.*_¶  सिद्धार्थ गौतम बुद्ध को तथागत गौतम बुद्ध व भगवान गौतम बुद्ध क्यों कहा जाता है ? और दोनों हि नाम से क्यों जाना जाता है ?

.*_¶  #बुद्ध शब्द का अर्थ यह है कि,..
#बुद्ध : बुद्ध शब्द यह किसी विशेष व्यक्ति का कोई नाम नहीं हैं। वह मन की ऐसी अवस्था या स्थिति का नाम हैं।
.*_¶  जो चित्त के ऐसी भाव की, जो मानसिक उन्नति के सबसे ऊँचे स्थान पर पहुँची हुई हैं।
.*_¶  बुद्ध का अर्थ जिसे सम्यक (सही) संबोधी (ज्ञान) हासिल हुई हैं। ऐसा सम्यक संबुद्ध की, जिन्हें पूरी तरह ज्ञान हासिल हुआ हैं।
.*_¶  जो अपने आपका और सारे संसार की भलाई कर करता हैं। बुद्ध का अर्थ पाली भाषा में इसे सर्वज्ञ (अमर्यादित ज्ञानी) कहते हैं।
.*_¶  बुद्ध मतलब अनन्त आसमान के जैसे अनन्त ज्ञानी एवं महाकारूणावान।

.*_¶  #तथागत इस शब्द का अर्थ यह है कि,..
तथागत = तथ्य + आगत = तथागत
तथ्य = सत्य (सच्चाई) सच
आगत = अवगत (सचेत, आगाह करना )
.*_¶  तथ्य के साथ सत्य या सच्चाई से अवगत करने वाले गौतम 'बुद्ध' तथागत कहे जाते हैं।
.*_¶  #तथागत पालि भाषा का शब्द है, जिस का अर्थ यथाचारी एवं तथाचारी होता है।
.*_¶  अर्थात, जिस प्रकार दुसरों को उपदेश देना या बोलना ठीक उसी तरह ही ऊसे स्वयं को  भी अमल में लाना या उसी प्रकार कार्य करना।
.*_¶  मराठी में इसे कहते है कि, "बोले तैसा चाले, त्याची वंदावी पाऊले"।
.*_¶  जो व्यक्ती जैसा बोलता है और अपने जीवन का समस्त आचरण भी, अगर बिल्कुल वैसे हि करता है,
.*_¶  तो कहते है, कि ऊस व्यक्ती के चरण स्पर्श करने योग्य तथा पुज्यनिय होते है।
.*_¶  भगवान बुद्ध मनुष्य बुद्धी की क्षमताओं से परे होकर, कभी कुछ भी नहीं बोलते थे।
.*_¶  तथागत भगवान बुद्ध जो जो बोलते थे, ऊन सबका वे सर्व प्रथम, अपने खुद के जीवन का अनुसरणिय अंग बना लेते थे,
.*_¶  और स्वयंम कि दैनंदिन दिनचर्या में तथा रोजमर्रा कि जीवन में लाकर, सर्वप्रथम ऊसे खुद प्रामाणित एवं खुद आचरण करते थे, तत्पश्यात वो हि वे बोलते थे।
.*_¶  इसलिए भगवान बुद्ध को #तथागत" इस नाम संबोधित किया जाता हैं।

.*_¶  #भगवान इस शब्द का एक अर्थ यह है  कि, बुद्ध धम्म में ‘'भगवान’' का मतलब परमात्मा परमपिता, परमेश्वर या ईश्वर नहीं हैं।
.*_¶  #भगवान यह पालिभाषा का शब्द है और इसका निम्नलिखित अर्थ कुछ इस तरह है।
.*_¶  भग्ग + वान = भगवान,
भग्ग = भंजन (नष्ट) करना
वान = तृष्णा (वासना) ईच्छाएँ, कामनायें
.*_¶  जिस मानव ने जीवन में की सभी तृष्णांओ एवं वासनाओं, अहिंसा का भंजन या तृष्णा नष्ट की है, उस महान मनुष्य को पालिभाषा में, '‘#भगवान’' कहां जाता हैं।

"भग्ग रागो, भग्न मोहो, भग्ग दोसो अनासवो। भग्गस्स पापका धम्मा भगवातेनपाऊच्चित।

.*_¶  इसका अर्थ": जिस मनुष्य ने राग, मोह, द्वेष एवं तृष्णा, ईच्छाये, कामनाये इन सबको नष्ट करके, संपूर्ण जीवन अकुशल कर्म और चित्त का नाश किया हैं, उस कुशलकर्मी महापुरूष को ‘'#भगवान’' कहा जाता हैं।

.*_¶  इसलिए बौद्ध का अनुसरण करने वाले बुद्ध को "भगवान बुद्ध" भी कहते है,
.*_¶  परन्तु यथार्थ में ‘बुद्ध’ से ज्यादा प्रतिष्ठित एवं गौरवपूर्ण नाम या लफ्ज़ दुनियाँ में कोई और नहीं है,
.*_¶  इसलिए बुद्ध नाम के साथ या आगे "भगवान", 'महात्मा’ या अन्य कोई ऐसे गौरवपूर्ण शब्द लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

.*_¶  #भगवान शब्द का एक अलग सा, दुसरा अर्थ ऐसा भी, बताया जाता है कि,.....
.*_¶  "भगवान" = भ + ग + वा + न
भ : भ = भूमी, धरती, जमीन, पृथ्वी
 ग : ग = गगन, आकाश, आसमांन
वा : वा = वायू, हवा, पवन
वा : व + अ = अ = अग्नी
.*_¶  जैसे,..भ् + अ, (ग् + अ) व् + अ आखिर में 'अ' के आवाज के साथ ध्वनी खत्म होता है।
न : न = नीर = पानी
.*_¶  #भ + #ग + #वा + #न
.*_¶  #भ = भूमी, #ग = गगन, #वा : वायू,
#अ : अग्नी, #न = नीर = पानी
.*_¶  इन पांच तत्वो से धरती का जीवन बना है, तो कुछ लोग भगवान शब्द का विश्लेशण कुछ इस तरह भी करते है।

.*_¶  जिस तरह मनुष्य में क्रोध, हंसी, प्रेम, रोग, रोना, निराशा, ऊल्हास, सुख, दुःख, आनंद आदी आदी स्थीती भाव अपने आप प्राकृतिक एवं सहज भाव से ऊत्पन्न होते है।
.*_¶  जिस तरह यह सब मनुष्य के सहज और स्वाभाविक स्वभाव है।
.*_¶  बिल्कुल ऊसी तरह हि, हमारे इर्द गिर्द जो कुछ भी, हमारे समझ और बुद्धी से परे कि, रहस्यमय घटनाये घटित होती है।
.*_¶  वे सब अचरज से भरी अदभुत एवं रहस्यमय घटनाये सब प्राकृतिक सहज भाव या केवल नेचर का अपना स्वाभाविक स्वभाव है।
.*_¶  ऊन सबको ईश्वरियत्व से या भगवान कृत्य से जोडना अविज्ञानता, अंधविश्वास, अंधश्रद्धा है
.*_¶  हर घटित अचरज भरी घटनाओं के पिछे जो रहस्य दबे होते है, ऊसे सहि सहि से जानकर अथवा समझ लेना हि सहि विज्ञान है।
.*_¶  यह सब कुछ, ईश्वर या भगवान करते है, ऐसा मानना एवं दृढ़ विश्वास करना, मनुष्य बुद्धी को निष्क्रिय करने कि आदत डालने जैसा है।

             """""""*नमो बुद्धाय*""""""

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