#बोधिधर्म भारत से गया चीन। उसके पहले और बहुत बौद्ध भिक्षु चीन पहुंच गए थे .. हजारो-हजारो भिक्षु पहुंच गए थे। सम्राट बू ने बौद्ध ग्रंथों का करोड़ो रूपय खर्च करके अनुवाद करवाया था, सैकड़ों मठ और विहार बनवाए थे। फिर खबर पहुंची कि परम ज्ञानी बोधिधर्म आता है, तो वह खुद अपने राज्य की सीमा पर स्वागत करने आया। स्वागत करते ही, स्वागत के बाद ही, विश्राम मिलते ही पहली बात सम्राट बू ने बोधिधर्म से पूछी कि मैंने इतने हजार मठ और विहार बनवाए, मैंने इतने करोड़ का खर्च किया। बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद करवाया, लाखो भिक्षुओं को मैं रोज भोजन देता हूं। मेरे इस सब पुण्य का क्या फल होगा?
बोधिधर्म ने कहा : तू सीधा नरक जाएगा। डायरेक्ट टुहेल. .। बू ने कहा : क्या कहते हैं ? . . . नर्क ?
आप मजाक करते हैं ?
क्योंकि किसी भिक्षु ने उसे अब तक यह नहीं. . . कहा
सब भिक्षु कहते थे, तुम महापुण्यात्मा हो
भिखारी ही थे, भिक्षु न रहे होंगे।
'तुम महापुण्यात्मा हो। 'क्योंकि यह महापुण्यात्मा कह कर ही भिखारी अपना पालन करवा सकते हैं।
'तुम महापुण्यात्मा हो; तुमने इतना दान किया जैसा कभी किसी ने नहीं किया, स्वर्ण अक्षरों में स्वर्ग में तुम्हारी तख्ती लगने वाली है; परमात्मा के ठीक बगल में तुम्हारा निवास तैयार हो रहा है। 'यह सब कहा था। बोधिधर्म ने कहा--- तू सीधा नरक जाएगा।
बोधिधर्म की बात बू को न जंची। किसी पुण्य करने वाले को न जंचेगी कि पुण्य भी पाप है। तो बू ने कहा कि मैं यह बात नहीं मान सकता।
बोधिधर्म ने कहा : तो फिर मैं तेरे पाप के राज्य में प्रवेश करने से इनकार करता हूं मैं वापस जाता हूं; तेरे राज्य की सीमा के बाहर रहूंगा। जिस दिन तुझे---पता चल जाए कि पुण्य भी पाप है, उस दिन प्रवेश करूंगा।
बात आई-गई हो गई। बू तो खिलाफ हो गया बोधिधर्म के। और भिक्षु भी खिलाफ हो गए .. कि इस आदमी से बड़ी आशाएं लगाई थीं .. यह आता तो काम बड़ा होता; सम्राट उत्सुक था। और इसने सब विकृत कर दिया।
दस साल बाद 'सम्राट बू अपनी मरण शय्या पर पड़ा है, मौत चारों तरफ घिरने लगी है, भय मन को पकड़ने लगा, और तब उसे बोधिधर्म की पुनः याद आई। उसे साफ दिखाई पड़ने लगा कि इतना किया पुण्य, लेकिन मौत तो ठीक वैसी ही आ रही है जैसे गैर-पुण्य करने वाले को आती है, इतना किया पुण्य, जरा-जीर्ण तो मैं वैसा ही हो गया जैसा कि पापी हो जाता है; इतना किया पुण्य,लेकिन मृत्यु में कोई शांति तो नहीं मालूम पड़ती तो उसके पार क्या शांति होगी! बहुत मन बेचैन है।
खबर भेजी उसने कि अगर बोधिधर्म कहीं मिल जाए तो उसे बुला लाओ, मैं व्यर्थ दस वर्ष खोया। आज मुझे भी लग रहा है कि मैं सीधा नरक जा रहा हूं। लेकिन बोधिधर्म तो मर चुका था। लेकिन कब पर----कह गया था वह एक वाक्य लिखने को ... कि आज नहीं कल, सम्राट बू मरते वक्त मेरा स्मरण करेगा। क्योंकि जिंदगी में धोखा देना आसान है। तब आदमी तरंग में होता है, जीने के वहम में होता है। जब मृत्यु पास आएगी तब उसे पता चलेगा। वह मेरी याद करेगा। तो कह गया था कि एक वाक्य मेरी कब्र पर लिख देना, सम्राट बू के लिए मेरा संदेश है। और वह संदेश यह था---'कि जीवन भर तूने पुण्य किया, अगर मृत्यु के क्षण में भी पुण्य का त्याग कर दे तो स्वर्ग का द्वार निकट है।ʼ
पुण्य का त्याग कर दे! बहुत त्याग किया तूने पुण्य के लिए, अब तू पुण्य का भी त्याग कर दे।
कठिन है बहुत। लोहे की जंजीरे छोड़नी बहुत आसान,
पाप का त्याग करना बहुत आसान, स्वर्ण-जंजीरें हाथ में हो तो छोड़ना बहुत मुश्किल---आभूषण मालूम होती हैं और पुण्य! .. पुण्य से ज्यादा स्वर्ण और क्या होगा! शुद्ध स्वर्ण है; छोड़ने की हिम्मत नहीं होती। लेकिन जो जानता है, जंजीरें चाहे लोहे की हो चाहे सोने की इससे कोई फर्क नहीं पड़ता .. जंजीरें जंजीरें हैं। और कारागृह की दीवाले चाहे महल जैसी सजी हो, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता।
बोधिधर्म ने कहा : तू सीधा नरक जाएगा। डायरेक्ट टुहेल. .। बू ने कहा : क्या कहते हैं ? . . . नर्क ?
आप मजाक करते हैं ?
क्योंकि किसी भिक्षु ने उसे अब तक यह नहीं. . . कहा
सब भिक्षु कहते थे, तुम महापुण्यात्मा हो
भिखारी ही थे, भिक्षु न रहे होंगे।
'तुम महापुण्यात्मा हो। 'क्योंकि यह महापुण्यात्मा कह कर ही भिखारी अपना पालन करवा सकते हैं।
'तुम महापुण्यात्मा हो; तुमने इतना दान किया जैसा कभी किसी ने नहीं किया, स्वर्ण अक्षरों में स्वर्ग में तुम्हारी तख्ती लगने वाली है; परमात्मा के ठीक बगल में तुम्हारा निवास तैयार हो रहा है। 'यह सब कहा था। बोधिधर्म ने कहा--- तू सीधा नरक जाएगा।
बोधिधर्म की बात बू को न जंची। किसी पुण्य करने वाले को न जंचेगी कि पुण्य भी पाप है। तो बू ने कहा कि मैं यह बात नहीं मान सकता।
बोधिधर्म ने कहा : तो फिर मैं तेरे पाप के राज्य में प्रवेश करने से इनकार करता हूं मैं वापस जाता हूं; तेरे राज्य की सीमा के बाहर रहूंगा। जिस दिन तुझे---पता चल जाए कि पुण्य भी पाप है, उस दिन प्रवेश करूंगा।
बात आई-गई हो गई। बू तो खिलाफ हो गया बोधिधर्म के। और भिक्षु भी खिलाफ हो गए .. कि इस आदमी से बड़ी आशाएं लगाई थीं .. यह आता तो काम बड़ा होता; सम्राट उत्सुक था। और इसने सब विकृत कर दिया।
दस साल बाद 'सम्राट बू अपनी मरण शय्या पर पड़ा है, मौत चारों तरफ घिरने लगी है, भय मन को पकड़ने लगा, और तब उसे बोधिधर्म की पुनः याद आई। उसे साफ दिखाई पड़ने लगा कि इतना किया पुण्य, लेकिन मौत तो ठीक वैसी ही आ रही है जैसे गैर-पुण्य करने वाले को आती है, इतना किया पुण्य, जरा-जीर्ण तो मैं वैसा ही हो गया जैसा कि पापी हो जाता है; इतना किया पुण्य,लेकिन मृत्यु में कोई शांति तो नहीं मालूम पड़ती तो उसके पार क्या शांति होगी! बहुत मन बेचैन है।
खबर भेजी उसने कि अगर बोधिधर्म कहीं मिल जाए तो उसे बुला लाओ, मैं व्यर्थ दस वर्ष खोया। आज मुझे भी लग रहा है कि मैं सीधा नरक जा रहा हूं। लेकिन बोधिधर्म तो मर चुका था। लेकिन कब पर----कह गया था वह एक वाक्य लिखने को ... कि आज नहीं कल, सम्राट बू मरते वक्त मेरा स्मरण करेगा। क्योंकि जिंदगी में धोखा देना आसान है। तब आदमी तरंग में होता है, जीने के वहम में होता है। जब मृत्यु पास आएगी तब उसे पता चलेगा। वह मेरी याद करेगा। तो कह गया था कि एक वाक्य मेरी कब्र पर लिख देना, सम्राट बू के लिए मेरा संदेश है। और वह संदेश यह था---'कि जीवन भर तूने पुण्य किया, अगर मृत्यु के क्षण में भी पुण्य का त्याग कर दे तो स्वर्ग का द्वार निकट है।ʼ
पुण्य का त्याग कर दे! बहुत त्याग किया तूने पुण्य के लिए, अब तू पुण्य का भी त्याग कर दे।
कठिन है बहुत। लोहे की जंजीरे छोड़नी बहुत आसान,
पाप का त्याग करना बहुत आसान, स्वर्ण-जंजीरें हाथ में हो तो छोड़ना बहुत मुश्किल---आभूषण मालूम होती हैं और पुण्य! .. पुण्य से ज्यादा स्वर्ण और क्या होगा! शुद्ध स्वर्ण है; छोड़ने की हिम्मत नहीं होती। लेकिन जो जानता है, जंजीरें चाहे लोहे की हो चाहे सोने की इससे कोई फर्क नहीं पड़ता .. जंजीरें जंजीरें हैं। और कारागृह की दीवाले चाहे महल जैसी सजी हो, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता।
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