कुछ बाकी बचा है सिद्ध करने को? मैं दर्शनशास्त्र का प्रधान अध्यापक हूं। मैं दुनिया का श्रेष्ठतम व्यक्ति हूं।
ऐसे ही तर्क...मेरा शास्त्र श्रेष्ठ! मेरा सिद्धांत श्रेष्ठ! मेरी जाति श्रेष्ठ! मेरा वर्ण श्रेष्ठ! लेकिन सीधी-सीधी बात क्यों नहीं कहते? सीधी कहो तो अच्छा। बीमारी साफ हो तो इलाज हो सके। बीमारी जब छुप-छुप कर आती है तो इलाज करना मुश्किल हो जाता है। बीमारी जब नयी-नयी शक्लें लेकर आती है तो इलाज करना मुश्किल हो जाता है, निदान ही मुश्किल हो जाता है। इसीलिए सदियां हो गईं और निदान नहीं हो पा रहा है। अगर तुम कहो कि मैं दुनिया का सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति हूं, तो पहले तो तुम भी डरोगे, छाती कंपेगी, यह कहें कैसे? और सारे लोग संदेह उठाएंगे। लेकिन तुम कहते हो, भारतीय संस्कृति सर्वश्रेष्ठ! अब जिनके बीच तुम कह रहे हो वे भी भारतीय हैं; वे सब तुम्हारे साथ सिर में सिर हिलाएंगे,कहेंगे कि बिलकुल ठीक, सत्य ही कहते हैं आप, सत्य वचन महाराज! क्योंकि उनका अहंकार भी इसी में सिद्ध हो रहा है जिसमें तुम्हारा। फिर हिंदुओं के बीच कहो कि हिंदू श्रेष्ठ,स्वभावतः! और फिर ब्राह्मणों के बीच कहो कि ब्राह्मण श्रेष्ठ, तो कोई संदेह भी नहीं उठाएगा। मगर इस तरह छिपे रास्तों से, पीछे के रास्तों से कौन आ रहा है तुम्हारे जीवन में? सिर्फ एक अहंकार।
खूबियां हैं संस्कृतियों की, सो सभी संस्कृतियों की खूबियां हैं। और खूबियां हैं धर्मों की, सो सभी धर्मों की खूबियां हैं। अगर वेद सुंदर हैं तो कुरान का भी कोई मुकाबला नहीं। और अगर कुरान सुंदर है तो बाइबिल अनूठी है। अद्वितीय हैं ये सारे स्रोत। मगर इनकी तुलना मत करना; न तो कुरान वेद से श्रेष्ठ है, न वेद बाइबिल से श्रेष्ठ है, न बाइबिल धम्मपद से श्रेष्ठ है। ये सब इतनी अनूठी चीजें हैं कि इनकी तुलना नहीं हो सकती। गुलाब की गेंदे से तुलना कैसे करोगे? और चंपा की चमेली से तुलना कैसे करोगे? चंपा चंपा है,चमेली चमेली है। चमेली की अपनी गंध है, चंपा की अपनी गंध है। और फिर चंपा को प्रेम करने वाले लोग हैं और चमेली को प्रेम करने वाले लोग भी हैं। फिर अपनी-अपनी पसंद है।
कुरान में जो तरन्नुम है, कुरान में जो गीत है, वह दुनिया के किसी शास्त्र में नहीं। उपनिषदों में जो साफ अभिव्यक्ति है, जो सुस्पष्ट अभिव्यक्ति है, दो और दो चार जैसी, ऐसी दुनिया के किसी शास्त्र में नहीं। और बाइबिल की भाषा में जैसी पृथ्वी की सुगंध है, जैसा ग्राम्य ताजापन, वैसा दुनिया के किसी शास्त्र में नहीं। बुद्ध के वचनों में जैसी शांति है, जैसा अपूर्व संगीत है शांति का, शून्य का, वैसा और कहां मिलेगा! लेकिन ये सब अनूठे हैं, इनको तौलो मत। तौलने की दृष्टि भ्रांत है। ये कोई तराजू पर रख कर तौले जाने वाली चीजें नहीं हैं। यह काम तो तुम पागलों पर छोड़ दो।
मगर यह जमीन पागलों से भरी है और इसलिए इस तरह की बातें चलती हैं।
मैंने सुना, एक बार दो अफीमची मिले। पहला अफीमची बोला, मेरे दादा का मकान इतना ऊंचा था कि एक बार एक बच्चा ऊपर से गिरा तो जमीन तक आते-आते आदमी बन गया। दूसरा भला क्यों चुप रहता! उसने कुछ कम पी थी! खिलखिला कर हंसा और बोला कि छोड़ो जी छोड़ो! मेरे दादा के मकान से तो एक बार एक बंदर गिरा था जो जमीन तक पहुंचते-पहुंचते आदमी बन गया था।
अफीमची माफ किए जा सकते हैं। मगर यही दशा तो उनकी है जिनको तुम समझदार कहते हो--पंडित-पुरोहित, तुम्हारे महात्मा। ये सब अफीमची हैं। जरूर इन्होंने कोई सूक्ष्म अफीम पी रखी है--अहंकार की। और अहंकार से बड़ी अफीम क्या है?
जागो! इस तरह की व्यर्थ की बातों से अपने को मुक्त करो।
उत्सव आमार जाति आनंद आमार गोत्र-प्रवचन-08
#जापान में कोई दो सौ वर्ष पहले एक बहुत अद्भुत संन्यासी हुआ। उस संन्यासी की एक ही शिक्षा थी कि जागो! नींद छोड़ दो। उस संन्यासी की खबर जापान के सम्राट को मिली। सम्राट जवान था, अभी नया नया राजगद्दी पर बैठा था। उसने उस फकीर को बुलाया। और उस फकीर से प्रार्थना की, मैं भी जागना चाहता हूं। क्या मुझे जागना सिखा सकते है?
उस फकीर ने कहा, सिखा सकता हूं,लेकिन राजमहल में नहीं, मेरे झोपड़े पर आ जाना पड़ेगा! और कितने दिन में सीख पाएंगे, इसका कोई निश्चय नहीं है । यह एक-एक आदमी की तीव्रता पर निर्भर करता है; एक-एक आदमी के असंतोष पर निर्भर करता है कि वह कितना प्यासा है कि सीख सके । तुम्हारी प्यास कितनी है; तुम्हारी अतृप्ति कितनी है; तुम्हारी डिसकटेंट कितना है; तो तुम सीख सकते हो । और उस मात्रा में निर्भर होगा कि तुम कितने जल्दी सीख सकते हो । वर्ष लग सकते हैं, दो वर्ष लग सकते हैं, दस वर्ष लग सकते हैं । और मेरी शर्त है कि बीच से कभी आने नहीं दूंगा; अगर सीखना हो तो पूरी तैयारी करके आना । और साथ में यह भी बता दूं कि मेरे रास्ते अपने ढ़ंग के हैं । तुम यह मत कहना कि यह मुझसे क्या करवा रहे हो, यह क्या सिखा रहे हो! मेरे ढ़ंग हैं सिखाने के ।
राजकुमार राजी हो गया और उस फकीर के आश्रम पहुंच गया। दूसरे दिन सुबह उठते ही उस फकीर ने कहा कि आज से तुम्हारा पहला पाठ शुरू होता है । और पहला पाठ यह है कि में दिन में किसी भी समय तुम्हारे ऊपर लकड़ी की नकली तलवार से हमला करूंगा । तुम किताब पढ़ रहे हो, मैं पीछे से आकर नकली तलवार से तुम्हारे ऊपर हमला कर दूंगा । तुम बुहारी लगा रहे हो, मैं पीछे से आकर हमला कर दूंगा । तुम खाना खा रहे हो, मैं हमला कर दूंगा । दिन भर होश से रहना! किसी भी वक्त हमला हो सकता है । सावधान रहना! अलर्ट रहना! किसी भी वक्त मेरी तलवार-लकड़ी की तलवार -- तुम्हें चोट पहुंचा सकती है।
उस राजकुमार ने कहा कि मुझे तो जागरण की शिक्षा के लिए बुलाया गया था,और यह क्या करवाया जा रहा है ?
मैं कोई तलवारबाजी सीखने नहीं आया हूं,लेकिन गुरु ने पहले ही कह दिया था कि इस मामले में तुम कुछ पूछताछ नहीं कर सकोगे । मजबूरी थी । शिक्षा शुरू हो गई, पाठ शुरू हो गया । आठ दिन में ही उस राजकुमार की हड्डी-पसली सब दर्द देने लगी,हाथ-पैर सब दुखने लगे । जगह-जगह से चोट! किताब पढ़ रहे हैं,हमला हो जाए । रास्ते पर घूमने निकला है, हमला हो जाएगा । दिन में दस पच्चीस बार कहीं से भी हमला हो जाएगा ।
लेकिन आठ दिन में ही उसे पता चला कि धीरे-धीरे एक नये प्रकार का होश, एक जागृति उसके भीतर पैदा हो रही है । वह पूरे वक्त अलर्ट रहने लगा, सावधान रहने लगा । कभी भी हमला हो सकता है! किताब पढ़ रहा है, तो भी उसके चित्त का एक कोना जागा हुआ है कि कहीं हमला न हो जाएं! तीन महीने पूरे होते-होते, किसी भी तरह का हमला हो, वह रक्षा करने में समर्थ हो गया । उनकी ढाल ऊपर उठ जाती । पीछे से भी गुरु आए,तो भी ढाल पीछे उठ जाती और हमला सम्हल जाता । तीन महीने बाद उसे चोट पहुंचाना मुश्किल हो गया । कितने ही अनअवेयर, कितना ही अनजान हमला हो, वह रक्षा करने लगा । चित्त राजी हो गया, चित्त सजग हो गया ।
उसके गुरु ने कहा कि पहला पाठ पूरा हो गया; कल से दूसरा पाठ शुरू होगा । दूसरा पाठ यह है कि अब तक जागते में मैं हमला करता था, कल से नींद में भी हमला होगा, सम्हल कर सोना! उस राजकुमार ने कहा, गजब करते हैं आप! कमाल करते हैं! जागने तक गनीमत थी, मैं होश में था, किसी तरह बचा लेता था । लेकिन नींद में तो बेहोश रहूंगा!
उसके गुरु ने कहा, घबड़ाओं मत; मुसीबत नींद में भी होश को पैदा कर देती है । संकट, क्राइसिस नींद में भी सावधानी को जन्म दे देती है । उस बूढ़े ने कहा,फिकर मत करो । तुम फिकर छोड़ो । तुम तो नींद में भी होश रखने की कोशिश करना । और लकड़ी की तलवार से नींद में हमले शुरू हो गए । रात में आठ-दस दफा कभी भी चोट पड़ जाती है । एक दिन, दो दिन,आठ-दस दिन बीतते फिर हड्डी-पसली दर्द करने लगी।
लेकिन तीन महीने पूरे होते-होते राजकुमार ने पाया कि वह बूढ़ा ठीक कहता है । नींद में भी होश जागने लगा ।
सोया रहता, और भीतर कोई जागता भी रहता और स्मरण रखता कि हमला हो सकता है! हाथ रात में, नींद में भी ढाल को पकड़े रहता । तीन महीने पूरे होते-होते गुरु का आगमन, उसके कदम की धीमी सी अवाज भी उसे चौंका देती और वह ढाल से रक्षा कर लेता । तीन महीने पूरे होने पर नींद में भी हमला करना मुश्किल हो गया । अब वह बहुत प्रसन्न था । एक नय तरह की ताजगी उसे अनुभव हो रही थी । नींद में भी होश था । और कुछ नये अनुभव उसे हुए । पहले तीन महीने में,जब वह दिन में भी जागने की कोशिश करता था, तो
जितना-जितना जागना बढ़ता गया, उसने-उतने विचार कम होते गए । विचार नींद का हिस्सा है । जितना सोया हुआ आदमी, उतने ज्यादा विचार उसके भीतर चक्कर काटने हैं । जितना जागा हुआ आदमी, उतना भीतर साइलेंस और मौन आना शुरू हो जाता है, विचार बंद हो जाते हैं ।
पहला तीन महीने में उसे स्पस्ट दिखाई पड़ा था कि
धीरे-धीरे विचार कम होते गए, कम होते गए,
फिर धीरे-धीरे विचार समाप्त हो गए । सिर्फ सावधानी रह गई, होश रह गया,अवेयरनेस रह गई । ये दोनों चीजें एक साथ कभी नहीं रह सकती; या तो विचार रहता है, या होश रहता है। विचार आया कि होश गया । जैसे बादल घिर जाएं आकाश में तो सूरज ढंक जाता है, बादल हट जाएं तो सूरज प्रकट हो जाता है । विचार मनुष्य के मन के बादलों की तरह घेरे हुए हैं । विचार घेर लेते हैं, होश दब जाता है । विचार हट जाते हैं,होश प्रकट हो जाता है ।
जैसे बादल को फोड़ कर सूरज दिखाई पड़ने लगता है । पहले तीन महीने में उसे अनुभव हुआ था कि विचार क्षीण हो गए, कम हो गए । दूसरे तीन महीने में एक और नया अनुभव हुआ... रात में जैसे-जैसे होश बढ़ता गया,
वैसे-वैसे सपने ड्रीम्स कम होते गए । जब तीन महीने पूरे होते-होते जागरण रात में भी बना रहने लगा, तो सपने बिल्कुल विलीन हो गए, नींद स्वप्नशून्य हो गई । दिन विचार शून्य हो जाए,रात स्वप्नशून्य हो जाए,तो चेतना जागी ।
तीन महीने पूरे होने पर उसके बूढ़े गुरु ने कहा,दूसरा पाठ पूरा हो गया । उस राजकुमार ने कहा, तीसरा पाठ क्या हो सकता है ? जागने का पाठ भी पूरा हो गया, नींद का पाठ भी पूरा हो गया । उसके गुरु ने कहा, अब असली पाठ शुरू होगा । कल से मैं असली तलवार से हमला शुरू करूंगा । अब तक लकड़ी की तलवार थी । उस राजकुमार ने कहा, आप क्या कह रहे हैं ? लकड़ी की तलवार तक गनीमत थी, चूक भी जाता था तो भी कोई खतरा नहीं था, असली तलवार!
गुरु ने कहा कि जितना चैलेंज, जितनी चुनौती चेतना के लिए खड़ी की जाए, चेतना उतनी ही जागती है । जितनी चुनौती हो चेतना के लिए, चेतना उतनी सजग होती है ।
तुम घबराओ मत । असली तलवार तुम्हें और गहराईयों तक जगा देगी ।
और दूसरे दिन सुबह से असली तलवार से हमला शुरू हो गया। सोच सकते हैं आप, असली तलवार का ख्याल ही उसकी सारी चेतना की निद्रा को तोड़ दिया होगा । भीतर तक, प्राणों के अंतस तक वह तलवार का स्मरण व्याप्त हो गया । तीन महीने गुरु एक भी चोट नहीं पहुंचा सका असली तलवार से । लकड़ी की तलवार की उतनी चुनौती न थी । असली तलवार की चुनौती अंतिम थी । एक बार चूक जाए तो जीवन समाप्त हो जाए ।
तीन महीने में एक भी चोट नहीं पहुंचाई जा सकी ।
और तीन महीने में उसे इतनी शांति, इतने आनंद, इतने प्रकाश का अनुभव हुआ उस युवक राजकुमार को कि उसका जीवन एक नये नृत्य में, एक नये लोक में प्रवेश करने लगा । आखिरी दिन आ गया तीसरे पाठ का, और गुरु ने कहा कि कल तुम्हारी विदा जाएगी तुम उत्तीर्ण हो गए । क्या तुम नहीं जाग गए ? उस युवक ने गुरू के चरणों में सिर रख दिया । उसने कहा, मैं जाग गया हूं ।
और अब मुझे पता चला कि मैं कितना सोया हुआ था!
जो आदमी जीवन भर बीमार रहा हो, वह धीरे-धीरे भूल ही जाता है कि मैं बीमार हूं । जब वह स्वस्थ होता है तभी पता चलता है कि मैं कितना बीमार था । जो आदमी जीवन भर सोया रहा है ... और हम सब सोए रहे हैं;
हमे पता भी नहीं चलता कि ओह! यह सारा जीवन एक नींद थी।
श्री अरविंद ने कहा है, जब सोया हुआ था तो जिसे मैंने प्रेम समझा था, जाग कर मैंने पाया वह असत्य था, वह प्रेम नहीं था। जब मैं सोया हुआ था तो जिसे मैंने प्रकाश सथा, जाग कर पाया कि वह अंधकार से भी बदतर अंधकार था, वह प्रकाश था ही नहीं । जब मैं सोया हुआ था तो जिसे मैंने जीवन समझना था, जाग कर मैंने पाया वह तो मृत्यु थी, जीवन तो यह है ।
उस राजकुमार ने चरणों में सिर रख दिया और कहा कि अब मैं जान रहा हूं कि जीवन क्या है । कल क्या मेरी शिक्षा पूरी हो जाएगी ?
गुरु ने कहा, कल सुबह मैं तुम्हें विदा कर दूंगा ।
सांझ की बात है, गुरू बैठ कर पढ़ रहा है एक वृक्ष के नीचे किताब । और कोई तीन सौ फीट दूर वह युवक बैठा हुआ है । कल सुबह वह विदा हो जाएगा । इस छोटी सी कुटी में, इस बूढ़े के पास, उसने जीवन की संपदा पा ली है । तभी उस अचानक ख्याल आया यह बूढ़ा नौ महीने से मेरे पीछे पड़ा हुआ है: जागने-जगाने, जागना-जागना, सावधान-सावधान यह बूढ़ा भी इतना सावधान है या नहीं ? आज मैं भी इस पर उठ कर हमला करके क्यों न देखूं! कल तो मुझे विदा हो जाना है। मैं भी तलवार ऊठाऊं इस बूढ़े पर, हमला करके पीछे से देखूं, यह खुद भी सावधान है या नहीं ?
उसने इतना सोचा ही था कि वह बूढ़ा वहां दूर से चिल्लाया कि नहीं-नहीं, ऐसा मत करना। मैं बूढ़ा आदमी हूं, भूल कर भी ऐसा मत करना । वह युवक तो अवाक रह गया! उसने सिर्फ सोचा था । उसने कहा, मैंने लेकिन अभी कुछ किया नहीं, सिर्फ सोचा है । उस बूढ़े ने कहा, तू थोड़े दिन और ठहर । जब मन बिल्कुल शांत हो जाता है, तो दूसरे के विचारों की पग ध्वनि भी सुनाई पड़ने लगती है। जब मन बिल्कुल मौन हो जाता है, तो दूसरे के मन में चलते हुए विचारों का दर्शन भी शुरू हो जाता है।
जब कोई बिल्कुल शांत हो जाता है, तब सारे जगत में, सारे जीवन में चलते हुए स्पंदन भी उसे अनुभव होने लगते हैं । इतनी ही शांति में प्रभु चेतना का अनुभव अवतरित होता है । वह राजकुमार दूसरे दिन विदा हो गया होगा । एक अनूठा अनुभव लेकर वह उस आश्रम से वापस लौटा...osho
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✍बोधकथा-25✍
❤🙏ओशो🙏❤
मैं एक सभा में गया था। अछूतों की सभा थी। अछूत की कल्पना ही मेरे हृदय को आंसुओं से भर देती है। वहां पहुंच कर भी मैं बहुत दुखी और उदास था। मनुष्य ने मनुष्य के साथ यह क्या किया है? मनुष्य-मनुष्य के बीच अलंघ्य दीवारें खड़ी करने वाले लोग भी धार्मिक समझे जाते हैं! धर्म का इससे अधिक पतन और क्या हो सकता है? यदि यही धर्म है तो फिर अधर्म क्या है? ऐसा प्रतीत होता है कि अधर्म के अड्डों ने धर्म की पताकाएं चुरा ली हैं और शैतान के शास्त्र परमात्मा के शास्त्र बने हुए हैं।
धर्म भेद नहीं, अभेद है। धर्म द्वैत नहीं, अद्वैत है। धर्म तो दीवारें बनाने में नहीं, मिटाने में है। लेकिन तथाकथित धर्म भेद ही उपजाते रहे हैं और दीवारें ही बनाते रहे हैं। उनकी शक्ति मनुष्य को तोड़ने और विभाजित करने में ही सक्रिय रही है। निश्चय ही यह अकारण नहीं हुआ है। असल में मनुष्य को मनुष्य से अलग किए बिना न तो संगठन बन सकते हैं, और न शोषण ही हो सकता है। यदि मनुष्यता समान है और एक है, तो शोषण के मूलाधार ही नष्ट हो जाते हैं।
शोषण के लिए तो असमानता अनिवार्य है, वर्ग और वर्ण आवश्यक हैं। इसीलिए, धर्म अनेक रूपों में असमानता के, वर्गों और वर्णों के समर्थक रहे हैं। वर्ग-वर्णहीन समाज तो अनायास ही शोषण-विरोधी हो जाता है। मनुष्यता की समानता को स्वीकार करना शोषण को अस्वीकार करना है।
फिर मनुष्य-मनुष्य में भेद डाले बिना संगठन और संप्रदाय भी नहीं बन सकते हैं। भेद से भय आता है, द्वेष और घृणा आती है, और अंततः शत्रुता पैदा होती है। शत्रुता से संगठन जन्मते हैं। संगठन मित्रता से नहीं, शत्रुता से जन्मते हैं। प्रेम नहीं, घृणा ही उनकी आधारशिला है। शत्रुता के भय से संगठन पैदा होते हैं। संगठन शक्ति देते हैं। शक्ति शोषण का सामर्थ्य बनती है और अधिकार-लिप्सा की तृप्ति भी। वही फैल कर साम्राज्य-लिप्सा भी बन जाती है। धर्म ऐसे ही छिपे-छिपे राजनीति बन जाते हैं। धर्म आगे चलता है, राजनीति पीछे चलती है। धर्म आवरण ही रह जाता है और राजनीति प्राण बन जाती है। वस्तुतः जहां संगठन हैं, संप्रदाय हैं, वहां धर्म नहीं है, बस राजनीति ही है। धर्म तो साधना है। वह संगठन नहीं है। अनेक धर्म-संगठनों के नाम से भिन्न-भिन्न राजनीतियां ही अपनी चालें चलती रहती हैं। संगठन के अभाव में धर्म तो हो सकता है, लेकिन धर्म नहीं हो सकते हैं, और न ही हो सकते हैं पुजारी और पुरोहित और उनका व्यवसाय। परमात्मा को भी व्यवसाय बना लिया गया है। उसके साथ भी न्यस्तस्वार्थ संबंधित हो गए हैं। इससे ज्यादा अशोभन और अधार्मिक क्या हो सकता है? लेकिन प्रचार की महिमा अपार है और सतत प्रचार से निकट असत्य भी सत्य बन जाते हैं। फिर जो पुजारी, पुरोहित स्वयं शोषण में हैं, वे यदि शोषण-व्यवस्था के समर्थक हों तो आश्चर्य ही क्या है? धर्मों ने समाज की शोषण-व्यवस्था के लिए भी सुदृढ़ स्तंभों का काम किया है। काल्पनिक सिद्धांतों का जाल बुन कर उन्होंने शोषकों को पुण्यात्मा और शोषितों को पापी सिद्ध किया है। शोषितों को समझाया गया है कि यह उनके दुष्कर्मों का फल है। सच ही धर्मों ने लोगों को खूब अफीम खिलाई है।
एक अछूत वृद्ध ने सभा के अंत में मुझसे पूछा थाः ‘‘क्या मैं मंदिरों में आ सकता हूं? ’’ मैंने कहाः ‘‘मंदिरों में? लेकिन किसलिए? परमात्मा तो स्वयं ही पुरोहितों के मंदिरों में कभी नहीं जाता है।’’
प्रकृति के अतिरिक्त परमात्मा का और कोई मंदिर नहीं है। शेष सब मंदिर और मस्जिद पुरोहितों की ईजाद हैं। परमात्मा से उन मंदिरों का दूर का भी संबंध नहीं। परमात्मा और पुरोहितों में कभी बोल-चाल ही नहीं रहा। मंदिर पुरोहितों की, और पुरोहित शैतान की सृष्टि हैं। वे शैतान के शिष्य हैं। इस कारण ही उनके शास्त्र और संप्रदाय मनुष्य को मनुष्य से लडाने के केंद्र रहे हैं। उन्होंने बातें तो प्रेम की की हैं, और जहर घृणा का फैलाया है। असल में जहर शक्कर-चढ़ी गोलियों में देना ही आसान होता है। फिर भी मनुष्य पुरोहितों से सावधान नहीं है। जब भी उसे परमात्मा का स्मरण आता है, वह पुरोहितों के चक्कर में पड़ जाता है। मनुष्य के परमात्मा से संबंध क्षीण होने का आधारभूत कारण यही है। पुरोहित सदा से ही परमात्मा की हत्या करने में संलग्न रहे हैं। उनके अतिरिक्त परमात्मा का हत्यारा और कोई भी नहीं है। परमात्मा को चुनना है तो पुजारी को नहीं चुना जा सकता है। उन दोनों की पूजा एक ही साथ नहीं की जा सकती। पुजारी जैसे ही मंदिर में प्रवेश करता है, वैसे ही परमात्मा मंदिर से बाहर हो जाता है। परमात्मा से नाता जोड़ने के लिए पुरोहित से मुक्त होना आवश्यक है। भक्त और भगवान के बीच वही बाधा है। प्रेम किसी को भी बीच में पसंद नहीं करता है।
एक भोर की बात है। अभी अंधेरा ही था। जैसे ही मंदिर के द्वार खुले कि एक अछूत मंदिर की सीढ़ियां चढ़ कर द्वार पर पहुंच गया। वह द्वार के भीतर पैर रखने को ही था कि पुजारी क्रोध से गरजाः ‘‘रुक, रुक, पामर! एक पग भी आगे बढ़ाया तो तेरा सर्वनाश हो जाएगा। मूढ़! परमात्मा के मंदिर की पवित्र सीढ़ियां तूने अपवित्र कर दी हैं।’’ सहमे हुए अछूत ने उठा हुआ पैर वापस ले लिया। उसकी आंखों में आंसू आ गए। परमात्मा के लिए उसके प्यासे हृदय में जैसे किसी ने छुरी भोंक दी थी। वह रोता हुआ बोलाः ‘‘हे परमात्मा, मेरा ऐसा कौन सा पाप है, जिसके कारण तेरे दर्शन मुझे नहीं हो सकते हैं? ’’ परमात्मा की ओर से पुजारी ने कहाः ‘‘तू जन्म से अशुद्ध है, पाप-भंडार है।’’ उस अछूत ने प्रार्थना कीः ‘‘फिर मैं शुद्धि के लिए साधना करूंगा, लेकिन प्रभु-दर्शन के बिना नहीं मरना चाहता हूं।’’ और फिर वर्षों तक उस अछूत का कोई पता न चला। वह न मालूम कहां चला गया था। लोग उसे भूल ही गए थे और तब अचानक एक दिन वह गांव में आया। गांव के प्रवेश-द्वार पर ही वह देवालय था। पुजारी ने उसे देवालय के पास से जाते देखा। एक अपूर्व तेज उसके चेहरे पर था। एक अपूर्व शांति उसकी आंखों में थी। उसके आसपास भी जैसे प्रकाश का एक मंडल था। लेकिन उसने देवालय की ओर आंख भी उठा कर नहीं देखा। वह उस ओर से बिल्कुल निरपेक्ष और असंग दीख रहा था। लेकिन पुजारी से न रहा गया। उसने उसे पुकारा और पूछाः ‘‘क्यों रे! क्या शुद्धि की साधना पूरी कर ली? ’’ वह अछूत इस पर हंसा और उसने स्वीकृति में सिर हिलाया। पुजारी ने पूछाः ‘‘फिर मंदिर में क्यों नहीं आता? ’’ वह अछूत बोलाः ‘‘महाराज, क्या करूं आकर? प्रभु ने दर्शन दिए तो कहाः मेरी खोज में मंदिर क्यों गया था? वहां कुछ भी नहीं है। मैं तो स्वयं ही कभी उन मंदिरों में नहीं गया हूं। और जाऊं भी तो क्या पुजारी मुझे वहां घुसने दे सकते हैं? ’’—ओशो
तंत्र सूत्र
काम संबंधि पहला सूत्र:
‘’काम-आलिंगन में आरंभ में उसकी आरंभिक अग्नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो।‘’
कई कारणों से काम कृत्य गहन परितृप्ति बन सकता है और वह तुम्हें तुम्हारी अखंडता पर, स्वभाविक और प्रामाणिक जीवन पर वापस पहुंचा सकता है। उन कारणों को समझना होगा।
एक कारण यह है कि काम कृत्य समग्र कृत्य है। इसमें तुम अपने मन से बिलकुल अलग हो जाते हो। छूट जाते हो। यही कारण है कि कामवासना से इतना डर लगता है। तुम्हारा तादात्म्य मन के साथ है और काम अ-मन का कृत्य है। उस कृत्य में उतरते ही तुम बुद्धि-विहीन हो जाते हो। उसमे बुद्धि काम नहीं करती। उसमे तर्क की जगह नहीं है। कोई मानसिक प्रक्रिया नहीं है। और अगर मानसिक प्रक्रिया चलती है तो काम कृत्य सच्चा और प्रामाणिक नहीं हो सकता। तब आर्गाज्म संभव नहीं है। गहन परितृप्ति संभव नहीं है। तब काम-कृत्य उथला हो जाता है। मानसिक कृत्य हो जाता है। ऐसा ही हो गया है।
सारी दुनिया में कामवासना की इतनी दौड़ है, काम की इतनी खोज है, उसका कारण यह नहीं है कि दुनिया ज्यादा कामुक हो गई है। उसका कारण इतना ही हे कि तुम काम-कृत्य को उसकी समग्रता में नहीं भोग पाते हो। इसीलिए कामवासना की इतनी दौड़ है। यह दौड़ बताती है कि सच्चा काम खो गया है। और उसकी जगह नकली काम हावी हो गया है। सारा आधुनिक चित कामुक हो गया है। क्योंकि काम कृत्य ही खो गया है। काम कृत्य भी मानसिक कृत्य बन गया है। काम मन में चलता रहता है और तुम उसके संबंध में सोचते रहते हो।
मेरे पास अनेक लोग आते है और कहते है कि हम काम के संबंध में सोच-विचार करते है, पढ़ते है, चित्र देखते है। अश्लील चित्र देखते है। वही उनका कामानंद है, सेक्स का शिखर अनुभव है। लेकिन जब काम का असली क्षण आता है तो उन्हें अचानक पता चलता है कि उसमे उनकी रूचि नहीं है। यहां तक कि वे उसमे अपने को नापुंसग अनुभव करते है। सोच-विचार के क्षण में ही उन्हें काम उर्जा का एहसास होता है। लेकिन जब वे कृत्य में उतरना चाहते है तो उन्हें पता चलता है कि उसके लिए उनके पास ऊर्जा नहीं है। तब उन्हें कामवासना का भी पता नहीं चलता है। उन्हें लगता है कि उनका शरीर मुर्दा हो गया है।
उन्हें क्या हो गया है?यही हो रहा है कि उनका काम-कृत्य भी मानसिक हो गया है। वे इसके बारे में सिर्फ सोच विचार कर सकते है। वे कुछ कर नहीं सकते। क्योंकि कृत्य में तो पूरे का पूरा जाना पड़ता है। और जब भी पूरे होकर कृत्य में संलग्न होने की बात उठती है। मन बेचैन हो जाता है। क्योंकि तब मन मालिक नहीं रह सकता, तब मन नियंत्रण नहीं कर सकता।
तंत्र काम-कृत्य को, संभोग को तुम्हें अखंड बनाने के लिए उपयोग में लाता है। लेकिन तब तुम्हें इसमे बहुत ध्यानपूर्वक उतरना होगा। तब तुम्हें काम के संबंध में वह सब भूल जाना होगा जो तुमने सुना है, पढ़ा है, जो समाज ने, संगठित धर्मों ने, धर्म गुरूओं ने तुम्हें सिखाया है। सब कुछ भूल जाओ। दिया है। और समग्रता से इसमे उतरो। भूल जाओ कि नियंत्रण करना है। नियंत्रण ही बाधा है। उचित है कि तुम उस पर नियंत्रण करने की बजाय अपने को उसके हाथों में छोड़ दो। तुम ही उसके बस में हो जाओ। संभोग में पागल की तरह जाओ। अ-मन की अवस्था पागलपन जैसी मालूम पड़ती है। शरीर ही बन जाओ। पशु ही बन जाओ। क्योंकि पशु पूर्ण है।
जैसा आधुनिक मनुष्य है। उसे पूर्ण बनाने की सबसे सरल संभावना केवल काम में है। सेक्स में है, क्योंकि काम तुम्हारे भीतर गहन जैविक केंद्र है। तुम उससे ही उत्पन्न हुए हो। तुम्हारी प्रत्येक कोशिका काम-कोशिका है। तुम्हारा समस्त शरीर काम-उर्जा की घटना है।
यह पहला सूत्र कहता है: ‘’काम-आलिंगन के आरंभ में उसकी आरंभिक अग्नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो।‘’
इसी में सारा फर्क है, सारा भेद है। तुम्हारे काम-कृत्य, संभोग महज राहत का, अपने को तनाव-मुक्त करने का उपाय है। इसलिए जब तुम संभोग में उतरते हो तो तुम्हें बहुत जल्दी रहती है। तुम किसी तरह छुटकारा चाहते हो। छुटकारा यह कि जो ऊर्जा का अतिरेक तुम्हें पीडित किए है वि निकल जाए और तुम चैन अनुभव करो। लेकिन यह चैन एक तरह की दुर्बलता है। ऊर्जा की अधिकता तनाव पैदा करती है। उतैजना पैदा करती है। और तुम्हें लगता है कि उसे फेंकना जरूरी है। जब वह ऊर्जा बह जाती है तो तुम कमजोरी अनुभव करते हो। और तुम उसी कमजोरी को विश्राम मान लेते हो। क्योंकि ऊर्जा की बाढ़ समाप्त हो गई उतैजना जाती रही, इसलिए तुम्हें विश्राम मालूम पड़ता है।
लेकिन यह विश्राम नकारात्मक विश्राम है। अगर सिर्फ ऊर्जा को बाहर फेंककर तुम विश्राम प्राप्त करते हो तो यह विश्राम बहुत महंगा है। और तो भी यह सिर्फ शारीरिक विश्राम होगा। वह गहरा नहीं होगा। वह आध्यात्मिक नहीं होगा।
यह पहला सूत्र कहता है कि जल्द बाजी मत करो और अंत के लिए उतावले मत बनो, आरंभ में बने रहो। काम-कृत्य के दो भाग है: आरंभ और अंत। तुम आरंभ के साथ रहो। आरंभ का भाग ज्यादा विश्राम पूर्ण है। ज्यादा उष्ण है। लेकिन अंत पर पहुंचने की जल्दी मत करो। अंत को बिलकुल भूल जाओ।
तीन संभावनाएं है। दो प्रेमी प्रेम में तीन आकार, ज्यामितिक आकार निर्मित कर सकते है। शायद तुमने इसके बारे में पढ़ा भी होगा। या कोई पुरानी कीमिया, की तस्वीर भी देखो। जिसमें एक स्त्री और एक पुरूष तीन ज्यामितिक आकारों में नग्न खड़े है। एक आकार चतुर्भुज है, दूसरा त्रिभुज है, और तीसरा वर्तुल है। यक अल्केमी और तंत्र की भाषा में काम क्रोध का बहुत पुराना विश्लेषण है।
आमतौर से जब तुम संभोग में होते हो तो वहां दो नहीं, चार व्यक्ति होते है। वही है चतुर्भुज। उसमे चार कोने है, क्योंकि तुम दो हिस्सों में बंटे हो। तुम्हारा एक हिस्सा विचार करने वाला है और दूसरा हिस्सा भावुक हिस्सा है। वैसे ही तुम्हारा साथी भी दो हिस्सों में बंटा है। तुम चार व्यक्ति हो दो नहीं। चार व्यक्ति प्रेम कर रहे है। यह एक भीड़ है, और इसमें वस्तुत: प्रगाढ़ मिलन की संभावना नहीं है। इस मिलन के चार कोने है और मिलन झूठा है। वह मिलन जैसा मालूम होता है। लेकिन मिलन है नहीं। इसमें प्रगाढ़ मिलन की कोई संभावना नहीं है। क्योंकि तुम्हारा गहन भाग दबा पडा है। केवल दो सिर, दो विचार की प्रक्रियाएं मिल रही है। भाव की प्रक्रियाएं अनुपस्थित है। वे दबी छीपी है।
दूसरी कोटी काम मिलन त्रिभुज जैसा होगा। तुम दो हो, आधार के कोने और किसी क्षण अचानक तुम दोनों एक हो जाते हो—त्रिभुज के तीसरे कोने की तरह। किसी आकस्मिक क्षण में तुम्हारी दुई मिट जाती है। और तुम एक हो जाते है। यह मिलन चतुर्भुजी मिलन से बेहतर है। क्योंकि कम से कम एक क्षण के लिए ही सही , एकता सध जाती है। वह एकता तुम्हें स्वास्थ्य देती है। शक्ति देती है। तुम फिर युवा और जीवंत अनुभव करते हो।
लेकिन तीसरा मिलन सर्वश्रेष्ठ है। और यह तांत्रिक मिलन है। इसमें तुम एक वर्तुल हो जाते हो, इसमें कोने नहीं रहते। और यह मिलन क्षण भर के लिए नहीं है, वस्तुत: यह मिलन समयातित है। उसमें समय नहीं रहता। और यह मिलन तभी संभव है जब तुम स्खलन नहीं खोजते हो। अगर स्खलन खोजते हो तो फिर यह त्रिभुजीय मिलन हो जाएगा। क्योंकि स्खलन होते ही संपर्क का बिंदु मिलन का बिंदू खो जाता है।
आरंभ के साथ रहो, अंत की फिक्र मत करो। इस आरंभ में कैसे रहा जाए? इस संबंध में बहुत सी बातें ख्याल में लेने जैसी है। पहली बात कि काम कृत्य को कहीं जाने का, पहुंचने का माध्यम मत बनाओ। संभोग को साधन की तरह मत लो, वह आपने आप में साध्य है। उसका कहीं लक्ष्य नहीं है, वह साधन नहीं है। और दूसरी बात कि भविष्य की चिंता मत लो, वर्तमान में रहो। अगर तुम संभोग के आरंभिक भाग में वर्तमान में नहीं रह सकते, तब तुम कभी वर्तमान में नहीं रह सकते। क्योंकि काम कृत्य की प्रकृति ही ऐसी है। कि तुम वर्तमान में फेंक दिए जाते हो।
तो वर्तमान में रहो। दो शरीरों के मिलन का सुखा लो, दो आत्माओं के मिलने का आनंद लो। और एक दूसरे में खो जाओ। एक हो जाओ। भूल जाओ कि तुम्हें कहीं जाना है। वर्तमान क्षण में जीओं, जहां से कहीं जाना नहीं है। और एक दूसरे से मिलकर एक हो जाओ। उष्णता और प्रेम वह स्थिति बनाते है जिसमें दो व्यक्ति एक दूसरे में पिघलकर खो जाते है। यही कारण है कि यदि प्रेम न हो तो संभोग जल्दबाजी का काम हो जाता है। तब तुम दूसरे का उपयोग कर रहे हो। दूसरे में डूब नहीं रहे हो। प्रेम के साथ तुम दूसरे में डूब सकते हो।
आरंभ का यह एक दूसरे में डूब जाना अनेक अंतदृष्टियां प्रदान करता है। अगर तुम संभोग को समाप्त करने की जल्दी नहीं करते हो तो काम-कृत्य धीरे-धीरे कामुक कम और आध्यात्मिक ज्यादा हो जाता है। जननेंद्रियों भी एक दूसरे में विलीन हो जाती है। तब दो शरीर ऊर्जाओं के बीच एक गहन मौन मिलन घटित होता है। और तब तुम घंटों साथ रह सकते हो। यह सहवास समय के साथ-साथ गहराता जाता है। लेकिन सोच-विचार मत करो, वर्तमान क्षण में प्रगाढ़ रूप से विलीन होकर रहो। वही समाधि बन जाती है। और अगर तुम इसे जान सके इसे अनुभव कर सके, इसे उपलब्ध कर सके तो तुम्हारा कामुक चित अकामुक हो जाएगा। एक गहन ब्रह्मचर्य उपलब्ध हो सकता है। काम से ब्रह्मचर्य उपलब्ध हो सकता है।
यह वक्तव्य विरोधाभासी मालूम होता है। काम से ब्रह्मचर्य उपलब्ध हो सकता है। क्योंकि हम सदा से सोचते आए है कि अगर किसी को ब्रह्मचारी रहना है। तो उसे विपरीत यौन के सदस्य को नहीं देखना चाहिए ।
उससे नहीं मिलना चाहिए। उससे सर्वथा बचना चाहिए, दूर रहना चाहिए। लेकिन उस हालत में एक गलत किस्म का ब्रह्मचर्य घटित होता है। जब चित विपरीत यौन के संबंध में सोचने में संबंध में सोचने में संलग्न हो जाता है। जितना ही तुम दूसरे से बचोगे उतना ही ज्यादा उसके संबंध में सोचने को विवश हो जाओगे। क्योंकि काम मनुष्य की बुनियादी आवश्यकता है, गहरी आवश्यकता है।
तंत्र कहता है कि बचने की, भागने की चेष्टा मत करो, बचना संभव नहीं है। अच्छा है कि प्रकृति को ही उसके अतिक्रमण का साधन बना लो। लड़ों मत प्रकृति के अतिक्रमण के लिए प्रकृति को स्वीकार करो।
अगर तुम्हारी प्रेमिका या तुम्हारी प्रेमी के साथ इस मिलन को अंत की फिक्र किए बिना लंबाया जा सके तो तुम आरंभ में ही बने रहे सकते हो। उतैजना ऊर्जा है और शिखर पर जाकर तुम उसे खो सकते हो। ऊर्जा के खोन से गिरावट आती है। कमजोरी पैदा होती है। तुम उसे विश्राम समझ सकते हो। लेकिन वह उर्जा का अभाव है।
तंत्र तुम्हें उच्चतर विश्राम का आयाम प्रदान करता है। प्रेमी और प्रेमिका एक दूसरे में विलीन होकर एक दूसरे को शक्ति प्रदान करते है। तब वे एक वर्तुल बन जाते है। और उनकी ऊर्जा वर्तुल में घूमने लगती है। वह दोनों एक दूसरे को जीवन ऊर्जा दे रहे है। नव जीवन दे रहे है। इसमे ऊर्जा का ह्रास नहीं होता है। वरन उसकी वृद्धि होती है। क्योंकि विपरीत यौन के साथ संपर्क के द्वारा तुम्हारा प्रत्येक कोश ऊर्जा से भर जाता है। उसे चुनौती मिलती हे।
यदि स्खलन न हो, यदि ऊर्जा को फेंका न जाए तो संभोग ध्यान बन जाता है। और तुम पूर्ण हो जाते हो। इसके द्वारा तुम्हारा विभाजित व्यक्तित्व अविभाजित हो जाता है। अखंड हो जाता है। चित की सब रूग्णता इस विभाजन से पैदा होती है। और जब तुम जुड़ते हो, अखंड होते हो तो तुम फिर बच्चे हो जाते हो। निर्दोष हो जाते हो।
और एक बार अगर तुम इस निर्दोषता का उपलब्ध हो गए तो फिर तुम अपने समाज में उसकी जरूरत के अनुसार जैसा चाहो वैसा व्यवहार कर सकते हो। लेकिन तब तुम्हारा यह व्यवहार महज अभिनय होगा, तुम उससे ग्रस्त नहीं होगे। तब यह एक जरूरत है जिसे तुम पूरा कर रहे हो। तब तुम उसमे नहीं हो। तुम मात्र एक अभिनय कर रहे हो। तुम्हें झूठा चेहरा लगाना होगा। क्योंकि तुम एक झूठे संसार में रहते हो। अन्यथा संसार तुम्हें कुचल देगा, मार डालेगा।
हमने अनेक सच्चे चेहरों को मारा है। हमने जीसस को सूली पर चढ़ा दिया, क्योंकि वे सच्चे मनुष्य की तरह व्यवहार करने लगे थे। झूठा समाज इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता है। हमने सुकरात को जहर दे दिया। क्योंकि वह भी सच्चे मनुष्य की तरह पेश आने लगे थे। समाज जैसा चाहे वैसा करो, अपने लिए और दूसरों के लिए व्यर्थ की झंझट मत पैदा करो। लेकिन जब तुमने अपने सच्चे स्वरूप को जान लिया, उसकी अखंडता को पहचान लिया तो यह झूठा समाज तुम्हें फिर रूग्ण नहीं कर सकता, विक्षिप्त नहीं कर सकता।
‘’काम-आलिंगन के आरंभ में उसकी आरंभिक अग्नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो।‘’
अगर स्खलन होता है तो ऊर्जा नष्ट होती है। और तब अग्नि नहीं बचती। तुम कुछ प्राप्त किए बिना ऊर्जा खो देते हो।
*अहंकार और लोभ*
चित्त को वर्तमान में ले आना ही ध्यान है, वही मेडिटेशन है, वही समाधि है। और चित्त को वर्तमान से यहां वहां भटकाए रहना, वही चंचलता है, वही उपद्रव है। और ध्यान में रहे कि हम आखिर वर्तमान से चूक क्यों जाते हैं? लोभ चुका देता है, लालच चुका देता है। क्योंकि लोभ हमेशा भविष्य की बातें करता है। लोभ वर्तमान की बात करता ही नहीं। करेगा कैसे? जो भी पाना है वह अभी तो पाया नहीं जा सकता। जो भी पाना है वह कल ही पाया जा सकता है, आगे ही पाया जा सकता है, इसी वक्त पाने का तो कोई उपाय नहीं है। इसलिए लोभ हमेशा भविष्य की भाषा बोलता है।
लोभ चुका देता है और अहंकार चुका देता है। अहंकार सदा अतीत की भाषा बोलता है, पास्ट की जो पाया, जो मिला, जो किया, जो बनाया, वह सब पास्ट में है। अहंकार सदा ही अतीत की भाषा बोलता है कि मैं फलां आदमी का बेटा हूं! क्यों? जो होगा उसका तो पता नहीं है, जो हो चुका है उसी का मैं दावा कर सकता हूं। मेरे पास इतने करोड़ रुपये हैं! होंगे उनका तो दावा नहीं कर सकते आप, जो हो चुका है। मेरी तिजोड़ी इतनी बड़ी! और मैं इतनी बड़ी कुर्सी पर रहा हूं! मैं कोई साधारण आदमी नहीं हूं। वह जो समबडी हूं मैं कुछ हूं वह हमेशा पास्ट से आता है। वह हमारे अतीत का संग्रह है, जिसको हमने जोड़ कर खड़ा कर लिया है। वह हमारा अहंकार है। अहंकार हमें पीछे ले जाता है, लोभ हमें आगे ले जाता है। और गौर से देखें तो लोभ और अहंकार एक ही चीज के दो हिस्से हैं। जो लोभ पूरा हो चुका है वह अहंकार बन गया, जो लोभ पूरा होगा वह अहंकार बनेगा। जो लोभ पूरा हो चुका वह अहंकार बन गया, जो पूरा होगा वह अहंकार बनेगा। जो अहंकार बन गया है वह लोभ है, जिससे आप गुजरे; और वह लोभ जो अभी आगे पकड़ रहा है, वह भविष्य में बनने वाला अहंकार है, जिससे आप गुजरेंगे।
🙏🙏🌹🌹
*जीवन रहस्य ओशो✍*
पुरूष शब्द का अर्थ ठीक से समझ ले। पुरूष का अर्थ यह मत समझ लेना कि जो नारी नहीं है। इस सुत्र को लिखने वाला होगा कोई पंडित, होगा कोई थोथी, व्यर्थ की बौद्धिक बातों से भरा हुआ आदमी। पुरूष का अर्थ ठीक उस शब्द में छिपा है। पुर का अर्थ होता है: नगर। नागपुर, कानपुर, उदयपुर, जयपुर। पुर का अर्थ होता है नगर। और पुरूष का अर्थ होता है: नगर के भीतर जो बसा है। शरीर है नगर, सच मैं ही नगर है। विज्ञान की दृष्टि में भी नगर है। वैज्ञानिक कहते है: एक शरीर में सात अरब जीवाणु होते है।
अभी तो पूरी पृथ्वी की भी इतनी संख्या नहीं; अभी तो चार अरब को पर कर गई है। लेकिन एक-एक शरीर में सात अरब जीवाणु है। सात अरब जीवित चेतनाओं का यह नगर है। और उसके बीच में तुम बसे हो। मूर्च्छित हो, इसलिए पता नहीं। होश में आ जाओ तो पता चले। तुम देह नहीं हो, मन नहीं हो, भाव नहीं हो।
देह का परकोटा बाहरी परकोटा है तुम्हारे नगर का, जैसे बड़ी दीवार होती है, पुराने नगरों के चारों और—किले की दीवारे। फिर मन का परकोटा है—और एक दीवार।
और फिर भावनाओं का परकोटा सबसे अंतरंग हे—और एक दीवार। और इन तीन दीवारों के पीछे तुम हो चौथे। जिसको जानने वालों ने तुरिया कहा है। तुरीय का अर्थ होता है। चौथा। और जब तुम चौथे को पहचान लोगे; तुरीय को पहचान लोगे, इतने जाग जाओगे कि जान लोगे—न मैं देह हूं, न मैं मन हूं, न मैं ह्रदय हूं। मैं तो केवल चैतन्य हूं। सिर्फ बुद्धत्व हूं—उस क्षण तुम पुरूष हुए।
स्त्री भी पुरूष हो सकती है। और तुम्हारे “तथाकथित” पुरूष भी पुरूष हो सकते है। स्त्री और पुरूष से इसका कुछ लेना देना नहीं है। स्त्री का देह का परकोटा भिन्न है। यह परकोटे की बात है। घर यूं बनाओ या यूं बनाओ। घर का स्थापत्य भिन्न हो सकता है। द्वार-दरवाजे भिन्न हो सकते है। घर के भीतर के रंग-रौनक भिन्न हो सकती है। घर के भीतर की साज-सजावट भिन्न हो सकती है।
मगर घर के भीतर रहने वाला जो मालिक है, वह एक ही है। वह न तो स्त्री है, न पुरूष तुम्हारे अर्थों में। स्त्री और पुरूष दोनों के भीतर जो बसा हुआ चैतन्य है, वही वस्तुत: पुरूष है............😍
❣ _*ओशो*_ ❣
पहला प्रश्न: भगवान, क्या भारतीय संस्कृति विश्व की श्रेष्ठतम संस्कृति नहीं है?
सुरेंद्र कुमार, मनुष्य का अहंकार बहुत से रूप लेता है। अहंकार के खेल बड़े सूक्ष्म हैं। मैं बड़ा हूं, ऐसा सीधा कहना तो मुश्किल है,परोक्ष रूप से ही कहा जा सकता है। मेरा धर्म बड़ा है, मेरा देश बड़ा है, मेरी संस्कृति बड़ी है, इन सबके पीछे घोषणा एक ही है: मैं बड़ा हूं!
और तुम सोचते हो, तुम्हीं सोचते हो कि भारतीय संस्कृति श्रेष्ठतम है? चीनी सोचते हैं चीनी संस्कृति श्रेष्ठतम है। और अमरीकी सोचते हैं कि अमरीकी संस्कृति श्रेष्ठतम है। दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है जो ऐसा ही न सोचता हो।
जरा इस पर विचार करो! हिंदू सोचते हैं उनका ही धर्म श्रेष्ठ; वही मुसलमान सोचता, वही जैन, वही बौद्ध, वही ईसाई, पारसी,यहूदी। जब सभी ऐसा सोचते हैं तो इसका संबंध धर्म से नहीं होगा;इसका संबंध किसी और गहरी चीज से होगा जो सभी के भीतर छिपी है। हम हर बात में किसी न किसी रूप में अपने अहंकार को सिद्ध करना चाहते हैं।
जरूर खूबियां हैं। चीनी संस्कृति की अपनी खूबियां हैं; लाओत्सु दिया दुनिया को, च्वांगत्सु दिया, कनफ्यूशियस दिया। भारतीय संस्कृति की अपनी खूबियां हैं; बुद्ध दिए, महावीर दिए, कृष्ण दिए। अरबी संस्कृति की अपनी खूबियां हैं; मोहम्मद दिए, बायजीद,बहाऊद्दीन, जलालुद्दीन...। सारी दुनिया की संस्कृतियों की अपनी-अपनी खूबियां हैं; लेकिन श्रेष्ठ कौन, यह बात ही गलत, यह विचार ही भ्रांत। और इसके भीतर मूल आकांक्षा एक ही है कि सब तरह से सिद्ध हो जाए कि मैं श्रेष्ठ हूं। और जो भी यह सिद्ध करना चाहता है कि मैं श्रेष्ठ हूं उसे कहीं भीतर डर है कि वह श्रेष्ठ है नहीं। नहीं तो सिद्ध क्यों करना चाहेगा? हीनता की ग्रंथि ही श्रेष्ठता का दावा करती है।
मनस्विदों से पूछो! वे यही कहेंगे, जितना हीन व्यक्ति हो उतना चारों तरफ श्रेष्ठता का शोरगुल मचाता है। इसीलिए राजनीति में सिर्फ हीनता की ग्रंथि से पीड़ित लोग ही उत्सुक होते हैं--निकृष्टतम। क्योंकि भीतर घाव की तरह हीनता काटती है। इसे किसी तरह फूलों से ढांक देना है; सिंहासनों पर विराजमान होकर इसे भुला देना है।
मैंने एक कहानी सुनी है। पेरिस के विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र का जो विभागाध्यक्ष था, जो हेड ऑफ दि डिपार्टमेंट था, उसने एक दिन आकर सुबह-सुबह ही अपनी कक्षा में घोषणा की कि मैं दुनिया का सबसे श्रेष्ठतम व्यक्ति हूं!
विद्यार्थी हंसे। झक्की तो वे उसे मानते ही थे। दर्शनशास्त्र का कोई प्रोफेसर और विश्वविद्यालय में झक्की न माना जाए, ऐसा होता ही नहीं। पहली तो बात, दर्शनशास्त्र में झक्की ही उत्सुक होते हैं, ऐसी धारणा है। फिर कोई साधारण झक्की नहीं होगा, जब विभाग का अध्यक्ष हो गया तो असाधारण झक्की होगा। और आज तो हद हो गई। इतने सीधे-सीधे कोई कहता है? लोग छिपा-छिपा कर कहते हैं! इस आदमी ने सीधे ही आकर घोषणा कर दी कि मैं दुनिया का सबसे श्रेष्ठतम व्यक्ति हूं। विद्यार्थी तो सकते में आ गए। लेकिन एक विद्यार्थी ने हिम्मत खड़े होने की की और पूछा कि आप दर्शनशास्त्र के अध्यापक हैं, आप तो जो भी कहते हैं उसके पीछे जरूर कोई तर्क होगा। आपकी इस घोषणा के पीछे क्या तर्क प्रक्रिया है?समझाएं।
तो उस प्रोफेसर ने कहा, मुझे पता था कोई न कोई पूछेगा कि इसके पीछे तर्क की प्रक्रिया क्या है। तो मैं सारी तैयारी करके आया हूं। उसने अपने झोले से दुनिया का नक्शा निकाला, बोर्ड पर टांगा, और कहा, यह दुनिया का नक्शा है। मैं तुमसे पूछता हूं कि दुनिया में सबसे श्रेष्ठ देश कौन सा है?
स्वभावतः सभी फ्रेंच थे; उन्होंने कहा, फ्रांस! इसमें क्या पूछने की बात है? यह तो स्वतः सिद्ध है।
तो उस प्रोफेसर ने कहा, तो बाकी दुनिया छोड़ दें। फ्रांस सबसे श्रेष्ठ देश है, यह सिद्ध हुआ। तुम सब राजी होते हो, हाथ उठा दो। अब इतना ही मुझे सिद्ध करना है कि मैं फ्रांस में सर्वश्रेष्ठ हूं, तो दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हो जाऊंगा। और मैं तुमसे यह पूछता हूं कि फ्रांस में सर्वश्रेष्ठ नगर कौन सा है?
तब जरा विद्यार्थी समझे कि अब मामला गड़बड़ हुआ जा रहा है। स्वभावतः वे सभी पेरिस के निवासी थे, उन्होंने कहा, पेरिस। तो प्रोफेसर ने कहा, अब फ्रांस को भी छोड़ दो, अब रहा पेरिस, अब पेरिस में ही निपटारा करना है। और पेरिस में सर्वाधिक श्रेष्ठतम संस्था कौन सी है?
निश्चित ही विश्वविद्यालय! विद्यापीठ! सरस्वती का मंदिर!
और उसने पूछा कि विश्वविद्यालय में सर्वश्रेष्ठ विषय कौन सा है?
दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी थे तो सभी ने कहा, दर्शनशास्त्र। तो उसने कहा, अब भी कुछ बाकी बचा है सिद्ध करने को? मैं दर्शनशास्त्र का प्रधान अध्यापक हूं। मैं दुनिया का श्रेष्ठतम व्यक्ति हूं।
ऐसे ही तर्क...मेरा शास्त्र श्रेष्ठ! मेरा सिद्धांत श्रेष्ठ! मेरी जाति श्रेष्ठ! मेरा वर्ण श्रेष्ठ! लेकिन सीधी-सीधी बात क्यों नहीं कहते? सीधी कहो तो अच्छा। बीमारी साफ हो तो इलाज हो सके। बीमारी जब छुप-छुप कर आती है तो इलाज करना मुश्किल हो जाता है। बीमारी जब नयी-नयी शक्लें लेकर आती है तो इलाज करना मुश्किल हो जाता है, निदान ही मुश्किल हो जाता है। इसीलिए सदियां हो गईं और निदान नहीं हो पा रहा है। अगर तुम कहो कि मैं दुनिया का सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति हूं, तो पहले तो तुम भी डरोगे, छाती कंपेगी, यह कहें कैसे? और सारे लोग संदेह उठाएंगे। लेकिन तुम कहते हो, भारतीय संस्कृति सर्वश्रेष्ठ! अब जिनके बीच तुम कह रहे हो वे भी भारतीय हैं; वे सब तुम्हारे साथ सिर में सिर हिलाएंगे,कहेंगे कि बिलकुल ठीक, सत्य ही कहते हैं आप, सत्य वचन महाराज! क्योंकि उनका अहंकार भी इसी में सिद्ध हो रहा है जिसमें तुम्हारा। फिर हिंदुओं के बीच कहो कि हिंदू श्रेष्ठ,स्वभावतः! और फिर ब्राह्मणों के बीच कहो कि ब्राह्मण श्रेष्ठ, तो कोई संदेह भी नहीं उठाएगा। मगर इस तरह छिपे रास्तों से, पीछे के रास्तों से कौन आ रहा है तुम्हारे जीवन में? सिर्फ एक अहंकार।
खूबियां हैं संस्कृतियों की, सो सभी संस्कृतियों की खूबियां हैं। और खूबियां हैं धर्मों की, सो सभी धर्मों की खूबियां हैं। अगर वेद सुंदर हैं तो कुरान का भी कोई मुकाबला नहीं। और अगर कुरान सुंदर है तो बाइबिल अनूठी है। अद्वितीय हैं ये सारे स्रोत। मगर इनकी तुलना मत करना; न तो कुरान वेद से श्रेष्ठ है, न वेद बाइबिल से श्रेष्ठ है, न बाइबिल धम्मपद से श्रेष्ठ है। ये सब इतनी अनूठी चीजें हैं कि इनकी तुलना नहीं हो सकती। गुलाब की गेंदे से तुलना कैसे करोगे? और चंपा की चमेली से तुलना कैसे करोगे? चंपा चंपा है,चमेली चमेली है। चमेली की अपनी गंध है, चंपा की अपनी गंध है। और फिर चंपा को प्रेम करने वाले लोग हैं और चमेली को प्रेम करने वाले लोग भी हैं। फिर अपनी-अपनी पसंद है।
कुरान में जो तरन्नुम है, कुरान में जो गीत है, वह दुनिया के किसी शास्त्र में नहीं। उपनिषदों में जो साफ अभिव्यक्ति है, जो सुस्पष्ट अभिव्यक्ति है, दो और दो चार जैसी, ऐसी दुनिया के किसी शास्त्र में नहीं। और बाइबिल की भाषा में जैसी पृथ्वी की सुगंध है, जैसा ग्राम्य ताजापन, वैसा दुनिया के किसी शास्त्र में नहीं। बुद्ध के वचनों में जैसी शांति है, जैसा अपूर्व संगीत है शांति का, शून्य का, वैसा और कहां मिलेगा! लेकिन ये सब अनूठे हैं, इनको तौलो मत। तौलने की दृष्टि भ्रांत है। ये कोई तराजू पर रख कर तौले जाने वाली चीजें नहीं हैं। यह काम तो तुम पागलों पर छोड़ दो।
मगर यह जमीन पागलों से भरी है और इसलिए इस तरह की बातें चलती हैं।
मैंने सुना, एक बार दो अफीमची मिले। पहला अफीमची बोला, मेरे दादा का मकान इतना ऊंचा था कि एक बार एक बच्चा ऊपर से गिरा तो जमीन तक आते-आते आदमी बन गया। दूसरा भला क्यों चुप रहता! उसने कुछ कम पी थी! खिलखिला कर हंसा और बोला कि छोड़ो जी छोड़ो! मेरे दादा के मकान से तो एक बार एक बंदर गिरा था जो जमीन तक पहुंचते-पहुंचते आदमी बन गया था।
अफीमची माफ किए जा सकते हैं। मगर यही दशा तो उनकी है जिनको तुम समझदार कहते हो--पंडित-पुरोहित, तुम्हारे महात्मा। ये सब अफीमची हैं। जरूर इन्होंने कोई सूक्ष्म अफीम पी रखी है--अहंकार की। और अहंकार से बड़ी अफीम क्या है?
जागो! इस तरह की व्यर्थ की बातों से अपने को मुक्त करो।
उत्सव आमार जाति आनंद आमार गोत्र-प्रवचन-08
#जापान में कोई दो सौ वर्ष पहले एक बहुत अद्भुत संन्यासी हुआ। उस संन्यासी की एक ही शिक्षा थी कि जागो! नींद छोड़ दो। उस संन्यासी की खबर जापान के सम्राट को मिली। सम्राट जवान था, अभी नया नया राजगद्दी पर बैठा था। उसने उस फकीर को बुलाया। और उस फकीर से प्रार्थना की, मैं भी जागना चाहता हूं। क्या मुझे जागना सिखा सकते है?
उस फकीर ने कहा, सिखा सकता हूं,लेकिन राजमहल में नहीं, मेरे झोपड़े पर आ जाना पड़ेगा! और कितने दिन में सीख पाएंगे, इसका कोई निश्चय नहीं है । यह एक-एक आदमी की तीव्रता पर निर्भर करता है; एक-एक आदमी के असंतोष पर निर्भर करता है कि वह कितना प्यासा है कि सीख सके । तुम्हारी प्यास कितनी है; तुम्हारी अतृप्ति कितनी है; तुम्हारी डिसकटेंट कितना है; तो तुम सीख सकते हो । और उस मात्रा में निर्भर होगा कि तुम कितने जल्दी सीख सकते हो । वर्ष लग सकते हैं, दो वर्ष लग सकते हैं, दस वर्ष लग सकते हैं । और मेरी शर्त है कि बीच से कभी आने नहीं दूंगा; अगर सीखना हो तो पूरी तैयारी करके आना । और साथ में यह भी बता दूं कि मेरे रास्ते अपने ढ़ंग के हैं । तुम यह मत कहना कि यह मुझसे क्या करवा रहे हो, यह क्या सिखा रहे हो! मेरे ढ़ंग हैं सिखाने के ।
राजकुमार राजी हो गया और उस फकीर के आश्रम पहुंच गया। दूसरे दिन सुबह उठते ही उस फकीर ने कहा कि आज से तुम्हारा पहला पाठ शुरू होता है । और पहला पाठ यह है कि में दिन में किसी भी समय तुम्हारे ऊपर लकड़ी की नकली तलवार से हमला करूंगा । तुम किताब पढ़ रहे हो, मैं पीछे से आकर नकली तलवार से तुम्हारे ऊपर हमला कर दूंगा । तुम बुहारी लगा रहे हो, मैं पीछे से आकर हमला कर दूंगा । तुम खाना खा रहे हो, मैं हमला कर दूंगा । दिन भर होश से रहना! किसी भी वक्त हमला हो सकता है । सावधान रहना! अलर्ट रहना! किसी भी वक्त मेरी तलवार-लकड़ी की तलवार -- तुम्हें चोट पहुंचा सकती है।
उस राजकुमार ने कहा कि मुझे तो जागरण की शिक्षा के लिए बुलाया गया था,और यह क्या करवाया जा रहा है ?
मैं कोई तलवारबाजी सीखने नहीं आया हूं,लेकिन गुरु ने पहले ही कह दिया था कि इस मामले में तुम कुछ पूछताछ नहीं कर सकोगे । मजबूरी थी । शिक्षा शुरू हो गई, पाठ शुरू हो गया । आठ दिन में ही उस राजकुमार की हड्डी-पसली सब दर्द देने लगी,हाथ-पैर सब दुखने लगे । जगह-जगह से चोट! किताब पढ़ रहे हैं,हमला हो जाए । रास्ते पर घूमने निकला है, हमला हो जाएगा । दिन में दस पच्चीस बार कहीं से भी हमला हो जाएगा ।
लेकिन आठ दिन में ही उसे पता चला कि धीरे-धीरे एक नये प्रकार का होश, एक जागृति उसके भीतर पैदा हो रही है । वह पूरे वक्त अलर्ट रहने लगा, सावधान रहने लगा । कभी भी हमला हो सकता है! किताब पढ़ रहा है, तो भी उसके चित्त का एक कोना जागा हुआ है कि कहीं हमला न हो जाएं! तीन महीने पूरे होते-होते, किसी भी तरह का हमला हो, वह रक्षा करने में समर्थ हो गया । उनकी ढाल ऊपर उठ जाती । पीछे से भी गुरु आए,तो भी ढाल पीछे उठ जाती और हमला सम्हल जाता । तीन महीने बाद उसे चोट पहुंचाना मुश्किल हो गया । कितने ही अनअवेयर, कितना ही अनजान हमला हो, वह रक्षा करने लगा । चित्त राजी हो गया, चित्त सजग हो गया ।
उसके गुरु ने कहा कि पहला पाठ पूरा हो गया; कल से दूसरा पाठ शुरू होगा । दूसरा पाठ यह है कि अब तक जागते में मैं हमला करता था, कल से नींद में भी हमला होगा, सम्हल कर सोना! उस राजकुमार ने कहा, गजब करते हैं आप! कमाल करते हैं! जागने तक गनीमत थी, मैं होश में था, किसी तरह बचा लेता था । लेकिन नींद में तो बेहोश रहूंगा!
उसके गुरु ने कहा, घबड़ाओं मत; मुसीबत नींद में भी होश को पैदा कर देती है । संकट, क्राइसिस नींद में भी सावधानी को जन्म दे देती है । उस बूढ़े ने कहा,फिकर मत करो । तुम फिकर छोड़ो । तुम तो नींद में भी होश रखने की कोशिश करना । और लकड़ी की तलवार से नींद में हमले शुरू हो गए । रात में आठ-दस दफा कभी भी चोट पड़ जाती है । एक दिन, दो दिन,आठ-दस दिन बीतते फिर हड्डी-पसली दर्द करने लगी।
लेकिन तीन महीने पूरे होते-होते राजकुमार ने पाया कि वह बूढ़ा ठीक कहता है । नींद में भी होश जागने लगा ।
सोया रहता, और भीतर कोई जागता भी रहता और स्मरण रखता कि हमला हो सकता है! हाथ रात में, नींद में भी ढाल को पकड़े रहता । तीन महीने पूरे होते-होते गुरु का आगमन, उसके कदम की धीमी सी अवाज भी उसे चौंका देती और वह ढाल से रक्षा कर लेता । तीन महीने पूरे होने पर नींद में भी हमला करना मुश्किल हो गया । अब वह बहुत प्रसन्न था । एक नय तरह की ताजगी उसे अनुभव हो रही थी । नींद में भी होश था । और कुछ नये अनुभव उसे हुए । पहले तीन महीने में,जब वह दिन में भी जागने की कोशिश करता था, तो
जितना-जितना जागना बढ़ता गया, उसने-उतने विचार कम होते गए । विचार नींद का हिस्सा है । जितना सोया हुआ आदमी, उतने ज्यादा विचार उसके भीतर चक्कर काटने हैं । जितना जागा हुआ आदमी, उतना भीतर साइलेंस और मौन आना शुरू हो जाता है, विचार बंद हो जाते हैं ।
पहला तीन महीने में उसे स्पस्ट दिखाई पड़ा था कि
धीरे-धीरे विचार कम होते गए, कम होते गए,
फिर धीरे-धीरे विचार समाप्त हो गए । सिर्फ सावधानी रह गई, होश रह गया,अवेयरनेस रह गई । ये दोनों चीजें एक साथ कभी नहीं रह सकती; या तो विचार रहता है, या होश रहता है। विचार आया कि होश गया । जैसे बादल घिर जाएं आकाश में तो सूरज ढंक जाता है, बादल हट जाएं तो सूरज प्रकट हो जाता है । विचार मनुष्य के मन के बादलों की तरह घेरे हुए हैं । विचार घेर लेते हैं, होश दब जाता है । विचार हट जाते हैं,होश प्रकट हो जाता है ।
जैसे बादल को फोड़ कर सूरज दिखाई पड़ने लगता है । पहले तीन महीने में उसे अनुभव हुआ था कि विचार क्षीण हो गए, कम हो गए । दूसरे तीन महीने में एक और नया अनुभव हुआ... रात में जैसे-जैसे होश बढ़ता गया,
वैसे-वैसे सपने ड्रीम्स कम होते गए । जब तीन महीने पूरे होते-होते जागरण रात में भी बना रहने लगा, तो सपने बिल्कुल विलीन हो गए, नींद स्वप्नशून्य हो गई । दिन विचार शून्य हो जाए,रात स्वप्नशून्य हो जाए,तो चेतना जागी ।
तीन महीने पूरे होने पर उसके बूढ़े गुरु ने कहा,दूसरा पाठ पूरा हो गया । उस राजकुमार ने कहा, तीसरा पाठ क्या हो सकता है ? जागने का पाठ भी पूरा हो गया, नींद का पाठ भी पूरा हो गया । उसके गुरु ने कहा, अब असली पाठ शुरू होगा । कल से मैं असली तलवार से हमला शुरू करूंगा । अब तक लकड़ी की तलवार थी । उस राजकुमार ने कहा, आप क्या कह रहे हैं ? लकड़ी की तलवार तक गनीमत थी, चूक भी जाता था तो भी कोई खतरा नहीं था, असली तलवार!
गुरु ने कहा कि जितना चैलेंज, जितनी चुनौती चेतना के लिए खड़ी की जाए, चेतना उतनी ही जागती है । जितनी चुनौती हो चेतना के लिए, चेतना उतनी सजग होती है ।
तुम घबराओ मत । असली तलवार तुम्हें और गहराईयों तक जगा देगी ।
और दूसरे दिन सुबह से असली तलवार से हमला शुरू हो गया। सोच सकते हैं आप, असली तलवार का ख्याल ही उसकी सारी चेतना की निद्रा को तोड़ दिया होगा । भीतर तक, प्राणों के अंतस तक वह तलवार का स्मरण व्याप्त हो गया । तीन महीने गुरु एक भी चोट नहीं पहुंचा सका असली तलवार से । लकड़ी की तलवार की उतनी चुनौती न थी । असली तलवार की चुनौती अंतिम थी । एक बार चूक जाए तो जीवन समाप्त हो जाए ।
तीन महीने में एक भी चोट नहीं पहुंचाई जा सकी ।
और तीन महीने में उसे इतनी शांति, इतने आनंद, इतने प्रकाश का अनुभव हुआ उस युवक राजकुमार को कि उसका जीवन एक नये नृत्य में, एक नये लोक में प्रवेश करने लगा । आखिरी दिन आ गया तीसरे पाठ का, और गुरु ने कहा कि कल तुम्हारी विदा जाएगी तुम उत्तीर्ण हो गए । क्या तुम नहीं जाग गए ? उस युवक ने गुरू के चरणों में सिर रख दिया । उसने कहा, मैं जाग गया हूं ।
और अब मुझे पता चला कि मैं कितना सोया हुआ था!
जो आदमी जीवन भर बीमार रहा हो, वह धीरे-धीरे भूल ही जाता है कि मैं बीमार हूं । जब वह स्वस्थ होता है तभी पता चलता है कि मैं कितना बीमार था । जो आदमी जीवन भर सोया रहा है ... और हम सब सोए रहे हैं;
हमे पता भी नहीं चलता कि ओह! यह सारा जीवन एक नींद थी।
श्री अरविंद ने कहा है, जब सोया हुआ था तो जिसे मैंने प्रेम समझा था, जाग कर मैंने पाया वह असत्य था, वह प्रेम नहीं था। जब मैं सोया हुआ था तो जिसे मैंने प्रकाश सथा, जाग कर पाया कि वह अंधकार से भी बदतर अंधकार था, वह प्रकाश था ही नहीं । जब मैं सोया हुआ था तो जिसे मैंने जीवन समझना था, जाग कर मैंने पाया वह तो मृत्यु थी, जीवन तो यह है ।
उस राजकुमार ने चरणों में सिर रख दिया और कहा कि अब मैं जान रहा हूं कि जीवन क्या है । कल क्या मेरी शिक्षा पूरी हो जाएगी ?
गुरु ने कहा, कल सुबह मैं तुम्हें विदा कर दूंगा ।
सांझ की बात है, गुरू बैठ कर पढ़ रहा है एक वृक्ष के नीचे किताब । और कोई तीन सौ फीट दूर वह युवक बैठा हुआ है । कल सुबह वह विदा हो जाएगा । इस छोटी सी कुटी में, इस बूढ़े के पास, उसने जीवन की संपदा पा ली है । तभी उस अचानक ख्याल आया यह बूढ़ा नौ महीने से मेरे पीछे पड़ा हुआ है: जागने-जगाने, जागना-जागना, सावधान-सावधान यह बूढ़ा भी इतना सावधान है या नहीं ? आज मैं भी इस पर उठ कर हमला करके क्यों न देखूं! कल तो मुझे विदा हो जाना है। मैं भी तलवार ऊठाऊं इस बूढ़े पर, हमला करके पीछे से देखूं, यह खुद भी सावधान है या नहीं ?
उसने इतना सोचा ही था कि वह बूढ़ा वहां दूर से चिल्लाया कि नहीं-नहीं, ऐसा मत करना। मैं बूढ़ा आदमी हूं, भूल कर भी ऐसा मत करना । वह युवक तो अवाक रह गया! उसने सिर्फ सोचा था । उसने कहा, मैंने लेकिन अभी कुछ किया नहीं, सिर्फ सोचा है । उस बूढ़े ने कहा, तू थोड़े दिन और ठहर । जब मन बिल्कुल शांत हो जाता है, तो दूसरे के विचारों की पग ध्वनि भी सुनाई पड़ने लगती है। जब मन बिल्कुल मौन हो जाता है, तो दूसरे के मन में चलते हुए विचारों का दर्शन भी शुरू हो जाता है।
जब कोई बिल्कुल शांत हो जाता है, तब सारे जगत में, सारे जीवन में चलते हुए स्पंदन भी उसे अनुभव होने लगते हैं । इतनी ही शांति में प्रभु चेतना का अनुभव अवतरित होता है । वह राजकुमार दूसरे दिन विदा हो गया होगा । एक अनूठा अनुभव लेकर वह उस आश्रम से वापस लौटा...osho
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✍बोधकथा-25✍
❤🙏ओशो🙏❤
मैं एक सभा में गया था। अछूतों की सभा थी। अछूत की कल्पना ही मेरे हृदय को आंसुओं से भर देती है। वहां पहुंच कर भी मैं बहुत दुखी और उदास था। मनुष्य ने मनुष्य के साथ यह क्या किया है? मनुष्य-मनुष्य के बीच अलंघ्य दीवारें खड़ी करने वाले लोग भी धार्मिक समझे जाते हैं! धर्म का इससे अधिक पतन और क्या हो सकता है? यदि यही धर्म है तो फिर अधर्म क्या है? ऐसा प्रतीत होता है कि अधर्म के अड्डों ने धर्म की पताकाएं चुरा ली हैं और शैतान के शास्त्र परमात्मा के शास्त्र बने हुए हैं।
धर्म भेद नहीं, अभेद है। धर्म द्वैत नहीं, अद्वैत है। धर्म तो दीवारें बनाने में नहीं, मिटाने में है। लेकिन तथाकथित धर्म भेद ही उपजाते रहे हैं और दीवारें ही बनाते रहे हैं। उनकी शक्ति मनुष्य को तोड़ने और विभाजित करने में ही सक्रिय रही है। निश्चय ही यह अकारण नहीं हुआ है। असल में मनुष्य को मनुष्य से अलग किए बिना न तो संगठन बन सकते हैं, और न शोषण ही हो सकता है। यदि मनुष्यता समान है और एक है, तो शोषण के मूलाधार ही नष्ट हो जाते हैं।
शोषण के लिए तो असमानता अनिवार्य है, वर्ग और वर्ण आवश्यक हैं। इसीलिए, धर्म अनेक रूपों में असमानता के, वर्गों और वर्णों के समर्थक रहे हैं। वर्ग-वर्णहीन समाज तो अनायास ही शोषण-विरोधी हो जाता है। मनुष्यता की समानता को स्वीकार करना शोषण को अस्वीकार करना है।
फिर मनुष्य-मनुष्य में भेद डाले बिना संगठन और संप्रदाय भी नहीं बन सकते हैं। भेद से भय आता है, द्वेष और घृणा आती है, और अंततः शत्रुता पैदा होती है। शत्रुता से संगठन जन्मते हैं। संगठन मित्रता से नहीं, शत्रुता से जन्मते हैं। प्रेम नहीं, घृणा ही उनकी आधारशिला है। शत्रुता के भय से संगठन पैदा होते हैं। संगठन शक्ति देते हैं। शक्ति शोषण का सामर्थ्य बनती है और अधिकार-लिप्सा की तृप्ति भी। वही फैल कर साम्राज्य-लिप्सा भी बन जाती है। धर्म ऐसे ही छिपे-छिपे राजनीति बन जाते हैं। धर्म आगे चलता है, राजनीति पीछे चलती है। धर्म आवरण ही रह जाता है और राजनीति प्राण बन जाती है। वस्तुतः जहां संगठन हैं, संप्रदाय हैं, वहां धर्म नहीं है, बस राजनीति ही है। धर्म तो साधना है। वह संगठन नहीं है। अनेक धर्म-संगठनों के नाम से भिन्न-भिन्न राजनीतियां ही अपनी चालें चलती रहती हैं। संगठन के अभाव में धर्म तो हो सकता है, लेकिन धर्म नहीं हो सकते हैं, और न ही हो सकते हैं पुजारी और पुरोहित और उनका व्यवसाय। परमात्मा को भी व्यवसाय बना लिया गया है। उसके साथ भी न्यस्तस्वार्थ संबंधित हो गए हैं। इससे ज्यादा अशोभन और अधार्मिक क्या हो सकता है? लेकिन प्रचार की महिमा अपार है और सतत प्रचार से निकट असत्य भी सत्य बन जाते हैं। फिर जो पुजारी, पुरोहित स्वयं शोषण में हैं, वे यदि शोषण-व्यवस्था के समर्थक हों तो आश्चर्य ही क्या है? धर्मों ने समाज की शोषण-व्यवस्था के लिए भी सुदृढ़ स्तंभों का काम किया है। काल्पनिक सिद्धांतों का जाल बुन कर उन्होंने शोषकों को पुण्यात्मा और शोषितों को पापी सिद्ध किया है। शोषितों को समझाया गया है कि यह उनके दुष्कर्मों का फल है। सच ही धर्मों ने लोगों को खूब अफीम खिलाई है।
एक अछूत वृद्ध ने सभा के अंत में मुझसे पूछा थाः ‘‘क्या मैं मंदिरों में आ सकता हूं? ’’ मैंने कहाः ‘‘मंदिरों में? लेकिन किसलिए? परमात्मा तो स्वयं ही पुरोहितों के मंदिरों में कभी नहीं जाता है।’’
प्रकृति के अतिरिक्त परमात्मा का और कोई मंदिर नहीं है। शेष सब मंदिर और मस्जिद पुरोहितों की ईजाद हैं। परमात्मा से उन मंदिरों का दूर का भी संबंध नहीं। परमात्मा और पुरोहितों में कभी बोल-चाल ही नहीं रहा। मंदिर पुरोहितों की, और पुरोहित शैतान की सृष्टि हैं। वे शैतान के शिष्य हैं। इस कारण ही उनके शास्त्र और संप्रदाय मनुष्य को मनुष्य से लडाने के केंद्र रहे हैं। उन्होंने बातें तो प्रेम की की हैं, और जहर घृणा का फैलाया है। असल में जहर शक्कर-चढ़ी गोलियों में देना ही आसान होता है। फिर भी मनुष्य पुरोहितों से सावधान नहीं है। जब भी उसे परमात्मा का स्मरण आता है, वह पुरोहितों के चक्कर में पड़ जाता है। मनुष्य के परमात्मा से संबंध क्षीण होने का आधारभूत कारण यही है। पुरोहित सदा से ही परमात्मा की हत्या करने में संलग्न रहे हैं। उनके अतिरिक्त परमात्मा का हत्यारा और कोई भी नहीं है। परमात्मा को चुनना है तो पुजारी को नहीं चुना जा सकता है। उन दोनों की पूजा एक ही साथ नहीं की जा सकती। पुजारी जैसे ही मंदिर में प्रवेश करता है, वैसे ही परमात्मा मंदिर से बाहर हो जाता है। परमात्मा से नाता जोड़ने के लिए पुरोहित से मुक्त होना आवश्यक है। भक्त और भगवान के बीच वही बाधा है। प्रेम किसी को भी बीच में पसंद नहीं करता है।
एक भोर की बात है। अभी अंधेरा ही था। जैसे ही मंदिर के द्वार खुले कि एक अछूत मंदिर की सीढ़ियां चढ़ कर द्वार पर पहुंच गया। वह द्वार के भीतर पैर रखने को ही था कि पुजारी क्रोध से गरजाः ‘‘रुक, रुक, पामर! एक पग भी आगे बढ़ाया तो तेरा सर्वनाश हो जाएगा। मूढ़! परमात्मा के मंदिर की पवित्र सीढ़ियां तूने अपवित्र कर दी हैं।’’ सहमे हुए अछूत ने उठा हुआ पैर वापस ले लिया। उसकी आंखों में आंसू आ गए। परमात्मा के लिए उसके प्यासे हृदय में जैसे किसी ने छुरी भोंक दी थी। वह रोता हुआ बोलाः ‘‘हे परमात्मा, मेरा ऐसा कौन सा पाप है, जिसके कारण तेरे दर्शन मुझे नहीं हो सकते हैं? ’’ परमात्मा की ओर से पुजारी ने कहाः ‘‘तू जन्म से अशुद्ध है, पाप-भंडार है।’’ उस अछूत ने प्रार्थना कीः ‘‘फिर मैं शुद्धि के लिए साधना करूंगा, लेकिन प्रभु-दर्शन के बिना नहीं मरना चाहता हूं।’’ और फिर वर्षों तक उस अछूत का कोई पता न चला। वह न मालूम कहां चला गया था। लोग उसे भूल ही गए थे और तब अचानक एक दिन वह गांव में आया। गांव के प्रवेश-द्वार पर ही वह देवालय था। पुजारी ने उसे देवालय के पास से जाते देखा। एक अपूर्व तेज उसके चेहरे पर था। एक अपूर्व शांति उसकी आंखों में थी। उसके आसपास भी जैसे प्रकाश का एक मंडल था। लेकिन उसने देवालय की ओर आंख भी उठा कर नहीं देखा। वह उस ओर से बिल्कुल निरपेक्ष और असंग दीख रहा था। लेकिन पुजारी से न रहा गया। उसने उसे पुकारा और पूछाः ‘‘क्यों रे! क्या शुद्धि की साधना पूरी कर ली? ’’ वह अछूत इस पर हंसा और उसने स्वीकृति में सिर हिलाया। पुजारी ने पूछाः ‘‘फिर मंदिर में क्यों नहीं आता? ’’ वह अछूत बोलाः ‘‘महाराज, क्या करूं आकर? प्रभु ने दर्शन दिए तो कहाः मेरी खोज में मंदिर क्यों गया था? वहां कुछ भी नहीं है। मैं तो स्वयं ही कभी उन मंदिरों में नहीं गया हूं। और जाऊं भी तो क्या पुजारी मुझे वहां घुसने दे सकते हैं? ’’—ओशो
तंत्र सूत्र
काम संबंधि पहला सूत्र:
‘’काम-आलिंगन में आरंभ में उसकी आरंभिक अग्नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो।‘’
कई कारणों से काम कृत्य गहन परितृप्ति बन सकता है और वह तुम्हें तुम्हारी अखंडता पर, स्वभाविक और प्रामाणिक जीवन पर वापस पहुंचा सकता है। उन कारणों को समझना होगा।
एक कारण यह है कि काम कृत्य समग्र कृत्य है। इसमें तुम अपने मन से बिलकुल अलग हो जाते हो। छूट जाते हो। यही कारण है कि कामवासना से इतना डर लगता है। तुम्हारा तादात्म्य मन के साथ है और काम अ-मन का कृत्य है। उस कृत्य में उतरते ही तुम बुद्धि-विहीन हो जाते हो। उसमे बुद्धि काम नहीं करती। उसमे तर्क की जगह नहीं है। कोई मानसिक प्रक्रिया नहीं है। और अगर मानसिक प्रक्रिया चलती है तो काम कृत्य सच्चा और प्रामाणिक नहीं हो सकता। तब आर्गाज्म संभव नहीं है। गहन परितृप्ति संभव नहीं है। तब काम-कृत्य उथला हो जाता है। मानसिक कृत्य हो जाता है। ऐसा ही हो गया है।
सारी दुनिया में कामवासना की इतनी दौड़ है, काम की इतनी खोज है, उसका कारण यह नहीं है कि दुनिया ज्यादा कामुक हो गई है। उसका कारण इतना ही हे कि तुम काम-कृत्य को उसकी समग्रता में नहीं भोग पाते हो। इसीलिए कामवासना की इतनी दौड़ है। यह दौड़ बताती है कि सच्चा काम खो गया है। और उसकी जगह नकली काम हावी हो गया है। सारा आधुनिक चित कामुक हो गया है। क्योंकि काम कृत्य ही खो गया है। काम कृत्य भी मानसिक कृत्य बन गया है। काम मन में चलता रहता है और तुम उसके संबंध में सोचते रहते हो।
मेरे पास अनेक लोग आते है और कहते है कि हम काम के संबंध में सोच-विचार करते है, पढ़ते है, चित्र देखते है। अश्लील चित्र देखते है। वही उनका कामानंद है, सेक्स का शिखर अनुभव है। लेकिन जब काम का असली क्षण आता है तो उन्हें अचानक पता चलता है कि उसमे उनकी रूचि नहीं है। यहां तक कि वे उसमे अपने को नापुंसग अनुभव करते है। सोच-विचार के क्षण में ही उन्हें काम उर्जा का एहसास होता है। लेकिन जब वे कृत्य में उतरना चाहते है तो उन्हें पता चलता है कि उसके लिए उनके पास ऊर्जा नहीं है। तब उन्हें कामवासना का भी पता नहीं चलता है। उन्हें लगता है कि उनका शरीर मुर्दा हो गया है।
उन्हें क्या हो गया है?यही हो रहा है कि उनका काम-कृत्य भी मानसिक हो गया है। वे इसके बारे में सिर्फ सोच विचार कर सकते है। वे कुछ कर नहीं सकते। क्योंकि कृत्य में तो पूरे का पूरा जाना पड़ता है। और जब भी पूरे होकर कृत्य में संलग्न होने की बात उठती है। मन बेचैन हो जाता है। क्योंकि तब मन मालिक नहीं रह सकता, तब मन नियंत्रण नहीं कर सकता।
तंत्र काम-कृत्य को, संभोग को तुम्हें अखंड बनाने के लिए उपयोग में लाता है। लेकिन तब तुम्हें इसमे बहुत ध्यानपूर्वक उतरना होगा। तब तुम्हें काम के संबंध में वह सब भूल जाना होगा जो तुमने सुना है, पढ़ा है, जो समाज ने, संगठित धर्मों ने, धर्म गुरूओं ने तुम्हें सिखाया है। सब कुछ भूल जाओ। दिया है। और समग्रता से इसमे उतरो। भूल जाओ कि नियंत्रण करना है। नियंत्रण ही बाधा है। उचित है कि तुम उस पर नियंत्रण करने की बजाय अपने को उसके हाथों में छोड़ दो। तुम ही उसके बस में हो जाओ। संभोग में पागल की तरह जाओ। अ-मन की अवस्था पागलपन जैसी मालूम पड़ती है। शरीर ही बन जाओ। पशु ही बन जाओ। क्योंकि पशु पूर्ण है।
जैसा आधुनिक मनुष्य है। उसे पूर्ण बनाने की सबसे सरल संभावना केवल काम में है। सेक्स में है, क्योंकि काम तुम्हारे भीतर गहन जैविक केंद्र है। तुम उससे ही उत्पन्न हुए हो। तुम्हारी प्रत्येक कोशिका काम-कोशिका है। तुम्हारा समस्त शरीर काम-उर्जा की घटना है।
यह पहला सूत्र कहता है: ‘’काम-आलिंगन के आरंभ में उसकी आरंभिक अग्नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो।‘’
इसी में सारा फर्क है, सारा भेद है। तुम्हारे काम-कृत्य, संभोग महज राहत का, अपने को तनाव-मुक्त करने का उपाय है। इसलिए जब तुम संभोग में उतरते हो तो तुम्हें बहुत जल्दी रहती है। तुम किसी तरह छुटकारा चाहते हो। छुटकारा यह कि जो ऊर्जा का अतिरेक तुम्हें पीडित किए है वि निकल जाए और तुम चैन अनुभव करो। लेकिन यह चैन एक तरह की दुर्बलता है। ऊर्जा की अधिकता तनाव पैदा करती है। उतैजना पैदा करती है। और तुम्हें लगता है कि उसे फेंकना जरूरी है। जब वह ऊर्जा बह जाती है तो तुम कमजोरी अनुभव करते हो। और तुम उसी कमजोरी को विश्राम मान लेते हो। क्योंकि ऊर्जा की बाढ़ समाप्त हो गई उतैजना जाती रही, इसलिए तुम्हें विश्राम मालूम पड़ता है।
लेकिन यह विश्राम नकारात्मक विश्राम है। अगर सिर्फ ऊर्जा को बाहर फेंककर तुम विश्राम प्राप्त करते हो तो यह विश्राम बहुत महंगा है। और तो भी यह सिर्फ शारीरिक विश्राम होगा। वह गहरा नहीं होगा। वह आध्यात्मिक नहीं होगा।
यह पहला सूत्र कहता है कि जल्द बाजी मत करो और अंत के लिए उतावले मत बनो, आरंभ में बने रहो। काम-कृत्य के दो भाग है: आरंभ और अंत। तुम आरंभ के साथ रहो। आरंभ का भाग ज्यादा विश्राम पूर्ण है। ज्यादा उष्ण है। लेकिन अंत पर पहुंचने की जल्दी मत करो। अंत को बिलकुल भूल जाओ।
तीन संभावनाएं है। दो प्रेमी प्रेम में तीन आकार, ज्यामितिक आकार निर्मित कर सकते है। शायद तुमने इसके बारे में पढ़ा भी होगा। या कोई पुरानी कीमिया, की तस्वीर भी देखो। जिसमें एक स्त्री और एक पुरूष तीन ज्यामितिक आकारों में नग्न खड़े है। एक आकार चतुर्भुज है, दूसरा त्रिभुज है, और तीसरा वर्तुल है। यक अल्केमी और तंत्र की भाषा में काम क्रोध का बहुत पुराना विश्लेषण है।
आमतौर से जब तुम संभोग में होते हो तो वहां दो नहीं, चार व्यक्ति होते है। वही है चतुर्भुज। उसमे चार कोने है, क्योंकि तुम दो हिस्सों में बंटे हो। तुम्हारा एक हिस्सा विचार करने वाला है और दूसरा हिस्सा भावुक हिस्सा है। वैसे ही तुम्हारा साथी भी दो हिस्सों में बंटा है। तुम चार व्यक्ति हो दो नहीं। चार व्यक्ति प्रेम कर रहे है। यह एक भीड़ है, और इसमें वस्तुत: प्रगाढ़ मिलन की संभावना नहीं है। इस मिलन के चार कोने है और मिलन झूठा है। वह मिलन जैसा मालूम होता है। लेकिन मिलन है नहीं। इसमें प्रगाढ़ मिलन की कोई संभावना नहीं है। क्योंकि तुम्हारा गहन भाग दबा पडा है। केवल दो सिर, दो विचार की प्रक्रियाएं मिल रही है। भाव की प्रक्रियाएं अनुपस्थित है। वे दबी छीपी है।
दूसरी कोटी काम मिलन त्रिभुज जैसा होगा। तुम दो हो, आधार के कोने और किसी क्षण अचानक तुम दोनों एक हो जाते हो—त्रिभुज के तीसरे कोने की तरह। किसी आकस्मिक क्षण में तुम्हारी दुई मिट जाती है। और तुम एक हो जाते है। यह मिलन चतुर्भुजी मिलन से बेहतर है। क्योंकि कम से कम एक क्षण के लिए ही सही , एकता सध जाती है। वह एकता तुम्हें स्वास्थ्य देती है। शक्ति देती है। तुम फिर युवा और जीवंत अनुभव करते हो।
लेकिन तीसरा मिलन सर्वश्रेष्ठ है। और यह तांत्रिक मिलन है। इसमें तुम एक वर्तुल हो जाते हो, इसमें कोने नहीं रहते। और यह मिलन क्षण भर के लिए नहीं है, वस्तुत: यह मिलन समयातित है। उसमें समय नहीं रहता। और यह मिलन तभी संभव है जब तुम स्खलन नहीं खोजते हो। अगर स्खलन खोजते हो तो फिर यह त्रिभुजीय मिलन हो जाएगा। क्योंकि स्खलन होते ही संपर्क का बिंदु मिलन का बिंदू खो जाता है।
आरंभ के साथ रहो, अंत की फिक्र मत करो। इस आरंभ में कैसे रहा जाए? इस संबंध में बहुत सी बातें ख्याल में लेने जैसी है। पहली बात कि काम कृत्य को कहीं जाने का, पहुंचने का माध्यम मत बनाओ। संभोग को साधन की तरह मत लो, वह आपने आप में साध्य है। उसका कहीं लक्ष्य नहीं है, वह साधन नहीं है। और दूसरी बात कि भविष्य की चिंता मत लो, वर्तमान में रहो। अगर तुम संभोग के आरंभिक भाग में वर्तमान में नहीं रह सकते, तब तुम कभी वर्तमान में नहीं रह सकते। क्योंकि काम कृत्य की प्रकृति ही ऐसी है। कि तुम वर्तमान में फेंक दिए जाते हो।
तो वर्तमान में रहो। दो शरीरों के मिलन का सुखा लो, दो आत्माओं के मिलने का आनंद लो। और एक दूसरे में खो जाओ। एक हो जाओ। भूल जाओ कि तुम्हें कहीं जाना है। वर्तमान क्षण में जीओं, जहां से कहीं जाना नहीं है। और एक दूसरे से मिलकर एक हो जाओ। उष्णता और प्रेम वह स्थिति बनाते है जिसमें दो व्यक्ति एक दूसरे में पिघलकर खो जाते है। यही कारण है कि यदि प्रेम न हो तो संभोग जल्दबाजी का काम हो जाता है। तब तुम दूसरे का उपयोग कर रहे हो। दूसरे में डूब नहीं रहे हो। प्रेम के साथ तुम दूसरे में डूब सकते हो।
आरंभ का यह एक दूसरे में डूब जाना अनेक अंतदृष्टियां प्रदान करता है। अगर तुम संभोग को समाप्त करने की जल्दी नहीं करते हो तो काम-कृत्य धीरे-धीरे कामुक कम और आध्यात्मिक ज्यादा हो जाता है। जननेंद्रियों भी एक दूसरे में विलीन हो जाती है। तब दो शरीर ऊर्जाओं के बीच एक गहन मौन मिलन घटित होता है। और तब तुम घंटों साथ रह सकते हो। यह सहवास समय के साथ-साथ गहराता जाता है। लेकिन सोच-विचार मत करो, वर्तमान क्षण में प्रगाढ़ रूप से विलीन होकर रहो। वही समाधि बन जाती है। और अगर तुम इसे जान सके इसे अनुभव कर सके, इसे उपलब्ध कर सके तो तुम्हारा कामुक चित अकामुक हो जाएगा। एक गहन ब्रह्मचर्य उपलब्ध हो सकता है। काम से ब्रह्मचर्य उपलब्ध हो सकता है।
यह वक्तव्य विरोधाभासी मालूम होता है। काम से ब्रह्मचर्य उपलब्ध हो सकता है। क्योंकि हम सदा से सोचते आए है कि अगर किसी को ब्रह्मचारी रहना है। तो उसे विपरीत यौन के सदस्य को नहीं देखना चाहिए ।
उससे नहीं मिलना चाहिए। उससे सर्वथा बचना चाहिए, दूर रहना चाहिए। लेकिन उस हालत में एक गलत किस्म का ब्रह्मचर्य घटित होता है। जब चित विपरीत यौन के संबंध में सोचने में संबंध में सोचने में संलग्न हो जाता है। जितना ही तुम दूसरे से बचोगे उतना ही ज्यादा उसके संबंध में सोचने को विवश हो जाओगे। क्योंकि काम मनुष्य की बुनियादी आवश्यकता है, गहरी आवश्यकता है।
तंत्र कहता है कि बचने की, भागने की चेष्टा मत करो, बचना संभव नहीं है। अच्छा है कि प्रकृति को ही उसके अतिक्रमण का साधन बना लो। लड़ों मत प्रकृति के अतिक्रमण के लिए प्रकृति को स्वीकार करो।
अगर तुम्हारी प्रेमिका या तुम्हारी प्रेमी के साथ इस मिलन को अंत की फिक्र किए बिना लंबाया जा सके तो तुम आरंभ में ही बने रहे सकते हो। उतैजना ऊर्जा है और शिखर पर जाकर तुम उसे खो सकते हो। ऊर्जा के खोन से गिरावट आती है। कमजोरी पैदा होती है। तुम उसे विश्राम समझ सकते हो। लेकिन वह उर्जा का अभाव है।
तंत्र तुम्हें उच्चतर विश्राम का आयाम प्रदान करता है। प्रेमी और प्रेमिका एक दूसरे में विलीन होकर एक दूसरे को शक्ति प्रदान करते है। तब वे एक वर्तुल बन जाते है। और उनकी ऊर्जा वर्तुल में घूमने लगती है। वह दोनों एक दूसरे को जीवन ऊर्जा दे रहे है। नव जीवन दे रहे है। इसमे ऊर्जा का ह्रास नहीं होता है। वरन उसकी वृद्धि होती है। क्योंकि विपरीत यौन के साथ संपर्क के द्वारा तुम्हारा प्रत्येक कोश ऊर्जा से भर जाता है। उसे चुनौती मिलती हे।
यदि स्खलन न हो, यदि ऊर्जा को फेंका न जाए तो संभोग ध्यान बन जाता है। और तुम पूर्ण हो जाते हो। इसके द्वारा तुम्हारा विभाजित व्यक्तित्व अविभाजित हो जाता है। अखंड हो जाता है। चित की सब रूग्णता इस विभाजन से पैदा होती है। और जब तुम जुड़ते हो, अखंड होते हो तो तुम फिर बच्चे हो जाते हो। निर्दोष हो जाते हो।
और एक बार अगर तुम इस निर्दोषता का उपलब्ध हो गए तो फिर तुम अपने समाज में उसकी जरूरत के अनुसार जैसा चाहो वैसा व्यवहार कर सकते हो। लेकिन तब तुम्हारा यह व्यवहार महज अभिनय होगा, तुम उससे ग्रस्त नहीं होगे। तब यह एक जरूरत है जिसे तुम पूरा कर रहे हो। तब तुम उसमे नहीं हो। तुम मात्र एक अभिनय कर रहे हो। तुम्हें झूठा चेहरा लगाना होगा। क्योंकि तुम एक झूठे संसार में रहते हो। अन्यथा संसार तुम्हें कुचल देगा, मार डालेगा।
हमने अनेक सच्चे चेहरों को मारा है। हमने जीसस को सूली पर चढ़ा दिया, क्योंकि वे सच्चे मनुष्य की तरह व्यवहार करने लगे थे। झूठा समाज इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता है। हमने सुकरात को जहर दे दिया। क्योंकि वह भी सच्चे मनुष्य की तरह पेश आने लगे थे। समाज जैसा चाहे वैसा करो, अपने लिए और दूसरों के लिए व्यर्थ की झंझट मत पैदा करो। लेकिन जब तुमने अपने सच्चे स्वरूप को जान लिया, उसकी अखंडता को पहचान लिया तो यह झूठा समाज तुम्हें फिर रूग्ण नहीं कर सकता, विक्षिप्त नहीं कर सकता।
‘’काम-आलिंगन के आरंभ में उसकी आरंभिक अग्नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो।‘’
अगर स्खलन होता है तो ऊर्जा नष्ट होती है। और तब अग्नि नहीं बचती। तुम कुछ प्राप्त किए बिना ऊर्जा खो देते हो।
*अहंकार और लोभ*
चित्त को वर्तमान में ले आना ही ध्यान है, वही मेडिटेशन है, वही समाधि है। और चित्त को वर्तमान से यहां वहां भटकाए रहना, वही चंचलता है, वही उपद्रव है। और ध्यान में रहे कि हम आखिर वर्तमान से चूक क्यों जाते हैं? लोभ चुका देता है, लालच चुका देता है। क्योंकि लोभ हमेशा भविष्य की बातें करता है। लोभ वर्तमान की बात करता ही नहीं। करेगा कैसे? जो भी पाना है वह अभी तो पाया नहीं जा सकता। जो भी पाना है वह कल ही पाया जा सकता है, आगे ही पाया जा सकता है, इसी वक्त पाने का तो कोई उपाय नहीं है। इसलिए लोभ हमेशा भविष्य की भाषा बोलता है।
लोभ चुका देता है और अहंकार चुका देता है। अहंकार सदा अतीत की भाषा बोलता है, पास्ट की जो पाया, जो मिला, जो किया, जो बनाया, वह सब पास्ट में है। अहंकार सदा ही अतीत की भाषा बोलता है कि मैं फलां आदमी का बेटा हूं! क्यों? जो होगा उसका तो पता नहीं है, जो हो चुका है उसी का मैं दावा कर सकता हूं। मेरे पास इतने करोड़ रुपये हैं! होंगे उनका तो दावा नहीं कर सकते आप, जो हो चुका है। मेरी तिजोड़ी इतनी बड़ी! और मैं इतनी बड़ी कुर्सी पर रहा हूं! मैं कोई साधारण आदमी नहीं हूं। वह जो समबडी हूं मैं कुछ हूं वह हमेशा पास्ट से आता है। वह हमारे अतीत का संग्रह है, जिसको हमने जोड़ कर खड़ा कर लिया है। वह हमारा अहंकार है। अहंकार हमें पीछे ले जाता है, लोभ हमें आगे ले जाता है। और गौर से देखें तो लोभ और अहंकार एक ही चीज के दो हिस्से हैं। जो लोभ पूरा हो चुका है वह अहंकार बन गया, जो लोभ पूरा होगा वह अहंकार बनेगा। जो लोभ पूरा हो चुका वह अहंकार बन गया, जो पूरा होगा वह अहंकार बनेगा। जो अहंकार बन गया है वह लोभ है, जिससे आप गुजरे; और वह लोभ जो अभी आगे पकड़ रहा है, वह भविष्य में बनने वाला अहंकार है, जिससे आप गुजरेंगे।
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*जीवन रहस्य ओशो✍*
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