अंगुलिमाल बहुत बड़ा हत्यारा था।
उसने कसम खा रखी थी कि एक हजार
लोगों की गर्दनें काटकर उनकी अंगुलियों की
माला बनाकर पहनूंगा। इसलिए अंगुलीमाल उसका
नाम पड़ गया। कहते हैं, नौ सौ निन्यानबे लोग मारे, एक
की कमी थी। उसकी मां भी उसके पास जाने से डरने लगी थी। क्योंकि वह ऐसा हत्यारा आदमी और एक की ही कमी बची
है, मां से भी पूरी कर सकता था। जिस जंगल में वह रहता
था, वहां से रास्ते बंद हो गए, लोगों ने गुजरना बंद कर
दिया।

बुद्ध उस रास्ते से गुजरे।
गांव के लोगों ने कहा, आप
मत जाएं उस रास्ते से। उस दुष्ट
का कुछ भरोसा नहीं है। दूसरा रास्ता
है, ज़रा लंबा है, लेकिन चुनने योग्य है।
नाहक जीवन को खतरे में क्यों डालना ?
बुद्ध ने कहा, मुझे अगर पता न होता तो शायद
मैं दूसरे रास्ते से भी जा सकता था, अब तो पता है।
कोई वहां न जाएगा, मुझे तो जाना ही चाहिए। शरीर तो
ऐसे ही गिरेगा; चलो, इस आदमी की आकांक्षा ही पूरी हो जाएगी! उसे एक की ही जरूरत है, एक शरीर मेरे पास
है। और यह शरीर तो जानेवाला है; किसी के काम आ
जाए, इससे और शुभ क्या होगा? थोड़ी सेवा हो
जाएगी।

बुद्ध जब अंगुलिमाल
के पास पहुंचे तो अकेले थे।
मीलों पीछे छूट गए थे उनके शिष्य।
अंगुलिमाल दूर से ही चिल्लाया कि हे भिक्षु,
रुक जा! शायद तुझे पता नहीं है कि मैं कौन हूं!
बुद्ध हंसे और उन्होंने कहा कि शायद तुझे भी पता
नहीं है कि मैं कौन हूं। और मैं तुझसे कहता हूं कि मुझे
पता है कि मैं कौन हूं, तुझे यह भी पता नहीं है कि तू कौन है। अंगुलिमाल झिझका, एक क्षण ठिठका, ऐसा आदमी तो
उसने नहीं देखा था जो इस बल से बोले! फिर भी
उसने कहा कि अच्छा हो लौट जाओ। बुद्ध ने
कहा, अंगुलिमाल, मुझे तो वर्षो हो गए, तब
मैं रुक गया। तू रुक! अंगुलिमाल ने कहा
कि तुम विक्षिप्त मालूम होते हो।

बुद्ध ने कहा कि
जिस दिन मेरा मन
रुका, उस दिन मैं रुक गया।
तेरा मन अभी चल रहा है। देह
जरूर ठहरी है। और मन चल रहा है
तो सारा संसार चल रहा है। इसलिए कहता
हूं कि तू चल रहा है और मैं ठहरा हुआ हूं।

अंगुलिमाल को सोचना पड़ा।
बात पते की थी। बुद्ध बिल्कुल सामने
आकर खड़े हो गए। उसके हाथ उठाना
चाहते थे फरसे को, उठा नहीं पा रहे थे। यह
आदमी मारने जैसा तो नहीं! इस आदमी के चरणो
में मर जाना मिल जाए, तो सौभाग्य है। लेकिन फिर भी
पुरानी आदत, पुराने संस्कार, बल मारे, उठा, उठाया फरसा। बुद्ध ने कहा कि देख, कुछ जल्दी नहीं; मुझे तो तू जब
चाहे तब मार लेना, यह गर्दन तो कटी ही हुई है, मैं
कुछ भागनेवालों में से नहीं हूं, अन्यथा आता ही
नहीं, मगर इसके पहले कि तू मुझे मारे, एक
छोटी सी मेरी जिज्ञासा है, वह पूरी कर दे।
उसने पूछा, क्या ? बुद्ध ने कहा, इस वृक्ष
के, जिसके नीचे हम खड़े हैं, कुछ पत्ते
तोड़ दे। उसने उठाया अपना फरसा और एक पूरी शाखा काट दी। बुद्ध ने कहा, बस, आधी आकांक्षा पूरी हो गयी,
आधी और पूरी कर दे। अब इसे वापस जोड़ दे!
अंगुलिमाल बोला, तुम निश्चित पागल हो!
टूटी शाखा अब कैसे जोड़ी जा सकती है ?

बुद्ध ने कहा,
अगर जोड़ नहीं
सकता, तो तोड़ने की
जुर्रत भी नहीं करनी चाहिए।
तोड़ना तो कोई बच्चा भी कर सकता
था, जोड़ने की कला ही कला है। तूने इतने
लोग मारे, एक चींटी को भी जिला सकता है ?
और जिसे हम जीवन न दे सकते हों, उसे मारने का
हमें हक क्या है ?

जैसे अंगुलिमाल सदियों -
सदियों की निद्रा से जागा। फरसा
हाथ से गिर गया, बुद्ध के चरणों में झुक
गया, बुद्ध ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहाः
भिक्षु अंगुलिमाल, उठो! उसने कहा, आप भिक्षु मुझे
क्यों कहते हैं? बुद्ध ने कहा, मैंने दीक्षा दे दी। मैं ऐसे ही हिम्मतवर लोगों की तलाश में हूं। अंगुलिमाल ने दीक्षा मांगी न थी, झुका था तब हत्यारा अंगुलिमाल था, उठा तब भिक्षु अंगुलिमाल था। बुद्ध ने कहा, मैंने तो दीक्षा दे दी। तू
मेरा संन्यासी हो गया। चल मेरे पीछे! अंगुलिमाल,
तू प्यारा व्यक्ति है! इतना जल्दी बहुत कम लोगों
की समझ में आता है। अंगुलिमाल ने कहा,
मैं हत्यारा हूं। मुझसे ज्यादा पापी नहीं
कोई। और क्या ढंग है मुझे दीक्षा
देने का? मैंने मांगी नहीं!

बुद्ध ने कहाः
तू मांगे या न मांगे,
तू पात्र है और मैं देता हूं।
ऐसे अंगुलिमाल दीक्षित हुआ।

Comments

Popular Posts